संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ३६० | * कूर्मपुराण * |
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| कन्यादूषी कुण्डगोलौ अभिशस्तोऽथ देवलः।<br>मित्रध्रुक् पिशुनश्चैव नित्यं भार्यानुवर्तकः॥ ४१॥ | करनेवाला, कुण्ड (पतिके जीवित रहते परपुरुषसे उत्पन्न संतान), गोलक (पतिकी मृत्युके बाद उपपतिसे उत्पन्न संतान), अभिशस्त (मिथ्यापवादग्रस्त), (देवल) — मन्दिर आदिसे आजीविका प्राप्त करनेवाले (पुजारी आदि), मित्रद्रोही, चुगली करनेवाला और नित्य भार्याके वशीभूत रहनेवाला — ये श्राद्धादिमें त्याज्य हैं॥ ४०-४१॥ |
| मातापित्त्रोर्गुरोस्त्यागी दारत्यागी तथैव च।<br>गोत्रभिद् भ्रष्टशौचश्च काण्डस्पृष्टस्तथैव च॥ ४२॥ | माता, पिता, गुरु तथा पत्नीका त्याग करनेवाला, सगोत्र (भाई-बन्धु) - में भेदबुद्धि पैदा करनेवाला, शौचभ्रष्ट (शौचाचारहीन), शस्त्रजीवी, संतानहीन, झूठी गवाही देनेवाला, याचक, रंगद्वारा जीविकोपार्जन करनेवाला (चित्रकार, नाट्यकार), समुद्रकी यात्रा करनेवाला, कृतघ्न और प्रतिज्ञा-भङ्ग करनेवाला, देवनिन्दापरायण, वेदनिन्दामें निरत तथा द्विजकी निन्दा करनेवाला — ये सभी श्राद्धादि कर्मोंमें त्याज्य हैं। कृतघ्न, चुगली करनेवाला, क्रूर, नास्तिक, वेदकी निन्दा करनेवाला, मित्रद्रोही तथा ऐन्द्रजालिक (मायावी, दाम्भिक) — ये विशेषरूपसे पंक्तिदूषक हैं॥ ४२-४५॥ |
| अनपत्यः कूटसाक्षी याचको रङ्गजीवकः।<br>समुद्रयायी कृतहा तथा समयभेदकः॥ ४३॥ | |
| देवनिन्दापरश्चैव वेदनिन्दारतस्तथा।<br>द्विजनिन्दारतश्चैते वर्ज्याः श्राद्धादिकर्मसु॥ ४४॥ | |
| कृतघ्नः पिशुनः क्रूरो नास्तिको वेदनिन्दकः।<br>मित्रध्रुक् कुहकश्चैव विशेषात् पंक्तिदूषकाः॥ ४५॥ | |
| सर्वे पुनरभोज्यान्नास्त्वदानाहेश्च कर्मसु।<br>ब्रह्मभावनिर्हस्ताश्च वर्जनीयाः प्रयत्नतः॥ ४६॥ | (उपर्युक्त) सभी प्रकारके व्यक्ति श्राद्धमें भोजन न कराने योग्य और सभी कर्मोंमें दानके अयोग्य होते हैं। ब्रह्मभावसे शून्य अर्थात् ब्राह्मणत्वसे च्युत व्यक्तियोंका विशेषरूपसे त्याग करना चाहिये॥ ४६॥ |
| शूद्रान्नरासपुष्टाङ्गः संध्योपासनवर्जितः।<br>महायज्ञविहीनश्च ब्राह्मणः पंक्तिदूषकः॥ ४७॥ | शूद्रके अन्न एवं रससे पुष्ट हुए अङ्गोंवाला, संध्योपासनासे रहित, पञ्चमहायज्ञोंसे शून्य ब्राह्मण पंक्तिदूषक होता है। पढ़े गये वेदादिका विस्मरण करनेवाला, स्नान एवं होमसे रहित, तमोगुणी तथा रजोगुणी ब्राह्मण पंक्तिदूषक होता है॥ ४७-४८॥ |
| अधीतनाशनश्चैव स्नानहोमविवर्जितः।<br>तामसो राजसश्चैव ब्राह्मणः पंक्तिदूषकः॥ ४८॥ | |
| बहुनात्र किमुक्तेन विहितान् ये न कुर्वते।<br>निन्दितानाचरन्त्येते वर्जनीयाः प्रयत्नतः॥ ४९॥ | अधिक क्या कहा जाय। जो शास्त्रविहित स्वकर्मोंको नहीं करते और शास्त्रनिषिद्ध (निन्दित) कर्मोंका आचरण करते हैं, वे प्रयत्नपूर्वक त्याग करने योग्य हैं॥ ४९॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे एकविंशोऽध्यायः॥ २१॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २१॥