संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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| * अध्याय २१ * | ३५७ |
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| मातापित्रोर्हिते युक्तः प्रातःस्नायी तथा द्विजः।<br>अध्यात्मविन्मुनिर्दान्तो विज्ञेयः पंक्तिपावनः ॥ १३ ॥<br><br>ज्ञाननिष्ठो महायोगी वेदान्तार्थविचिन्तकः।<br>श्रद्धालुः श्राद्धनिरतो ब्राह्मणः पंक्तिपावनः ॥ १४ ॥<br><br>वेदविद्यारतः स्नातो ब्रह्मचर्यपरः सदा।<br>अथर्वणो मुमुक्षुश्च ब्राह्मणः पंक्तिपावनः ॥ १५ ॥<br><br>असमानप्रवरको ह्यसगोत्रस्तथैव च।<br>असम्बन्धी च विज्ञेयो ब्राह्मणः पंक्तिपावनः ॥ १६ ॥<br>भोजयेद् योगिनं पूर्वं तत्त्वज्ञानरतं यतिम्।<br>अलाभे नैष्ठिकं दान्तमुपकुर्वाणकं तथा ॥ १७॥<br><br>तदलाभे गृहस्थं तु मुमुक्षुं सङ्गवर्जितम्।<br>सर्वालाभे साधकं वा गृहस्थमपि भोजयेत् ॥ १८ ॥<br>प्रकृतेर्गुणतत्त्वज्ञो यस्याश्नाति यतिर्हविः।<br>फलं वेदविदां तस्य सहस्रादतिरिच्यते ॥ १९ ॥<br><br>तस्माद् यत्नेन योगीन्द्रमीश्वरज्ञानतत्परम्।<br>भोजयेद् हव्यकव्येषु अलाभादितरान् द्विजान् ॥ २० ॥<br>एष वै प्रथमः कल्पः प्रदाने हव्यकव्ययोः।<br>अनुकल्पस्त्वयं ज्ञेयः सदा सद्भिरनुष्ठितः ॥ २१ ॥<br><br>मातामहं मातुलं च स्वस्रीयं श्वशुरं गुरुम्।<br>दौहित्रं विट्पतिं बन्धुमृत्विग्याज्यौ च भोजयेत् ॥ २२ ॥ | माता-पिताके हितमें लगे हुए, प्रातःस्नान करनेवाले, अध्यात्मवेत्ता, मुनि एवं दान्त ब्राह्मणोंको पंक्तिपावन समझना चाहिये। ज्ञाननिष्ठ, महायोगी, वेदान्तके अर्थका विशेष चिन्तन करनेवाले, श्रद्धासम्पन्न तथा श्राद्धनिरत ब्राह्मण पंक्ति-पावन होते हैं। वेदविद्यामें निरत, सदा ब्रह्मचर्य-परायण, अथर्ववेदका अध्ययन करनेवाला, मुमुक्षु, स्नातक ब्राह्मण पंक्तिपावन होता है। असमान प्रवर, असमान गोत्र (-में सम्बन्ध करनेवाला) और असम्बन्धी (निषिद्ध सम्बन्धरहित) ब्राह्मणको पंक्तिपावन समझना चाहिये॥ १३-१६॥<br><br>सर्वप्रथम तत्त्वज्ञानमें निरत संयतचित्त योगीको भोजन कराना चाहिये। अभाव होनेपर (अर्थात् ऐसा ब्राह्मण न मिलनेपर) इन्द्रियजयी नैष्ठिक ब्रह्मचारी (जो ब्रह्मचर्य-व्रत स्वीकारकर यावज्जीवन गुरुकुलमें ही निवास करता है)-को और ऐसे ब्राह्मणके अभावमें उपकुर्वाणक (जो ब्रह्मचर्यव्रत पूर्णकर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करनेवाला है ऐसे ब्रह्मचारी) ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। उसका भी अभाव होनेपर आसक्तिरहित मुमुक्षु गृहस्थ ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। इन सभीके अभाव होनेपर साधक (ब्राह्मण) गृहस्थको भोजन कराना चाहिये॥ १७-१८॥<br><br>प्रकृतिके गुण और तत्त्वको जाननेवाला (तत्त्ववेत्ता) यति (संयतचित्त ब्राह्मण) जिस (व्यक्ति)-का भोजन करता है, उसे (सहस्रों) वेदज्ञको भोजन करानेकी अपेक्षा भी सहस्रगुना अधिक फल मिलता है। इसलिये ईश्वरज्ञानमें तत्पर श्रेष्ठ योगीको देवकार्य एवं पितृकार्यमें प्रयत्नपूर्वक भोजन कराना चाहिये। इनकी प्राप्ति न होनेपर दूसरे ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये॥ १९-२०॥<br><br>हव्य और कव्य प्रदान करनेमें यह प्रथम कल्प है। (इसके अभावमें) सज्जनों (वेदशास्त्रनिष्ठों)-द्वारा सदा अनुष्ठित इस अनुकल्पको जानना चाहिये—मातामह (नाना), मातुल (मामा), भांजा, ससुर, गुरु, दुहितापुत्र (नाती), विट्पति (जामाता), बन्धु (मौसी, बूआ एवं मामी आदिके पुत्र), ऋत्विक् तथा यज्ञ करानेवाले ब्राह्मणको भोजन कराया जाय॥ २१-२२॥ |