संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| * अध्याय २१ * | ३५७ |
|---|---|
| मातापित्रोर्हिते युक्तः प्रातःस्नायी तथा द्विजः।<br>अध्यात्मविन्मुनिर्दान्तो विज्ञेयः पंक्तिपावनः ॥ १३ ॥<br><br>ज्ञाननिष्ठो महायोगी वेदान्तार्थविचिन्तकः।<br>श्रद्धालुः श्राद्धनिरतो ब्राह्मणः पंक्तिपावनः ॥ १४ ॥<br><br>वेदविद्यारतः स्नातो ब्रह्मचर्यपरः सदा।<br>अथर्वणो मुमुक्षुश्च ब्राह्मणः पंक्तिपावनः ॥ १५ ॥<br><br>असमानप्रवरको ह्यसगोत्रस्तथैव च।<br>असम्बन्धी च विज्ञेयो ब्राह्मणः पंक्तिपावनः ॥ १६ ॥<br>भोजयेद् योगिनं पूर्वं तत्त्वज्ञानरतं यतिम्।<br>अलाभे नैष्ठिकं दान्तमुपकुर्वाणकं तथा ॥ १७॥<br><br>तदलाभे गृहस्थं तु मुमुक्षुं सङ्गवर्जितम्।<br>सर्वालाभे साधकं वा गृहस्थमपि भोजयेत् ॥ १८ ॥<br>प्रकृतेर्गुणतत्त्वज्ञो यस्याश्नाति यतिर्हविः।<br>फलं वेदविदां तस्य सहस्रादतिरिच्यते ॥ १९ ॥<br><br>तस्माद् यत्नेन योगीन्द्रमीश्वरज्ञानतत्परम्।<br>भोजयेद् हव्यकव्येषु अलाभादितरान् द्विजान् ॥ २० ॥<br>एष वै प्रथमः कल्पः प्रदाने हव्यकव्ययोः।<br>अनुकल्पस्त्वयं ज्ञेयः सदा सद्भिरनुष्ठितः ॥ २१ ॥<br><br>मातामहं मातुलं च स्वस्रीयं श्वशुरं गुरुम्।<br>दौहित्रं विट्पतिं बन्धुमृत्विग्याज्यौ च भोजयेत् ॥ २२ ॥ | माता-पिताके हितमें लगे हुए, प्रातःस्नान करनेवाले, अध्यात्मवेत्ता, मुनि एवं दान्त ब्राह्मणोंको पंक्तिपावन समझना चाहिये। ज्ञाननिष्ठ, महायोगी, वेदान्तके अर्थका विशेष चिन्तन करनेवाले, श्रद्धासम्पन्न तथा श्राद्धनिरत ब्राह्मण पंक्ति-पावन होते हैं। वेदविद्यामें निरत, सदा ब्रह्मचर्य-परायण, अथर्ववेदका अध्ययन करनेवाला, मुमुक्षु, स्नातक ब्राह्मण पंक्तिपावन होता है। असमान प्रवर, असमान गोत्र (-में सम्बन्ध करनेवाला) और असम्बन्धी (निषिद्ध सम्बन्धरहित) ब्राह्मणको पंक्तिपावन समझना चाहिये॥ १३-१६॥<br><br>सर्वप्रथम तत्त्वज्ञानमें निरत संयतचित्त योगीको भोजन कराना चाहिये। अभाव होनेपर (अर्थात् ऐसा ब्राह्मण न मिलनेपर) इन्द्रियजयी नैष्ठिक ब्रह्मचारी (जो ब्रह्मचर्य-व्रत स्वीकारकर यावज्जीवन गुरुकुलमें ही निवास करता है)-को और ऐसे ब्राह्मणके अभावमें उपकुर्वाणक (जो ब्रह्मचर्यव्रत पूर्णकर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करनेवाला है ऐसे ब्रह्मचारी) ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। उसका भी अभाव होनेपर आसक्तिरहित मुमुक्षु गृहस्थ ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। इन सभीके अभाव होनेपर साधक (ब्राह्मण) गृहस्थको भोजन कराना चाहिये॥ १७-१८॥