भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३६४* कूर्मपुराण *
बीभत्सुमशुचिं नग्नं मत्तं धूर्तं रजस्वलाम्।<br>नीलकाषायवसनं पाषण्डांश्च विवर्जयेत् ॥ ३५॥वीभत्स, अपवित्र, नग्न, मत्त, धूर्त, रजस्वला स्त्री, नीला और कषाय वस्त्र धारण करनेवाले तथा पाखंडीका परित्याग करना चाहिये ॥ ३५॥
यत् तत्र क्रियते कर्म पैतृकं ब्राह्मणान् प्रति।<br>तत्सर्वमेव कर्तव्यं वैश्वदैवत्यपूर्वकम् ॥ ३६॥श्राद्धमें पितृ-ब्राह्मणोंके प्रति जो भी कर्म किया जाता है, वह सब वैश्वदेवकर्मके अनन्तर करना चाहिये। यथाविधि (श्राद्धीय भोजनमें) बैठे हुए उन सभी (ब्राह्मणों)-को आभूषण, माला, यज्ञसूत्र, शिरोवेष्टन, धूप, वस्त्र तथा अनुलेपन आदिके द्वारा अलंकृत करना चाहिये ॥ ३६-३७॥
यथोपविष्टान् सर्वांस्तानलंकुर्याद् विभूषणैः।<br>स्रग्दामभिः शिरोवेष्टैर्धूपवासोऽनुलेपनैः ॥ ३७॥<br>ततस्त्वावाहयेद् देवान् ब्राह्मणानामनुज्ञया।<br>उदङ्मुखो यथान्यायं विश्वे देवास इत्यृचा ॥ ३८॥तदनन्तर ब्राह्मणोंकी आज्ञासे उत्तराभिमुख होकर यथाविधि 'विश्वे देवास०' इस ऋचाका पाठकर देवोंका आवाहन करना चाहिये। दो पवित्र (कुश) ग्रहणकर 'शं नो देवी०'—यह मन्त्र पढ़कर प्रक्षालित पात्रमें जल डाले और 'यवोऽसीति०' मन्त्रसे यव (जौ) भी डाले। 'या दिव्या०' इस मन्त्रसे (ब्राह्मणके) हाथपर अर्घ (अर्घपात्रका जल) छोड़े और यथाशक्ति गन्ध, माला, धूप तथा दीप आदि प्रदान करे ॥ ३८-४०॥
द्वे पवित्रे गृहीत्वाथ भाजने क्षालिते पुनः।<br>शं नो देव्या जलं क्षिप्त्वा यवोऽसीति यवांस्तथा ॥ ३९॥
या दिव्या इति मन्त्रेण हस्ते त्वर्घ्यं विनिक्षिपेत्।<br>प्रदद्याद् गन्धमाल्यानि धूपादीनि च शक्तितः ॥ ४०॥<br>अपसव्यं ततः कृत्वा पितॄणां दक्षिणामुखः।<br>आवाहनं ततः कुर्यादुशन्तस्त्वेत्यृचा बुधः ॥ ४१॥तदनन्तर विद्वान् व्यक्तिको अपसव्य एवं दक्षिणाभिमुख होकर 'उशन्तस्त्व०' इस ऋचासे पितरोंका आवाहन करना चाहिये। आवाहन करके उनकी आज्ञासे 'आ यन्तु नः०' इस मन्त्रका जप करना चाहिये। 'शं नो देवी०' इस मन्त्रसे पात्रमें जल डाले और 'तिलोऽसि०' इस मन्त्रसे तिल भी छोड़े। पहलेके समान अर्घ प्रदानकर अथवा ब्राह्मणोंके हाथमें (जलादि) प्रदानकर समाहित होकर पात्रमें संस्रव-अर्घका अवशिष्ट जल रखे। तदनन्तर 'पितृभ्यःस्थानम्०' इस मन्त्रसे पात्रको अधोमुख (उलटकर) रखे। घृतयुक्त अन्न लेकर 'अग्नौ करिष्ये' ऐसा पूछे और (उन ब्राह्मणोंद्वारा) 'कुरुष्व—करो' ऐसी आज्ञा प्राप्त होनेपर उपवीती (सव्य होकर) हवन (अग्नौकरण) करे। हाथमें कुश लेकर और यज्ञोपवीती (सव्य) होकर होम करना चाहिये। पितृसम्बन्धी कार्य प्राचीनावीती (अपसव्य) होकर करे और वैश्वदेवसम्बन्धी कार्य होमके समान अर्थात् सव्य होकर करे ॥ ४१-४५॥
आवाह्य तदनुज्ञातो जपेदा यन्तु नस्ततः।<br>शं नो देव्योदकं पात्रे तिलोऽसीति तिलांस्तथा ॥ ४२॥
क्षिप्त्वा चार्घं यथापूर्वं दत्त्वा हस्तेषु वै पुनः।<br>संस्रवांश्च ततः सर्वान् पात्रे कुर्यात् समाहितः।<br>पितृभ्यः स्थानमतेन न्युब्जं पात्रं निधापयेत् ॥ ४३॥
अग्नौ करिष्येत्यादाय पृच्छत्यन्नं घृतप्लुतम्।<br>कुरुष्वेत्यभ्यनुज्ञातो जुहुयादुपवीतवान् ॥ ४४॥
यज्ञोपवीतिना होमः कर्तव्यः कुशपाणिना।<br>प्राचीनावीतिना पित्र्यं वैश्वदेवं तु होमवत् ॥ ४५॥
दक्षिणं पातयेज्जानुं देवान् परिचरन् पुमान्।<br>पितॄणां परिचर्यासु पातयेदितरं तथा ॥ ४६॥पुरुषको दाहिना जानु जमीनपर रखकर देवोंकी परिचर्या करनी चाहिये और पितरोंकी परिचर्यामें बायाँ जानु जमीनपर रखना चाहिये ॥ ४६॥