संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३७२ | * कूर्मपुराण * |
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| त्रिरात्रं दशरात्रं वा ब्राह्मणानामशौचकम्।<br>प्राक्संस्कारात् त्रिरात्रं स्यात् तस्मादूर्ध्वं दशाहकम्॥ १०॥ | ब्राह्मणोंका आशौच तीन रात अथवा दस रात-तकका होता है। (उपनयन) संस्कार होनेके पूर्व (तथा चूडासंस्कारके अनन्तर मृत्यु होनेपर) तीन रातका और (उपनयन) संस्कार होनेपर दस रातका अशौच होता है॥ १०॥ | | ऊनद्विवार्षिके प्रेते मातापित्रोस्तदिष्यते।<br>त्रिरात्रेण शुचिस्त्वन्यो यदि ह्यात्यन्तनिर्गुणः॥ ११॥<br><br>अदन्तजातमरणे पित्रोरेकाहमिष्यते।<br>जातदन्ते त्रिरात्रं स्याद् यदि स्यातां तु निर्गुणौ॥ १२॥<br><br>आदन्तजननात् सद्य आचौलादेकरात्रकम्।<br>त्रिरात्रमौपनयनात् सपिण्डानामुदाहृतम्॥ १३॥<br><br>जातमात्रस्य बालस्य यदि स्यान्मरणं पितुः।<br>मातुश्च सूतकं तत् स्यात् पिता स्यात् स्पृश्य एव च॥ १४॥<br><br>सद्यः शौचं सपिण्डानां कर्तव्यं सोदरस्य च।<br>ऊर्ध्वं दशाहादेकाहं सोदरो यदि निर्गुणः॥ १५॥ | दो वर्षसे कम अवस्थावाले बालकके मरनेपर केवल माता-पिताको तीन रातका अशौच होता है। अत्यन्त निर्गुण (सपिण्डकी मृत्यु) होनेपर तीन रातमें शुद्धि होती है। बिना दाँतवाले शिशुके मरनेपर माता-पिताको एक दिनका अशौच कहा गया है। यदि माता-पिता निर्गुण हों तो दाँत उत्पन्न हुए शिशुकी मृत्यु होनेपर उन्हें तीन रातका अशौच होता है। दाँत उत्पन्न होनेके पूर्वतक बालककी मृत्यु होनेपर सद्यः चूडाकरण-संस्कारके पूर्वतक एक रात तथा उपनयनसे पूर्वतक तीन रातका आशौच सपिण्डोंके लिये कहा गया है। उत्पन्न होते ही बालककी मृत्यु होनेपर पिता और माताको अशौच होता है, किंतु पिता (स्नानके बाद) स्पर्शके योग्य होता है। सपिण्डों और सहोदर भाईकी (जन्मसे) दस दिनोंके भीतर मृत्यु होनेपर (स्नानमात्रसे) सद्यः पवित्रता होती है। दस दिनके पश्चात् (मृत्यु होनेपर) एक दिनका अशौच उस सहोदरको होगा जो निर्गुण होता है॥ ११—१५॥ | | अथोर्ध्वं दन्तजननात् सपिण्डानामाशौचकम्।<br>एकरात्रं निर्गुणानां चौलादूर्ध्वं त्रिरात्रकम्॥ १६॥<br><br>अदन्तजातमरणं सम्भवेद् यदि सत्तमाः।<br>एकरात्रं सपिण्डानां यदि तेऽत्यन्तनिर्गुणाः॥ १७॥<br><br>व्रतादेशात् सपिण्डानामार्वाक् स्नानं विधीयते।<br>सर्वेषामेव गुणिनामूर्ध्वं तु विषमं पुनः॥ १८॥ | तदनन्तर दाँत निकलनेतक निर्गुण सपिण्डोंको एक रातका अशौच होता है। चौलकर्मके उपरान्त (सपिण्डोंके मरनेपर) तीन रातका अशौच होता है। श्रेष्ठ जनो! सपिण्डी (यदि) अत्यन्त निर्गुण हों तो बिना दाँत निकले उनकी मृत्यु होनेपर एक रातका अशौच होता है। उपनयनके पूर्व सपिण्डोंकी मृत्यु होनेपर सभी गुणवानोंके लिये स्नानका विधान है, किंतु उपनयनके बाद मृत्यु होनेपर भिन्न स्थिति (अलग-अलग अशौचकी व्यवस्था) होती है॥ १६—१८॥ | | अर्वाक् षण्मासतः स्त्रीणां यदि स्याद् गर्भसंस्रवः।<br>तदा माससमैस्तासामशौचं दिवसैः स्मृतम्॥ १९॥<br><br>तत ऊर्ध्वं तु पतने स्त्रीणां द्वादशरात्रिकम्।<br>सद्यः शौचं सपिण्डानां गर्भस्रावाच्च वा ततः॥ २०॥ | छः महीनेसे पूर्व यदि स्त्रियोंका गर्भस्राव हो जाता है तो जितने महीनेका गर्भ रहता है, उतने ही दिनों-तकका उनका (स्त्रियोंका) अशौच कहा गया है, उसके बाद गर्भपात होनेपर स्त्रियोंके लिये बारह रात्रिका और सपिण्डोंके लिये सद्यः शौचका विधान है॥ १९-२०॥ |