<br><br>प्रकृतिके गुण और तत्त्वको जाननेवाला (तत्त्ववेत्ता) यति (संयतचित्त ब्राह्मण) जिस (व्यक्ति)-का भोजन करता है, उसे (सहस्रों) वेदज्ञको भोजन करानेकी अपेक्षा भी सहस्रगुना अधिक फल मिलता है। इसलिये ईश्वरज्ञानमें तत्पर श्रेष्ठ योगीको देवकार्य एवं पितृकार्यमें प्रयत्नपूर्वक भोजन कराना चाहिये। इनकी प्राप्ति न होनेपर दूसरे ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये॥ १९-२०॥<br><br>हव्य और कव्य प्रदान करनेमें यह प्रथम कल्प है। (इसके अभावमें) सज्जनों (वेदशास्त्रनिष्ठों)-द्वारा सदा अनुष्ठित इस अनुकल्पको जानना चाहिये—मातामह (नाना), मातुल (मामा), भांजा, ससुर, गुरु, दुहितापुत्र (नाती), विट्पति (जामाता), बन्धु (मौसी, बूआ एवं मामी आदिके पुत्र), ऋत्विक् तथा यज्ञ करानेवाले ब्राह्मणको भोजन कराया जाय॥ २१-२२॥ |
३५८ * कूर्मपुराण *
| न श्राद्धे भोजयेन्मित्रं धनैः कार्योऽस्य संग्रहः।<br>पैशाची दक्षिणा सा हि नैवामुत्र फलप्रदा॥ २३॥ | श्राद्धमें मित्रको भोजन नहीं कराना चाहिये। इनका संरक्षण (संग्रह) धनके आदान-प्रदानद्वारा करना चाहिये। (यदि श्राद्धमें मित्रको भोजन कराकर दक्षिणा दी जाय तो) ऐसी दक्षिणा पैशाची होती है। यह परलोकमें कोई फल नहीं देती। (किसी विशेष स्थिति या उपर्युक्त कल्प-अनुकल्पके अभावमें) श्राद्धमें भले ही मित्रका (यथोचित) सत्कार करे, किंतु अभिरूप (विद्वान्, मनोज्ञ) पात्र होनेपर भी शत्रुका सत्कार नहीं करना चाहिये, (क्योंकि) द्वेष रखनेवालेके द्वारा भुक्त हवि परलोकमें निष्फल होती है॥ २३-२४॥ |
| कामं श्राद्धेऽर्चयेन्मित्रं नाभिरूपमपि त्वरिम्।<br>द्विषता हि हविर्भुक्तं भवति प्रेत्य निष्फलम्॥ २४॥<br>ब्राह्मणो ह्यनधीयानस्तृणाग्निरिव शाम्यति।<br>तस्मै हव्यं न दातव्यं न हि भस्मनि हूयते॥ २५॥ | (वेदादिका) अध्ययन न करनेवाला ब्राह्मण तृणमें लगी अग्निके समान शान्त (निस्तेज) हो जाता है। उसे हव्य (यथासम्भव देव-पित्र्य-कार्यमें भोजनके लिये निमन्त्रण) नहीं देना चाहिये, क्योंकि भस्ममें हवन नहीं किया जाता है। जिस प्रकार ऊसर भूमिमें बीज बोनेवाला कुछ फल नहीं प्राप्त करता, उसी प्रकार वेद न जाननेवालेको हवि देनेसे दाताको कोई फल नहीं मिलता। मन्त्रको न जाननेवाला वह ब्राह्मण देव और पितृकार्यमें जितने पिण्डों (ग्रासों)-को ग्रहण करता है, मृत्युके अनन्तर वह उतने ही स्थूल और प्रज्वलित लोहेके पिण्डों (ग्रासों)-का भक्षण करता है॥ २५-२७॥ |
| यथेरिणे बीजमुप्त्वा न वप्ता लभते फलम्।<br>तथानुचे हविर्दत्त्वा न दाता लभते फलम्॥ २६॥ | |
