संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३५८ * कूर्मपुराण *
| न श्राद्धे भोजयेन्मित्रं धनैः कार्योऽस्य संग्रहः।<br>पैशाची दक्षिणा सा हि नैवामुत्र फलप्रदा॥ २३॥ | श्राद्धमें मित्रको भोजन नहीं कराना चाहिये। इनका संरक्षण (संग्रह) धनके आदान-प्रदानद्वारा करना चाहिये। (यदि श्राद्धमें मित्रको भोजन कराकर दक्षिणा दी जाय तो) ऐसी दक्षिणा पैशाची होती है। यह परलोकमें कोई फल नहीं देती। (किसी विशेष स्थिति या उपर्युक्त कल्प-अनुकल्पके अभावमें) श्राद्धमें भले ही मित्रका (यथोचित) सत्कार करे, किंतु अभिरूप (विद्वान्, मनोज्ञ) पात्र होनेपर भी शत्रुका सत्कार नहीं करना चाहिये, (क्योंकि) द्वेष रखनेवालेके द्वारा भुक्त हवि परलोकमें निष्फल होती है॥ २३-२४॥ |
| कामं श्राद्धेऽर्चयेन्मित्रं नाभिरूपमपि त्वरिम्।<br>द्विषता हि हविर्भुक्तं भवति प्रेत्य निष्फलम्॥ २४॥<br>ब्राह्मणो ह्यनधीयानस्तृणाग्निरिव शाम्यति।<br>तस्मै हव्यं न दातव्यं न हि भस्मनि हूयते॥ २५॥ | (वेदादिका) अध्ययन न करनेवाला ब्राह्मण तृणमें लगी अग्निके समान शान्त (निस्तेज) हो जाता है। उसे हव्य (यथासम्भव देव-पित्र्य-कार्यमें भोजनके लिये निमन्त्रण) नहीं देना चाहिये, क्योंकि भस्ममें हवन नहीं किया जाता है। जिस प्रकार ऊसर भूमिमें बीज बोनेवाला कुछ फल नहीं प्राप्त करता, उसी प्रकार वेद न जाननेवालेको हवि देनेसे दाताको कोई फल नहीं मिलता। मन्त्रको न जाननेवाला वह ब्राह्मण देव और पितृकार्यमें जितने पिण्डों (ग्रासों)-को ग्रहण करता है, मृत्युके अनन्तर वह उतने ही स्थूल और प्रज्वलित लोहेके पिण्डों (ग्रासों)-का भक्षण करता है॥ २५-२७॥ |
| यथेरिणे बीजमुप्त्वा न वप्ता लभते फलम्।<br>तथानुचे हविर्दत्त्वा न दाता लभते फलम्॥ २६॥ | |
| यावतो ग्रसते पिण्डान् हव्यकव्येष्वमन्त्रवित्।<br>तावतो ग्रसते प्रेत्य दीप्तान् स्थूलांस्त्वयोगुडान्॥ २७॥<br>अपि विद्याकुलैर्युक्ता हीनवृत्ता नराधमाः।<br>यत्रैते भुञ्जते हव्यं तद् भवेदासुरं द्विजाः॥ २८॥ | हे द्विजो! विद्या-सम्पन्न तथा उत्तम कुलमें उत्पन्न होनेपर भी आचारहीन नीच मनुष्य दैव और पित्र्यकार्यमें जो हव्य आदि ग्रहण करते हैं, वह (हव्यादि) आसुरी हो जाता है। जिसकी तीन पीढ़ीतक वेद और यज्ञ आदिका उच्छेद हो जाता है, वह दुर्ब्राह्मण होता है, वह श्राद्ध आदिमें कभी भी पूजाके योग्य नहीं होता। शूद्रका नौकर, राजासे वेतन लेनेवाला, पतित (अधार्मिक), गाँवके पुरोहित, वध और बन्धनद्वारा जीविका चलानेवाले—ये छः ब्रह्मबन्धु होते हैं॥ २८-३०॥ |
| यस्य वेदश्च वेदी च विच्छिद्येते त्रिपूरुषम्।<br>स वै दुर्ब्राह्मणो नार्हः श्राद्धादिषु कदाचन॥ २९॥ | |
| शूद्रप्रेष्यो भृतो राज्ञो वृषलो ग्रामयाजकः।<br>वधबन्धोपजीवी च षडेते ब्रह्मबन्धवः॥ ३०॥<br>दत्तानुयोगान् वृत्त्यर्थं पतितान् मनुरब्रवीत्।<br>वेदविक्रयिणो ह्येते श्राद्धादिषु विगर्हिताः॥ ३१॥ | मनुने जीविकाके लिये नौकरी करनेवालेको पतित बतलाया है। ये सभी एवं वेदका विक्रय करनेवाले (ब्राह्मण) श्राद्ध आदि कार्योंमें निन्दित हैं। जो वेदका विक्रय करनेवाले, हीन अथवा उच्चवर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न तथा असमान वर्णोंका पौरोहित्य करनेवाले हैं, वे पतित कहे गये हैं॥ ३१-३२॥ |
| श्रुतिविक्रयिणो ये तु परपूर्वासमुद्भवाः।<br>असमानान् याजयन्ति पतितास्ते प्रकीर्तिताः॥ ३२॥ |