संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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| * अध्याय २१ * | ३५१ |
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| असंस्कृताध्यापका ये भृत्या वाध्यापयन्ति ये।<br>अधीयते तथा वेदान् पतितास्ते प्रकीर्तिताः ॥ ३३ ॥<br><br>वृद्धश्रावकनिर्ग्रन्थाः पञ्चरात्रविदो जनाः।<br>कापालिकाः पाशुपताः पाषण्डा ये च तद्विधाः ॥ ३४ ॥<br><br>यस्याश्नन्ति हवींष्येते दुरात्मानस्तु तामसाः।<br>न तस्य तद् भवेच्छ्राद्धं प्रेत्य चेह फलप्रदम् ॥ ३५ ॥ | जो असंस्कृतों (संस्काररहितों)-के अध्यापक हैं, वेतनके लिये अध्यापन तथा वेदाध्ययन करनेवाले हैं, वे पतित कहे गये हैं। वृद्ध श्रावक अर्थात् बौद्ध, निर्ग्रन्थ अर्थात् जैन, पाञ्चरात्रके ज्ञाता, कापालिक, पाशुपत (सम्प्रदायविशेषके) और उसी प्रकारके पाखंडी, तमोगुणी, दुरात्मा व्यक्ति—ये जिसके हविष्यान्नका भक्षण करते हैं, उसका किया श्राद्ध न तो इस लोकमें फल देनेवाला होता है और न परलोकमें ॥ ३३—३५ ॥ |
| अनाश्रमी यो द्विजः स्यादाश्रमी वा निरर्थकः।<br>मिथ्याश्रमी च ते विप्रा विज्ञेयाः पंक्तिदूषकाः ॥ ३६ ॥ | जो द्विज (ब्राह्मण) यथाविधि आश्रमको स्वीकार करनेवाले नहीं हैं अथवा नाममात्रके लिये किसी आश्रमका आश्रय लिये हैं, वे मिथ्याश्रमी कहे गये हैं, उन्हें पंक्तिदूषक समझना चाहिये ॥ ३६ ॥ |
| दुश्चर्मा कुनखी कुष्ठी श्वित्री च श्यावदन्तकः।<br>विद्धप्रजननश्चैव स्तेनः क्लीबोऽथ नास्तिकः ॥ ३७ ॥<br><br>मद्यपो वृषलीसक्तो वीरहा दिधिषूपतिः।<br>आगारदाही कुण्डाशी सोमविक्रयिणो द्विजाः ॥ ३८ ॥ | विकारयुक्त चर्म एवं नखवालों, कुष्ठरोगी, श्वेत कुष्ठरोगी, स्वभावतः काले दाँतवाला, विद्ध लिङ्गवाला, चोर, नपुंसक, नास्तिक, मद्य पीनेवाला, शूद्रा स्त्रीमें आसक्त, वीरहा (वह अग्निहोत्री जिसका अग्निहोत्र नष्ट हो गया है), विधवा स्त्रीसे विवाह करनेवाला, घरको जलानेवाला, कुण्ड (पतिके जीवित रहते अन्य पुरुषसे उत्पन्न संतान)-का भोजन करनेवाला तथा सोमलताका विक्रय करनेवाला—इस प्रकारके ब्राह्मण (श्राद्धादिमें त्याज्य हैं) ॥ ३७-३८ ॥ |
| परिवेत्ता तथा हिंस्रः परिवित्तिर्निराकृतिः।<br>पौनर्भवः कुसीदी च तथा नक्षत्रदर्शकः ॥ ३९ ॥ | परिवेत्ता अर्थात् बड़े भाईके अविवाहित अथवा अनग्निक रहते हुए विवाह तथा अग्नि स्वीकार करने-वाला छोटा भाई, हिंसा करनेवाला, परिवित्ति—(छोटे भाईके विवाहित होनेसे पहले अविवाहित रहनेवाला बड़ा भाई), निराकृति अर्थात् पञ्चमहायज्ञोंका अनुष्ठान न करनेवाला, पौनर्भव* (दूसरे पतिसे उत्पन्न पुत्र), ब्याज लेनेवाला तथा नक्षत्रदर्शक (ज्योतिषसे जीविका चलानेवाले)-का श्राद्धादिमें परित्याग करना चाहिये ॥ ३९ ॥ |
| गीतवादित्रनिरतो व्याधितः काण एव च।<br>हीनाङ्गश्चातिरिक्ताङ्गो ह्यवकीर्णिस्तथैव च ॥ ४० ॥ | गाने-बजानेमें निरत, रोगी, काना, हीन अङ्गोंवाला, अधिक अङ्गोंवाला, अवकीर्णी (स्त्रीसे सम्पर्क कर ब्रह्मचर्यव्रत नष्ट करनेवाला), कन्याको दूषित |
* मनुस्मृति (९। १७५)-के अनुसार।