| यावतो ग्रसते पिण्डान् हव्यकव्येष्वमन्त्रवित्।<br>तावतो ग्रसते प्रेत्य दीप्तान् स्थूलांस्त्वयोगुडान्॥ २७॥<br>अपि विद्याकुलैर्युक्ता हीनवृत्ता नराधमाः।<br>यत्रैते भुञ्जते हव्यं तद् भवेदासुरं द्विजाः॥ २८॥ | हे द्विजो! विद्या-सम्पन्न तथा उत्तम कुलमें उत्पन्न होनेपर भी आचारहीन नीच मनुष्य दैव और पित्र्यकार्यमें जो हव्य आदि ग्रहण करते हैं, वह (हव्यादि) आसुरी हो जाता है। जिसकी तीन पीढ़ीतक वेद और यज्ञ आदिका उच्छेद हो जाता है, वह दुर्ब्राह्मण होता है, वह श्राद्ध आदिमें कभी भी पूजाके योग्य नहीं होता। शूद्रका नौकर, राजासे वेतन लेनेवाला, पतित (अधार्मिक), गाँवके पुरोहित, वध और बन्धनद्वारा जीविका चलानेवाले—ये छः ब्रह्मबन्धु होते हैं॥ २८-३०॥ |
| यस्य वेदश्च वेदी च विच्छिद्येते त्रिपूरुषम्।<br>स वै दुर्ब्राह्मणो नार्हः श्राद्धादिषु कदाचन॥ २९॥ | |
| शूद्रप्रेष्यो भृतो राज्ञो वृषलो ग्रामयाजकः।<br>वधबन्धोपजीवी च षडेते ब्रह्मबन्धवः॥ ३०॥<br>दत्तानुयोगान् वृत्त्यर्थं पतितान् मनुरब्रवीत्।<br>वेदविक्रयिणो ह्येते श्राद्धादिषु विगर्हिताः॥ ३१॥ | मनुने जीविकाके लिये नौकरी करनेवालेको पतित बतलाया है। ये सभी एवं वेदका विक्रय करनेवाले (ब्राह्मण) श्राद्ध आदि कार्योंमें निन्दित हैं। जो वेदका विक्रय करनेवाले, हीन अथवा उच्चवर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न तथा असमान वर्णोंका पौरोहित्य करनेवाले हैं, वे पतित कहे गये हैं॥ ३१-३२॥ |
| श्रुतिविक्रयिणो ये तु परपूर्वासमुद्भवाः।<br>असमानान् याजयन्ति पतितास्ते प्रकीर्तिताः॥ ३२॥ |
| * अध्याय २१ * | ३५१ |
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| असंस्कृताध्यापका ये भृत्या वाध्यापयन्ति ये।<br>अधीयते तथा वेदान् पतितास्ते प्रकीर्तिताः ॥ ३३ ॥<br><br>वृद्धश्रावकनिर्ग्रन्थाः पञ्चरात्रविदो जनाः।<br>कापालिकाः पाशुपताः पाषण्डा ये च तद्विधाः ॥ ३४ ॥<br><br>यस्याश्नन्ति हवींष्येते दुरात्मानस्तु तामसाः।<br>न तस्य तद् भवेच्छ्राद्धं प्रेत्य चेह फलप्रदम् ॥ ३५ ॥ | जो असंस्कृतों (संस्काररहितों)-के अध्यापक हैं, वेतनके लिये अध्यापन तथा वेदाध्ययन करनेवाले हैं, वे पतित कहे गये हैं। वृद्ध श्रावक अर्थात् बौद्ध, निर्ग्रन्थ अर्थात् जैन, पाञ्चरात्रके ज्ञाता, कापालिक, पाशुपत (सम्प्रदायविशेषके) और उसी प्रकारके पाखंडी, तमोगुणी, दुरात्मा व्यक्ति—ये जिसके हविष्यान्नका भक्षण करते हैं, उसका किया श्राद्ध न तो इस लोकमें फल देनेवाला होता है और न परलोकमें ॥ ३३—३५ ॥ |
| अनाश्रमी यो द्विजः स्यादाश्रमी वा निरर्थकः।<br>मिथ्याश्रमी च ते विप्रा विज्ञेयाः पंक्तिदूषकाः ॥ ३६ ॥ | जो द्विज (ब्राह्मण) यथाविधि आश्रमको स्वीकार करनेवाले नहीं हैं अथवा नाममात्रके लिये किसी आश्रमका आश्रय लिये हैं, वे मिथ्याश्रमी कहे गये हैं, उन्हें पंक्तिदूषक समझना चाहिये ॥ ३६ ॥ |
