संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- कूर्मपुराण *
| निमन्त्रितस्तु यो विप्रो ह्यध्वानं याति दुर्मतिः।<br>भवन्ति पितरस्तस्य तं मासं पांशुभोजनाः ॥ १० ॥<br>निमन्त्रितस्तु यः श्राद्धे प्रकुर्यात् कलहं द्विजः।<br>भवन्ति तस्य तन्मासं पितरो मलभोजनाः ॥ ११ ॥<br><br>तस्मान्निमन्त्रितः श्राद्धे नियतात्मा भवेद् द्विजः।<br>अक्रोधनः शौचपरः कर्ता चैव जितेन्द्रियः ॥ १२ ॥<br>श्वोभूते दक्षिणां गत्वा दिशं दर्भान् समाहितः।<br>समूलानाहरेद् वारि दक्षिणाग्रान् सुनिर्मलान् ॥ १३ ॥<br><br>दक्षिणाप्रवणं स्निग्धं विभक्तं शुभलक्षणम्।<br>शुचिं देशं विविक्तं च गोमयेनोपलेपयेत् ॥ १४ ॥<br><br>नदीतीरेषु तीर्थेषु स्वभूमौ चैव सानुषु।<br>विविक्तेषु च तृप्यन्ति दत्तेन पितरः सदा ॥ १५ ॥<br>पारक्ये भूमिभागे तु पितॄणां नैव निर्वपेत्।<br>स्वामिभिस्तद् विहन्येत मोहाद्यत् क्रियते नरैः ॥ १६ ॥<br><br>अटव्यः पर्वताः पुण्यास्तीर्थान्यायतनानि च।<br>सर्वाण्यस्वामिकान्याहुर्न हि तेषु परिग्रहः ॥ १७ ॥<br><br>तिलान् प्रविकिरेत् तत्र सर्वतो बन्धयेदजान्।<br>असुरोपहतं सर्वं तिलैः शुध्यत्यजेन वा ॥ १८ ॥<br>ततोऽन्नं बहुसंस्कारं नैकव्यञ्जनमच्युतम्।<br>चोष्यपेयसमृद्धं च यथाशक्त्या प्रकल्पयेत् ॥ १९ ॥<br><br>ततो निवृत्ते मध्याह्ने लुप्तलोमनखान् द्विजान्।<br>अभिगम्य यथामार्गं प्रयच्छेद् दन्तधावनम् ॥ २० ॥<br>तैलमभ्यञ्जनं स्नानं स्नानीयं च पृथग्विधम्।<br>पात्रैरुदुम्बरैर्दद्याद् वैश्वदैवत्यपूर्वकम् ॥ २१ ॥<br><br>ततः स्नात्वा निवृत्तेभ्यः प्रत्युत्थाय कृताञ्जलिः।<br>पाद्यमाचमनीयं च सम्प्रयच्छेद् यथाक्रमम् ॥ २२ ॥<br><br>ये चात्र विश्वेदेवानां विप्राः पूर्वं निमन्त्रिताः।<br>प्राङ्मुखान्यासनान्येषां त्रिदर्भोपहितानि च ॥ २३ ॥ | श्राद्धमें निमन्त्रित जो दुर्बुद्धि ब्राह्मण यात्रा करता है, उसके पितर उस महीने धूलिका भक्षण करते हैं श्राद्धमें निमन्त्रित जो ब्राह्मण कलह करता है, उस महीनेमें उसके पितर मलका भोजन करते हैं, इसलिये श्राद्धमें निमन्त्रित ब्राह्मणको नियतात्मा, क्रोधशून्य तथा शौचपरायण रहना चाहिये और श्राद्धकर्ताको भी जितेन्द्रिय होना चाहिये ॥ १०-१२ ॥<br><br>श्राद्ध-दिनके पूर्व दिन समाहित होकर दक्षिण दिशामें जाकर अत्यन्त निर्मल, जड़सहित और दक्षिणकी ओर झुके हुए कुशों और जलको लाना चाहिये। दक्षिणकी ओर झुके हुए, स्निग्ध, अन्यके सम्बन्धसे रहित (अर्थात् स्व-स्वत्ववाले) शुभ लक्षणोंवाले, पवित्र तथा एकान्त स्थानका गोमयसे उपलेपन करना चाहिये। नदियोंके किनारों, तीर्थों, अपनी भूमिमें, पर्वतके शिखरों तथा एकान्त स्थानोंपर श्राद्ध करनेसे पितर सदा संतुष्ट रहते हैं ॥ १३-१५ ॥<br><br>दूसरेकी भूमिमें पितरोंका श्राद्ध नहीं करना चाहिये। यदि मोहवश मनुष्योंके द्वारा ऐसा किया जाता है तो वह कर्म (भूमिके) स्वामीके द्वारा विफल (नष्ट) कर दिया जाता है। जंगल, पर्वत, पुण्यतीर्थ, देवमन्दिर—ये सभी स्थान बिना स्वामीवाले (अर्थात् सार्वजनिक) कहे जाते हैं। इनपर किसीका स्वामित्व नहीं होता। (श्राद्धभूमिमें) सर्वत्र तिलोंको फैलाना चाहिये। तिलोंके द्वारा असुरोंसे उपहत अर्थात् आक्रान्त (श्राद्धभूमि) शुद्ध हो जाती है ॥ १६-१८ ॥<br><br>तदनन्तर अनेक प्रकारसे शुद्ध किये गये प्रशस्त अन्नसे ऐसे अनेक प्रकारके भोज्य पक्वान्न बनाने चाहिये, जो चोष्य, पेय आदि उत्तमोत्तम व्यंजनोंसे यथाशक्ति समृद्ध हों। तदनन्तर मध्याह्नकाल व्यतीत होनेपर कृतक्षौर (नख और बाल कटाये हुए) द्विजों (ब्राह्मणों)-से मार्गमें मिलकर उन्हें दन्तधावन प्रदान करे ॥ १९-२० ॥<br><br>वैश्वदैवत्य मन्त्रका उच्चारण कर उन्हें उदुम्बरके पात्रोंद्वारा अभ्यञ्जनके लिये उपयोगी तैल, स्नानके लिये जल अलग-अलग दे। तदुपरान्त उनके स्नान कर लेनेपर उठकर हाथ जोड़ते हुए उन्हें क्रमशः पाद्य एवं आचमन देना चाहिये। विश्वेदेवोंके निमित्त जो ब्राह्मण पहले निमन्त्रित हैं, उन्हें तीन कुश रखकर पूर्वाभिमुख आसन प्रदान करना चाहिये ॥ २१-२३ ॥ |