भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 379, कुल 506 में से

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पृष्ठ 379
* अध्याय २२ *३६९
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन श्राद्धं कुर्याद् द्विजोत्तमः।<br>आराधितो भवेदीशस्तेन सम्यक् सनातनः॥ ८५॥<br><br>अपि मूलैःफलैर्वापि प्रकुर्यान्निर्धनो द्विजः।<br>तिलोदकैस्तर्पयेद् वा पितॄन् स्नात्वा समाहितः॥ ८६॥<br><br>न जीवत्पितृको दद्याद्धोमान्तं चाभिधीयते।<br>येषां वापि पिता दद्यात् तेषां चैके प्रचक्षते॥ ८७॥<br><br>पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः।<br>यो यस्य म्रियते तस्मै देयं नान्यस्य तेन तु॥ ८८॥<br><br>भोजयेद् वापि जीवन्तं यथाकामं तु भक्तितः।<br>न जीवन्तमतिक्रम्य ददाति श्रूयते श्रुतिः॥ ८९॥<br><br>द्व्यामुष्यायणिको दद्याद् बीजिक्षेत्रिकयोः समम्।<br>रिक्थादर्धं समादद्यान्नियोगोत्पादितो यदि॥ ९०॥<br><br>अनियुक्तः सुतो यश्च शुल्कतो जायते त्विह।<br>प्रदद्याद् बीजिने पिण्डं क्षेत्रिणे तु ततोऽन्यथा॥ ९१॥<br><br>द्वौ पिण्डौ निर्वपेत् ताभ्यां क्षेत्रिणे बीजिने तथा।<br>कीर्तयेदथ चैकस्मिन् बीजिनं क्षेत्रिणं ततः॥ ९२॥<br><br>मृताहनि तु कर्तव्यमेकोद्दिष्टं विधानतः।<br>अशौचे स्वे परिक्षीणे काम्यं वै कामतः पुनः॥ ९३॥इसलिये द्विजोत्तमको सभी प्रयत्नोंसे श्राद्ध करना चाहिये। इससे सनातन ईशकी सम्यक् रूपसे आराधना हो जाती है॥ ८५॥<br><br>सर्वथा निर्धन द्विजको मूल अथवा फलोंसे श्राद्ध करना चाहिये। अथवा स्नानकर समाहित होकर तिल और जलद्वारा पितरोंका तर्पण करना चाहिये। जिसके पिता जीवित हों उसे श्राद्ध नहीं करना चाहिये अथवा उसके लिये होमपर्यन्त श्राद्ध करनेका विधान है। कुछ लोगोंका कहना है कि पिता जिन्हें पिण्डदान करते हों उन्हें ही (वह) पिण्डदान करे। पिता, पितामह तथा प्रपितामहमेंसे जिसकी मृत्यु हुई हो उसीके निमित्त श्राद्धकर्ताको पिण्डदान करना चाहिये, न कि अन्य किसी (जीवित व्यक्ति)-के निमित्त। अथवा जीवित पुरुषको इसकी अभिरुचिके अनुसार भक्तिपूर्वक भोजन कराये। श्रुतिमें कहा गया है कि (पितादि) जीवित व्यक्तिका अतिक्रमणकर पिण्डदान नहीं करना चाहिये॥ ८६-८९॥<br><br>द्व्यामुष्यायणिक¹ पुत्र बीजी² एवं क्षेत्री³ दोनों पिताओंको पिण्डदान करे। यह पुत्र सम्पत्तिका आधा भाग ले सकता है। जो पुत्र नियोग-विधिसे उत्पन्न नहीं है, शुल्क⁴ (मूल्य) देकर गृहीत है, वह बीजी (जिस पुरुषके बीजसे उत्पन्न हुआ है वह बीजी है)-को पिण्डदान करेगा और क्षेत्राधिकारी पिताके पिण्डदानका उसे अधिकार नहीं होता। (नियोगसे उत्पन्न पुत्रको) क्रमशः क्षेत्री और बीजीको दो पिण्ड देने चाहिये। एक-एक पिण्ड देते समय क्रमशः अलग-अलग दोनोंका नाम कीर्तन करना चाहिये⁵॥ ९०-९२॥<br><br>(पिताकी) मृत्यु-तिथिमें विधिपूर्वक एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना चाहिये। अपना अशौच समाप्त होनेपर इच्छानुसार काम्य श्राद्ध किये जा सकते हैं॥ ९३॥

१-शास्त्रीय विधिसे विवाहके लिये किसी योग्य वरको चुना जाय और उसे यह वचन दे दिया जाय कि 'मैं अपनी कन्याका विवाह तुमसे करूँगा' वह वर दैववश यदि गत हो जाय तो शास्त्रानुसार उस वाग्दत्ता कन्याका पुनर्विवाह सम्भव नहीं है, किंतु दिवंगत वरको पिण्ड देनेके लिये और उसकी सम्पत्तिके स्वामित्वके लिये पुत्रकी आवश्यकता हो तो उस वाग्दत्ता कन्याका देवर या सगोत्रसे विवाह करना शास्त्रविहित है। यही नियोग-विवाह है। इससे उत्पन्न पुरुषको द्व्यामुष्यायणिक कहते हैं।
२-वाग्दत्ता कन्यासे नियोग-विधिसे विवाह करनेवाला देवर आदि बीजी है अर्थात् विद्यमान पिता।
३-वाग्दत्ता कन्याका दिवंगत वर क्षेत्री है अर्थात् दिवङ्गत पिता।
४-औरस आदि बारह प्रकारके पुत्र धर्मशास्त्रमें बताये गये हैं। उनमें एक क्रीत पुत्र होता है। यह मूल्य देकर माता-पितासे ले लिया जाता है और अपने पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया जाता है। यही पुत्र शुल्कसे गृहीत पुत्ररूपमें यहाँ निर्दिष्ट है।
५-क्षेत्री एवं बीजी दोनोंको पिण्डदान नियोगसे उत्पन्न वही पुत्र करेगा, जिसकी उत्पत्तिके पूर्व देवर आदि तथा वाग्दत्ता कन्याने परस्पर यह संविदा कर ली हो कि यह उत्पन्न होनेवाला पुत्र हम दोनोंका होगा।

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