| दुश्चर्मा कुनखी कुष्ठी श्वित्री च श्यावदन्तकः।<br>विद्धप्रजननश्चैव स्तेनः क्लीबोऽथ नास्तिकः ॥ ३७ ॥<br><br>मद्यपो वृषलीसक्तो वीरहा दिधिषूपतिः।<br>आगारदाही कुण्डाशी सोमविक्रयिणो द्विजाः ॥ ३८ ॥ | विकारयुक्त चर्म एवं नखवालों, कुष्ठरोगी, श्वेत कुष्ठरोगी, स्वभावतः काले दाँतवाला, विद्ध लिङ्गवाला, चोर, नपुंसक, नास्तिक, मद्य पीनेवाला, शूद्रा स्त्रीमें आसक्त, वीरहा (वह अग्निहोत्री जिसका अग्निहोत्र नष्ट हो गया है), विधवा स्त्रीसे विवाह करनेवाला, घरको जलानेवाला, कुण्ड (पतिके जीवित रहते अन्य पुरुषसे उत्पन्न संतान)-का भोजन करनेवाला तथा सोमलताका विक्रय करनेवाला—इस प्रकारके ब्राह्मण (श्राद्धादिमें त्याज्य हैं) ॥ ३७-३८ ॥ |
| परिवेत्ता तथा हिंस्रः परिवित्तिर्निराकृतिः।<br>पौनर्भवः कुसीदी च तथा नक्षत्रदर्शकः ॥ ३९ ॥ | परिवेत्ता अर्थात् बड़े भाईके अविवाहित अथवा अनग्निक रहते हुए विवाह तथा अग्नि स्वीकार करने-वाला छोटा भाई, हिंसा करनेवाला, परिवित्ति—(छोटे भाईके विवाहित होनेसे पहले अविवाहित रहनेवाला बड़ा भाई), निराकृति अर्थात् पञ्चमहायज्ञोंका अनुष्ठान न करनेवाला, पौनर्भव* (दूसरे पतिसे उत्पन्न पुत्र), ब्याज लेनेवाला तथा नक्षत्रदर्शक (ज्योतिषसे जीविका चलानेवाले)-का श्राद्धादिमें परित्याग करना चाहिये ॥ ३९ ॥ |
| गीतवादित्रनिरतो व्याधितः काण एव च।<br>हीनाङ्गश्चातिरिक्ताङ्गो ह्यवकीर्णिस्तथैव च ॥ ४० ॥ | गाने-बजानेमें निरत, रोगी, काना, हीन अङ्गोंवाला, अधिक अङ्गोंवाला, अवकीर्णी (स्त्रीसे सम्पर्क कर ब्रह्मचर्यव्रत नष्ट करनेवाला), कन्याको दूषित |
* मनुस्मृति (९। १७५)-के अनुसार।
| ३६० | * कूर्मपुराण * |
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| कन्यादूषी कुण्डगोलौ अभिशस्तोऽथ देवलः।<br>मित्रध्रुक् पिशुनश्चैव नित्यं भार्यानुवर्तकः॥ ४१॥ | करनेवाला, कुण्ड (पतिके जीवित रहते परपुरुषसे उत्पन्न संतान), गोलक (पतिकी मृत्युके बाद उपपतिसे उत्पन्न संतान), अभिशस्त (मिथ्यापवादग्रस्त), (देवल) — मन्दिर आदिसे आजीविका प्राप्त करनेवाले (पुजारी आदि), मित्रद्रोही, चुगली करनेवाला और नित्य भार्याके वशीभूत रहनेवाला — ये श्राद्धादिमें त्याज्य हैं॥ ४०-४१॥ |
| मातापित्त्रोर्गुरोस्त्यागी दारत्यागी तथैव च।<br>गोत्रभिद् भ्रष्टशौचश्च काण्डस्पृष्टस्तथैव च॥ ४२॥ | माता, पिता, गुरु तथा पत्नीका त्याग करनेवाला, सगोत्र (भाई-बन्धु) - में भेदबुद्धि पैदा करनेवाला, शौचभ्रष्ट (शौचाचारहीन), शस्त्रजीवी, संतानहीन, झूठी गवाही देनेवाला, याचक, रंगद्वारा जीविकोपार्जन करनेवाला (चित्रकार, नाट्यकार), समुद्रकी यात्रा करनेवाला, कृतघ्न और प्रतिज्ञा-भङ्ग करनेवाला, देवनिन्दापरायण, वेदनिन्दामें निरत तथा द्विजकी निन्दा करनेवाला — ये सभी श्राद्धादि कर्मोंमें त्याज्य हैं। कृतघ्न, चुगली करनेवाला, क्रूर, नास्तिक, वेदकी निन्दा करनेवाला, मित्रद्रोही तथा ऐन्द्रजालिक (मायावी, दाम्भिक) — ये विशेषरूपसे पंक्तिदूषक हैं॥ ४२-४५॥ |
