संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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* अध्याय २२ * ३६१
बाईसवाँ अध्याय
श्राद्ध-प्रकरणमें ब्राह्मण निमन्त्रित करनेकी विधि, निमन्त्रित ब्राह्मणके कर्तव्य, श्राद्धविधि, श्राद्धमें प्रशस्त पात्र, पितरोंकी प्रार्थना, श्राद्धके दिन निषिद्ध कर्म, वृद्धिश्राद्धका विधान, श्राद्ध-प्रकरणका उपसंहार
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले—सावधानीपूर्वक गोबर और जलसे (श्राद्ध) भूमिको शुद्धकर सभी ब्राह्मणोंकी सेवामें पहुँचकर सज्जन पुरुषोंद्वारा उन्हें निमन्त्रित करना चाहिये। श्राद्धके पहले दिन ब्राह्मणोंकी (नम्रभावसे आदरपूर्वक) पूजाकर उनसे कहना चाहिये—'कल हमारे यहाँ श्राद्ध होगा (आपलोग कृपाकर पधारें)'। ऐसा असम्भव होनेपर दूसरे (दिन) अर्थात् श्राद्धके ही दिन यथोक्त लक्षणोंसे समन्वित ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करना चाहिये॥ १-२॥ |
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| गोमयेनोदकैर्भूमिं शोधयित्वा समाहितः।<br>संनिपत्य द्विजान् सर्वान् साधुभिः संनिमन्त्रयेत्॥ १ ॥<br><br>श्वो भविष्यति मे श्राद्धं पूर्वेद्युरभिपूज्य च।<br>असम्भवे परेद्युर्वा यथोक्तैर्लक्षणैर्युतान्॥ २ ॥ | |
| तस्य ते पितरः श्रुत्वा श्राद्धकालमुपस्थितम्।<br>अन्योन्यं मनसा ध्यात्वा सम्पत्तन्ति मनोजवाः॥ ३ ॥<br><br>ब्राह्मणैस्ते सहाश्नन्ति पितरो ह्यन्तरिक्षगाः।<br>वायुभूतास्तु तिष्ठन्ति भुक्त्वा यान्ति परां गतिम्॥ ४ ॥<br><br>आमन्त्रिताश्च ते विप्राः श्राद्धकाल उपस्थिते।<br>वसेयुर्नियताः सर्वे ब्रह्मचर्यपरायणाः॥ ५ ॥ | मनके समान शीघ्र गतिवाले पितर जब यह सुन लेते हैं कि श्राद्धकाल उपस्थित है, तब परस्पर विचारकर श्राद्धकर्ताके यहाँ एकत्र हो जाते हैं। अन्तरिक्षमें विचरण करनेवाले पितर वायुरूपसे स्थित रहते हैं, ब्राह्मणोंके साथ भोजन करते हैं और भोजन करके परमगति प्राप्त करते हैं। श्राद्धका समय आनेपर सभी आमन्त्रित ब्राह्मणोंको संयमी और ब्रह्मचर्यपरायण होकर रहना चाहिये॥ ३-५॥ |
| अक्रोधनोऽत्वरोऽमत्तः सत्यवादी समाहितः।<br>भारं मैथुनमध्वानं श्राद्धकृद् वर्जयेज्जपम्॥ ६ ॥ | श्राद्ध करनेवालेको क्रोध, उतावलापन तथा प्रमादका त्यागकर समाहित होना चाहिये, सत्य बोलना चाहिये। उसे भारका ढोना, मैथुन, मार्गगमन (यात्रा आदि) और जपका (किसी कामनापरक यज्ञादिका श्राद्धके समय) परित्याग करना चाहिये॥ ६ ॥ |
| आमन्त्रितो ब्राह्मणो वा योऽन्यस्मै कुरुते क्षणम्।<br>स याति नरकं घोरं सूकरत्वं प्रयाति च॥ ७ ॥<br><br>आमन्त्रयित्वा यो मोहादन्यं चामन्त्रयेद् द्विजम्।<br>स तस्मादधिकः पापी विष्ठाकीटोऽभिजायते॥ ८ ॥<br><br>श्राद्धे निमन्त्रितो विप्रो मैथुनं योऽधिगच्छति।<br>ब्रह्महत्यामवाप्नोति तिर्यग्योनौ च जायते॥ ९ ॥ | (पहलेसे ही) निमन्त्रित ब्राह्मण (यदि) किसी दूसरेका निमन्त्रण स्वीकार करता है तो वह घोर नरकमें जाता है और बादमें सूकरकी योनि प्राप्त करता है। (किसी एक) ब्राह्मणको आमन्त्रित करके जो मोहसे दूसरेको आमन्त्रित करता है, वह व्यक्ति उससे भी अधिक पापी होता है (जो निमन्त्रित होनेपर भी दूसरी जगह जाता है) और विष्ठाका कीड़ा होता है। श्राद्धमें निमन्त्रित जो ब्राह्मण मैथुन करता है, वह ब्रह्महत्या (के पाप)-को प्राप्त करता है और बादमें तिर्यक्-योनिमें उत्पन्न होता है॥ ७-९॥ |