भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 506 में से

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३७० * कूर्मपुराण *


पूर्वाह्ने चैव कर्तव्यं श्राद्धमभ्युदयार्थिना।<br>देववत्सर्वमेव स्याद् यवैः कार्या तिलक्रिया॥ ९४ ॥अभ्युदयकी कामना करनेवालेको पूर्वाह्नमें ही आभ्युदयिक (नान्दी) श्राद्ध करना चाहिये। देवकार्यके समान इसमें सभी कार्य करने चाहिये। तिलोंका कार्य जौसे करना चाहिये। इसमें सीधे कुशोंका प्रयोग करे (मोटकके रूपमें द्विगुणीकृत कुशोंका प्रयोग न करे)। युग्म ब्राह्मणोंको भोजन कराये और 'नान्दीमुखाः पितरः प्रीयन्ताम्' अर्थात् नान्दीमुख नामक पितर तृप्त हों—ऐसा कहना चाहिये॥ ९४-९५॥
दर्भाश्च ऋजवः कार्या युग्मान् वै भोजयेद् द्विजान्।<br>नान्दीमुखास्तु पितरः प्रीयन्तामिति वाचयेत्॥ ९५ ॥<br>मातृश्राद्धं तु पूर्वं स्यात् पितॄणां स्यादनन्तरम्।<br>ततो मातामहानां तु वृद्धौ श्राद्धत्रयं स्मृतम्॥ ९६ ॥पहले मातृश्राद्ध तदनन्तर पितृश्राद्ध करना चाहिये। उसके बाद मातामहादिका श्राद्ध होता है। वृद्धिश्राद्धमें इन्हीं तीन प्रकारके श्राद्धोंका वर्णन हुआ है¹। देवकार्य (विश्वेदेव कार्य) करनेके अनन्तर पिण्डदान करना चाहिये। दाहिनी ओरसे ही विश्वेदेवकार्य करना चाहिये। एकाग्रचित्तसे² सव्य होकर पूर्वाभिमुख हो पिण्डदान करना चाहिये॥ ९६-९७॥
देवपूर्वं प्रदद्याद् वै न कुर्यादप्रदक्षिणम्।<br>प्राङ्मुखो निर्वपेत् पिण्डानुपवीती समाहितः॥ ९७ ॥<br>पूर्वं तु मातरः पूज्या भक्त्या वै सगणेश्वराः।<br>स्थण्डिलेषु विचित्रेषु प्रतिमासु द्विजातिषु॥ ९८ ॥सर्वप्रथम (नान्दीश्राद्धके पूर्व) भक्तिपूर्वक गणेश्वरोंसे युक्त (षोडश) मातृकाओंका पूजन करना चाहिये। मनोरम स्थण्डिल, प्रतिमा अथवा ब्राह्मणोंमें पुष्प, धूप, नैवेद्य, गन्ध तथा अलंकारों आदिके द्वारा (षोडश मातृकाओंका) पूजन करना चाहिये। मातृगणोंकी पूजाकर विद्वान्‌को चाहिये कि वह तीनों श्राद्ध³ करे। मातृपूजन किये बिना जो श्राद्ध करता है, (षोडश) मातृकाएँ क्रुद्ध होकर उससे अप्रसन्न हो जाती हैं॥ ९८-१००॥
पुष्पैर्धूपैश्च नैवेद्यैर्गन्धाद्यैर्भूषणैरपि।<br>पूजयित्वा मातृगणं कुर्याच्छ्राद्धत्रयं बुधः॥ ९९ ॥
अकृत्वा मातृयागं तु यः श्राद्धं परिवेशयेत्।<br>तस्य क्रोधसमाविष्टा हिंसामिच्छन्ति मातरः॥ १००॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे द्वाविंशोऽध्यायः॥ २२॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिभागमें बाईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २२॥


१-पुत्रादिकी उत्पत्तिके समय होनेवाले विशेष श्राद्धके लिये यह व्यवस्था है। सामान्यतः सभी श्राद्धोंमें प्रथम पिता आदिका, अनन्तर माता आदिका श्राद्ध होता है।
२-यह किसी विशेष श्रौतकर्मके पिण्डदानकी व्यवस्था है। सामान्यतः पिण्डदान दक्षिणाभिमुख एवं अपसव्य होकर किया जाता है।
३-ये तीन श्राद्ध—पिता आदि तीन, माता आदि तीन तथा मातामह आदि तीनका समझना चाहिये। नान्दीश्राद्धमें ये तीनों श्राद्ध होते हैं।

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