भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय २२ * ३६३

दक्षिणामुखयुक्तानि पितॄणामासनानि च।<br>दक्षिणाग्रैकदर्भाणि प्रोक्षितानि तिलोदकैः ॥ २४ ॥<br><br>तेषूपवेशयेदेतानासनं स्पृश्य स द्विजम्।<br>आसध्वमिति संजल्पन् आसनास्ते पृथक् पृथक् ॥ २५ ॥<br>द्वौ दैवे प्राङ्मुखौ पित्र्ये त्रयश्चोदङ्मुखास्तथा।<br>एकैकं वा भवेत् तत्र देवमातामहेष्वपि ॥ २६ ॥<br><br>सत्क्रियां देशकालौ च शौचं ब्राह्मणसम्पदम्।<br>पञ्चैतान् विस्तरो हन्ति तस्मान्नेहेत विस्तरम् ॥ २७ ॥<br><br>अपि वा भोजयेदेकं ब्राह्मणं वेदपारगम्।<br>श्रुतशीलादिसम्पन्नमलक्षणविवर्जितम् ॥ २८ ॥पितृ-ब्राह्मणोंको दक्षिणाग्र कुशके ऊपर तिलोदकसे प्रोक्षितकर दक्षिणाभिमुख आसन प्रदान करना चाहिये। श्राद्धकर्ता आसनका स्पर्श करते हुए 'आसध्वम्'—'बैठिये' इस प्रकार कहकर उन पितृ-ब्राह्मणोंको पृथक्-पृथक् आसनपर बिठाये १ ॥ २४-२५ ॥<br>(विश्वेदेव) देवसम्बन्धी दो ब्राह्मणोंको पूर्वाभिमुख, पित्र्यसम्बन्धी तीन ब्राह्मणोंको उत्तराभिमुख बैठाना चाहिये अथवा देवसम्बन्धी और मातामह (पित्र्यसम्बन्धी)-के भी निमित्त एक-एक ब्राह्मणको बैठाना चाहिये। (श्राद्धमें) सत्कार, देश, काल, पवित्रता और ब्राह्मणसम्पद्—इन पाँचोंका (अधिक) विस्तारके कारण नाश होता है, अतः विस्तारकी इच्छा नहीं करनी चाहिये २, विस्तारकी अपेक्षा श्रुतशील आदिसे सम्पन्न अनपेक्षित क्षणोंसे रहित वेदके पारंगत एक ही ब्राह्मणको भोजन कराना उचित है ॥ २६-२८ ॥
उद्धृत्य पात्रे चान्नं तत् सर्वस्मात् प्रकृतात् पुनः।<br>देवतायतने चास्मै निवेद्यान्यत् प्रवर्तयेत् ॥ २९ ॥<br><br>प्रास्येदग्नौ तदन्नं तु दद्याद् वा ब्रह्मचारिणे।<br>तस्मादेकमपि श्रेष्ठं विद्वांसं भोजयेद् द्विजम् ॥ ३० ॥किसी पात्रमें समस्त प्रकृत वस्तुओं (श्राद्धीय भोज्य पदार्थोंमेंसे उचित मात्रामें भोज्य लेकर) देवमन्दिरमें देवताके उद्देश्यसे प्रथम निवेदित करके अन्य कार्य प्रारम्भ करना चाहिये, उस (श्राद्धीय लवणरहित सिद्ध) अन्नको अग्निमें छोड़ना चाहिये अथवा ब्रह्मचारीको देना चाहिये। अतः एक भी श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये ॥ २९-३० ॥
भिक्षुको ब्रह्मचारी वा भोजनार्थमुपस्थितः।<br>उपविष्टेषु यः श्राद्धे कामं तमपि भोजयेत् ॥ ३१ ॥<br><br>अतिथिर्यस्य नाश्नाति न तच्छ्राद्धं प्रशस्यते।<br>तस्मात् प्रयत्नाच्छ्राद्धेषु पूज्या ह्यतिथयो द्विजैः ॥ ३२ ॥श्राद्धमें निमन्त्रित ब्राह्मणोंके बैठ जानेपर भोजनके निमित्त उपस्थित हुए भिक्षुक अथवा ब्रह्मचारीको भी उनकी इच्छानुसार (श्राद्धमें जो यथेष्ट हो वह) भोजन कराना चाहिये। जिसके श्राद्धमें अतिथि भोजन नहीं करता, उसका श्राद्ध प्रशंसनीय नहीं होता। इसलिये द्विजोंको प्रयत्नपूर्वक श्राद्धोंमें अतिथियोंका पूजन करना चाहिये ॥ ३१-३२ ॥
आतिथ्यरहिते श्राद्धे भुञ्जते ये द्विजातयः।<br>काकयोनिं व्रजन्त्येते दाता चैव न संशयः ॥ ३३ ॥<br><br>हीनाङ्गः पतितः कुष्ठी व्रणी पुक्कसनास्तिकौ।<br>कुक्कुटाः शूकरा श्वानो वर्ज्याः श्राद्धेषु दूरतः ॥ ३४ ॥जो द्विज (ब्राह्मण) आतिथ्यरहित श्राद्धमें भोजन करते हैं, वे कौएकी योनिमें जाते हैं और दाताकी भी यही गति होती है, इसमें संदेह नहीं। श्राद्धमें हीन अङ्गवाला, पतित, कुष्ठरोगी, व्रणयुक्त, पुक्कस (जातिविशेष), नास्तिक, कुक्कुट, शूकर तथा कुत्ता—ये दूरसे ही हटा देने योग्य हैं ॥ ३३-३४ ॥

१-सामान्यतः ब्राह्मणकी जगह कुशपर श्राद्ध किया जाता है, किंतु सपात्रिक श्राद्धमें ब्राह्मणको बैठाकर श्राद्ध करनेका विधान है।
२-इसका आशय यह है कि श्राद्धके अवसरपर अधिक विस्तार करनेपर यथायोग्य सत्कार, उचित देश, श्राद्धके शास्त्रविहित काल, यथाशास्त्र पवित्रता तथा श्राद्धयोग्य ब्राह्मणकी सुलभता निश्चित ही संदिग्ध हो जाती है।