| अनपत्यः कूटसाक्षी याचको रङ्गजीवकः।<br>समुद्रयायी कृतहा तथा समयभेदकः॥ ४३॥ | |
| देवनिन्दापरश्चैव वेदनिन्दारतस्तथा।<br>द्विजनिन्दारतश्चैते वर्ज्याः श्राद्धादिकर्मसु॥ ४४॥ | |
| कृतघ्नः पिशुनः क्रूरो नास्तिको वेदनिन्दकः।<br>मित्रध्रुक् कुहकश्चैव विशेषात् पंक्तिदूषकाः॥ ४५॥ | |
| सर्वे पुनरभोज्यान्नास्त्वदानाहेश्च कर्मसु।<br>ब्रह्मभावनिर्हस्ताश्च वर्जनीयाः प्रयत्नतः॥ ४६॥ | (उपर्युक्त) सभी प्रकारके व्यक्ति श्राद्धमें भोजन न कराने योग्य और सभी कर्मोंमें दानके अयोग्य होते हैं। ब्रह्मभावसे शून्य अर्थात् ब्राह्मणत्वसे च्युत व्यक्तियोंका विशेषरूपसे त्याग करना चाहिये॥ ४६॥ |
| शूद्रान्नरासपुष्टाङ्गः संध्योपासनवर्जितः।<br>महायज्ञविहीनश्च ब्राह्मणः पंक्तिदूषकः॥ ४७॥ | शूद्रके अन्न एवं रससे पुष्ट हुए अङ्गोंवाला, संध्योपासनासे रहित, पञ्चमहायज्ञोंसे शून्य ब्राह्मण पंक्तिदूषक होता है। पढ़े गये वेदादिका विस्मरण करनेवाला, स्नान एवं होमसे रहित, तमोगुणी तथा रजोगुणी ब्राह्मण पंक्तिदूषक होता है॥ ४७-४८॥ |
| अधीतनाशनश्चैव स्नानहोमविवर्जितः।<br>तामसो राजसश्चैव ब्राह्मणः पंक्तिदूषकः॥ ४८॥ | |
| बहुनात्र किमुक्तेन विहितान् ये न कुर्वते।<br>निन्दितानाचरन्त्येते वर्जनीयाः प्रयत्नतः॥ ४९॥ | अधिक क्या कहा जाय। जो शास्त्रविहित स्वकर्मोंको नहीं करते और शास्त्रनिषिद्ध (निन्दित) कर्मोंका आचरण करते हैं, वे प्रयत्नपूर्वक त्याग करने योग्य हैं॥ ४९॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे एकविंशोऽध्यायः॥ २१॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २१॥
* अध्याय २२ * ३६१
बाईसवाँ अध्याय
श्राद्ध-प्रकरणमें ब्राह्मण निमन्त्रित करनेकी विधि, निमन्त्रित ब्राह्मणके कर्तव्य, श्राद्धविधि, श्राद्धमें प्रशस्त पात्र, पितरोंकी प्रार्थना, श्राद्धके दिन निषिद्ध कर्म, वृद्धिश्राद्धका विधान, श्राद्ध-प्रकरणका उपसंहार
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले—सावधानीपूर्वक गोबर और जलसे (श्राद्ध) भूमिको शुद्धकर सभी ब्राह्मणोंकी सेवामें पहुँचकर सज्जन पुरुषोंद्वारा उन्हें निमन्त्रित करना चाहिये। श्राद्धके पहले दिन ब्राह्मणोंकी (नम्रभावसे आदरपूर्वक) पूजाकर उनसे कहना चाहिये—'कल हमारे यहाँ श्राद्ध होगा (आपलोग कृपाकर पधारें)'। ऐसा असम्भव होनेपर दूसरे (दिन) अर्थात् श्राद्धके ही दिन यथोक्त लक्षणोंसे समन्वित ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करना चाहिये॥ १-२॥ |
