संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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- अध्याय २३ * ३७१
तेईसवाँ अध्याय
आशौच-प्रकरणमें जननाशौच और मरणाशौचकी क्रियाविधि, शुद्धि-विधान, सपिण्डता, सद्यःशौच, अन्त्येष्टि-संस्कार, सपिण्डीकरण-विधि, मासिक तथा सांवत्सरिक श्राद्ध आदिका वर्णन
| व्यास उवाच<br>दशाहं प्राहुराशौचं सपिण्डेषु विपश्चितः।<br>मृतेषु वाथ जातेषु ब्राह्मणानां द्विजोत्तमाः॥ १॥<br>नित्यानि चैव कर्माणि काम्यानि च विशेषतः।<br>न कुर्याद् विहितं किञ्चित् स्वाध्यायं मनसापि च॥ २॥ | **व्यासजीने कहा—**हे द्विजोत्तमो! विद्वानोंने ब्राह्मणोंके लिये सपिण्डोंकी मृत्यु अथवा जन्म होनेपर दस दिनका आशौच कहा है। (आशौचमें) विशेषरूपसे विहित नित्य तथा काम्य कुछ भी कर्म न करे। मनसे भी स्वाध्याय (वेदाध्ययन) न करे॥ १-२॥ |
| शुचीनक्रोधनान् भूम्यान् शालाग्नौ भावयेद् द्विजान्।<br>शुष्कान्नेन फलैर्वापि वैतानं जुहुयात् तथा॥ ३॥ | यज्ञशालाके अग्निकार्यके लिये पवित्र, क्रोधरहित, भूमिदेवरूप ब्राह्मणोंको नियुक्त करना चाहिये। शुष्क अन्न अथवा फलोंके द्वारा वैतानाग्निमें हवन (श्रौत होम) करना चाहिये॥ ३॥ |
| न स्पृशेयुरिमानन्ये न च तेभ्यः समाहरेत्।<br>चतुर्थे पञ्चमे वाह्नि संस्पर्शः कथितो बुधैः॥ ४॥ | दूसरे लोग इन आशौचग्रस्त व्यक्तियोंको स्पर्श न करें और न कोई वस्तु ही उनसे लें। विद्वानोंने चौथे अथवा पाँचवें दिन इनके स्पर्शका विधान किया है। (सपिण्डोंके) जननाशौचमें सपिण्डोंको स्पर्श करनेमें दोष नहीं होता। तथापि उत्पन्न हुए बालक और उसे जन्म देनेवाली (सद्यः) प्रसूता स्त्रीका मनुष्योंको स्पर्श नहीं करना चाहिये॥ ४-५॥ |
| सूतके तु सपिण्डानां संस्पर्शो न प्रदुष्यति।<br>सूतकं सूतिकां चैव वर्जयित्वा नृणां पुनः॥ ५॥<br>अधीयानस्तथा यज्वा वेदविच्च पिता भवेत्।<br>संस्पृश्याः सर्व एवैते स्नानान्माता दशाहतः॥ ६॥ | जननाशौचमें वेदका अध्ययन करनेवाला, यज्ञ करनेवाला और वेद जाननेवाला पिता—ये सभी स्नान करनेसे स्पर्श करने योग्य हो जाते हैं। माता दस दिनोंके बाद (स्पर्श-योग्य होती है) निर्गुण¹ अथवा अति-निर्गुण लोगोंके लिये दस दिनोंका आशौच कहा गया है। एक², दो अथवा तीन गुणवालोंके लिये चार, तीन या एक दिनमें शुद्धि होनेका विधान है। दस दिन हो जानेपर सम्यक्-रूपसे अध्ययन एवं हवन करना चाहिये। प्रजापति मनुने चौथे दिन (एक गुणवाले अशौची)-के स्पर्शका विधान किया है। क्रियाहीन, मूर्ख, महारोगी और मनमाना आचरण करनेवाले व्यक्तियोंका आशौच मरणपर्यन्त कहा³ गया है॥ ६—९॥ |
| दशाहं निर्गुणे प्रोक्तमशौचं चातिनिर्गुणे।<br>एकद्वित्रिगुणैर्युक्तं चतुस्त्र्येकदिनैः शुचिः॥ ७॥ | |
| दशाहात् तु परं सम्यगधीयीत जुहोति च।<br>चतुर्थे तस्य संस्पर्शं मनुराह प्रजापतिः॥ ८॥ | |
| क्रियाहीनस्य मूर्खस्य महारोगिण एव च।<br>यथेष्टाचरणस्याहुर्मरणान्तमशौचकम् ॥ ९॥ |
१-वेदाध्ययन एवं अग्निहोत्रादि कर्मसे रहितको निर्गुण कहा जाता है।
२-जो स्मार्ताग्निमान् है वह एक गुणवाला है। जो स्मार्ताग्निमान् तथा वेदाध्ययनसम्पन्न है, वह दो गुणवाला है। जो इन दोनोंके साथ श्रौताग्निमान् है, वह तीन गुणोंवाला है। (मनु० ३। ५९ कुल्लूकभट्टी)
३-इस वचनका तात्पर्य क्रियाहीनता आदिकी निन्दामें है।