संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय २३ * | ३७३ ---|---
| गर्भच्युतावहोरात्रं सपिण्डेऽत्यन्तनिर्गुणे।<br>यथेष्टाचरणे ज्ञातौ त्रिरात्रमिति निश्चयः॥ २१॥ | गर्भस्राव तथा अत्यन्त निर्गुण सपिण्डकी मृत्यु होनेपर एक अहोरात्रका और मनमाने आचरणवाले जाति-बन्धुके (यहाँ गर्भस्राव होनेपर) तीन रातका अशौच निश्चित है। यदि जननाशौचके मध्य दूसरा जननाशौच हो जाय और मरणाशौचके बीचमें दूसरा मरणाशौच पड़ जाय तो प्रथम अशौचके जितने दिन शेष रहते हैं, उतने ही दिनोंमें दूसरे अशौचकी भी शुद्धि हो जाती है। किंतु प्रथम अशौच एक ही दिनका बचा हो तो तीन रातका आशौच होता है। मरणाशौचके मध्य जननाशौच होनेपर अथवा जननाशौचके बीचमें मरणाशौच आ जानेपर मरणाशौचके पूरा होनेपर ही शुद्धि होती है। यदि पूर्वका अशौच वृद्धिमद् (बड़ा गुरुतर) अशौच हो तो पूर्वके अशौचकी शुद्धिसे ही दोनों अशौचोंकी शुद्धि होती है। यदि पाँचवीं रात्रि बीत जानेपर वृद्धिमद् अशौच हो तो दूसरे अशौचकी शुद्धि पूर्वके ही अशौचसे हो जाती है॥ २१-२४॥ |
| यदि स्यात् सूतके सूतिर्मरणे वा मृतिर्भवेत्।<br>शेषेणैव भवेच्छुद्धिरहःशेषे त्रिरात्रकम्॥ २२॥ | |
| मरणोत्पत्तियोगे तु मरणाच्छुद्धिरिष्यते।<br>अघवृद्धिमदाशौचमूर्ध्वं चेत् तेन शुध्यति॥ २३॥ | |
| अथ चेत् पञ्चमीरात्रिमतीत्य परतो भवेत्।<br>अघवृद्धिमदाशौचं तदा पूर्वेण शुध्यति॥ २४॥ | |
| देशान्तरगतं श्रुत्वा सूतकं शावमेव तु।<br>तावत्प्रयतो मर्त्यो यावच्छेषः समाप्यते॥ २५॥ | देशान्तरमें गये हुएका जननाशौच या मरणाशौच-सम्बन्धी समाचार सुननेके बाद उतने समयतक संयम (अशौचके नियमका पालन) करना चाहिये जबतक शेष दिन समाप्त न हो जाय। (एक वर्षके भीतर) व्यतीत हुए मरणाशौचका समाचार सुननेपर सपिण्डोंको तीन रातका अशौच होता है, उसी प्रकार एक वर्ष बीतनेके बाद समाचार मिलनेपर मरणाशौचमें स्नानमात्र करना चाहिये॥ २५-२६॥ |
| अतीते सूतके प्रोक्तं सपिण्डानां त्रिरात्रकम्।<br>तथैव मरणे स्नानमूर्ध्वं संवत्सराद् यदि॥ २६॥ | |
| वेदान्तविच्चाधीयानो योऽग्निमान् वृत्तिकर्शितः।<br>सद्यः शौचं भवेत् तस्य सर्वावस्थासु सर्वदा॥ २७॥ | वेदान्तको जाननेवाला (ब्रह्मनिष्ठ), अध्ययनकर्ता (गुरुकुलमें निवास करनेवाला ब्रह्मचारी), अग्निहोत्री तथा वृत्तिहीन लोगोंको सभी अवस्थाओंमें सदा सद्यः शौच होता है ॥ २७ ॥ |
| स्त्रीणामसंस्कृतानां तु प्रदानात् पूर्वतः सदा।<br>सपिण्डानां त्रिरात्रं स्यात् संस्कारे भर्तुरेव हि॥ २८॥ | अविवाहित स्त्रियों (कन्याओं)-की पाणिग्रहणसे पूर्व मृत्यु होनेपर सपिण्डोंके निमित्त सदा तीन रातका अशौच होता है और विवाह-संस्कारके अनन्तर मृत्यु होनेपर केवल पति और पतिकुलमें अशौच होता है। वाग्दानसे पूर्व कन्याओंकी मृत्यु होनेपर एक दिनका अशौच कहा गया है और दो वर्षसे कम अवस्थावाली कन्याके मरनेपर सद्यः शौच बताया गया है॥ २८-२९॥ |
| अहस्त्वदत्तकन्यानामशौचं मरणे स्मृतम्।<br>ऊनद्विवर्षान्मरणे सद्यः शौचमुदाहृतम्॥ २९॥ |