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| गोमयेनोदकैर्भूमिं शोधयित्वा समाहितः।<br>संनिपत्य द्विजान् सर्वान् साधुभिः संनिमन्त्रयेत्॥ १ ॥<br><br>श्वो भविष्यति मे श्राद्धं पूर्वेद्युरभिपूज्य च।<br>असम्भवे परेद्युर्वा यथोक्तैर्लक्षणैर्युतान्॥ २ ॥ | |
| तस्य ते पितरः श्रुत्वा श्राद्धकालमुपस्थितम्।<br>अन्योन्यं मनसा ध्यात्वा सम्पत्तन्ति मनोजवाः॥ ३ ॥<br><br>ब्राह्मणैस्ते सहाश्नन्ति पितरो ह्यन्तरिक्षगाः।<br>वायुभूतास्तु तिष्ठन्ति भुक्त्वा यान्ति परां गतिम्॥ ४ ॥<br><br>आमन्त्रिताश्च ते विप्राः श्राद्धकाल उपस्थिते।<br>वसेयुर्नियताः सर्वे ब्रह्मचर्यपरायणाः॥ ५ ॥ | मनके समान शीघ्र गतिवाले पितर जब यह सुन लेते हैं कि श्राद्धकाल उपस्थित है, तब परस्पर विचारकर श्राद्धकर्ताके यहाँ एकत्र हो जाते हैं। अन्तरिक्षमें विचरण करनेवाले पितर वायुरूपसे स्थित रहते हैं, ब्राह्मणोंके साथ भोजन करते हैं और भोजन करके परमगति प्राप्त करते हैं। श्राद्धका समय आनेपर सभी आमन्त्रित ब्राह्मणोंको संयमी और ब्रह्मचर्यपरायण होकर रहना चाहिये॥ ३-५॥ |
| अक्रोधनोऽत्वरोऽमत्तः सत्यवादी समाहितः।<br>भारं मैथुनमध्वानं श्राद्धकृद् वर्जयेज्जपम्॥ ६ ॥ | श्राद्ध करनेवालेको क्रोध, उतावलापन तथा प्रमादका त्यागकर समाहित होना चाहिये, सत्य बोलना चाहिये। उसे भारका ढोना, मैथुन, मार्गगमन (यात्रा आदि) और जपका (किसी कामनापरक यज्ञादिका श्राद्धके समय) परित्याग करना चाहिये॥ ६ ॥ |
| आमन्त्रितो ब्राह्मणो वा योऽन्यस्मै कुरुते क्षणम्।<br>स याति नरकं घोरं सूकरत्वं प्रयाति च॥ ७ ॥<br><br>आमन्त्रयित्वा यो मोहादन्यं चामन्त्रयेद् द्विजम्।<br>स तस्मादधिकः पापी विष्ठाकीटोऽभिजायते॥ ८ ॥<br><br>श्राद्धे निमन्त्रितो विप्रो मैथुनं योऽधिगच्छति।<br>ब्रह्महत्यामवाप्नोति तिर्यग्योनौ च जायते॥ ९ ॥ | (पहलेसे ही) निमन्त्रित ब्राह्मण (यदि) किसी दूसरेका निमन्त्रण स्वीकार करता है तो वह घोर नरकमें जाता है और बादमें सूकरकी योनि प्राप्त करता है। (किसी एक) ब्राह्मणको आमन्त्रित करके जो मोहसे दूसरेको आमन्त्रित करता है, वह व्यक्ति उससे भी अधिक पापी होता है (जो निमन्त्रित होनेपर भी दूसरी जगह जाता है) और विष्ठाका कीड़ा होता है। श्राद्धमें निमन्त्रित जो ब्राह्मण मैथुन करता है, वह ब्रह्महत्या (के पाप)-को प्राप्त करता है और बादमें तिर्यक्-योनिमें उत्पन्न होता है॥ ७-९॥ |
३६२
- कूर्मपुराण *
| निमन्त्रितस्तु यो विप्रो ह्यध्वानं याति दुर्मतिः।<br>भवन्ति पितरस्तस्य तं मासं पांशुभोजनाः ॥ १० ॥<br>निमन्त्रितस्तु यः श्राद्धे प्रकुर्यात् कलहं द्विजः।<br>भवन्ति तस्य तन्मासं पितरो मलभोजनाः ॥ ११ ॥<br><br>तस्मान्निमन्त्रितः श्राद्धे नियतात्मा भवेद् द्विजः।<br>अक्रोधनः शौचपरः कर्ता चैव जितेन्द्रियः ॥ १२ ॥<br>श्वोभूते दक्षिणां गत्वा दिशं दर्भान् समाहितः।<br>समूलानाहरेद् वारि दक्षिणाग्रान् सुनिर्मलान् ॥ १३ ॥<br><br>दक्षिणाप्रवणं स्निग्धं विभक्तं शुभलक्षणम्।<br>शुचिं देशं विविक्तं च गोमयेनोपलेपयेत् ॥ १४ ॥<br><br>नदीतीरेषु तीर्थेषु स्वभूमौ चैव सानुषु।<br>विविक्तेषु च तृप्यन्ति दत्तेन पितरः सदा ॥ १५ ॥<br>पारक्ये भूमिभागे तु पितॄणां नैव निर्वपेत्।<br>स्वामिभिस्तद् विहन्येत मोहाद्यत् क्रियते नरैः ॥ १६ ॥<br><br>अटव्यः पर्वताः पुण्यास्तीर्थान्यायतनानि च।<br>सर्वाण्यस्वामिकान्याहुर्न हि तेषु परिग्रहः ॥ १७ ॥<br><br>तिलान् प्रविकिरेत् तत्र सर्वतो बन्धयेदजान्।<br>असुरोपहतं सर्वं तिलैः शुध्यत्यजेन वा ॥ १८ ॥<br>ततोऽन्नं बहुसंस्कारं नैकव्यञ्जनमच्युतम्।<br>चोष्यपेयसमृद्धं च यथाशक्त्या प्रकल्पयेत् ॥ १९ ॥<br><br>ततो निवृत्ते मध्याह्ने लुप्तलोमनखान् द्विजान्।<br>अभिगम्य यथामार्गं प्रयच्छेद् दन्तधावनम् ॥ २० ॥<br>तैलमभ्यञ्जनं स्नानं स्नानीयं च पृथग्विधम्।<br>पात्रैरुदुम्बरैर्दद्याद् वैश्वदैवत्यपूर्वकम् ॥ २१ ॥<br><br>ततः स्नात्वा निवृत्तेभ्यः प्रत्युत्थाय कृताञ्जलिः।<br>पाद्यमाचमनीयं च सम्प्रयच्छेद् यथाक्रमम् ॥ २२ ॥<br><br>ये चात्र विश्वेदेवानां विप्राः पूर्वं निमन्त्रिताः।<br>प्राङ्मुखान्यासनान्येषां त्रिदर्भोपहितानि च ॥ २३ ॥ | श्राद्धमें निमन्त्रित जो दुर्बुद्धि ब्राह्मण यात्रा करता है, उसके पितर उस महीने धूलिका भक्षण करते हैं श्राद्धमें निमन्त्रित जो ब्राह्मण कलह करता है, उस महीनेमें उसके पितर मलका भोजन करते हैं, इसलिये श्राद्धमें निमन्त्रित ब्राह्मणको नियतात्मा, क्रोधशून्य तथा शौचपरायण रहना चाहिये और श्राद्धकर्ताको भी जितेन्द्रिय होना चाहिये ॥ १०-१२ ॥<br><br>श्राद्ध-दिनके पूर्व दिन समाहित होकर दक्षिण दिशामें जाकर अत्यन्त निर्मल, जड़सहित और दक्षिणकी ओर झुके हुए कुशों और जलको लाना चाहिये। दक्षिणकी ओर झुके हुए, स्निग्ध, अन्यके सम्बन्धसे रहित (अर्थात् स्व-स्वत्ववाले) शुभ लक्षणोंवाले, पवित्र तथा एकान्त स्थानका गोमयसे उपलेपन करना चाहिये। नदियोंके किनारों, तीर्थों, अपनी भूमिमें, पर्वतके शिखरों तथा एकान्त स्थानोंपर श्राद्ध करनेसे पितर सदा संतुष्ट रहते हैं ॥ १३-१५ ॥<br><br>दूसरेकी भूमिमें पितरोंका श्राद्ध नहीं करना चाहिये। यदि मोहवश मनुष्योंके द्वारा ऐसा किया जाता है तो वह कर्म (भूमिके) स्वामीके द्वारा विफल (नष्ट) कर दिया जाता है। जंगल, पर्वत, पुण्यतीर्थ, देवमन्दिर—ये सभी स्थान बिना स्वामीवाले (अर्थात् सार्वजनिक) कहे जाते हैं। इनपर किसीका स्वामित्व नहीं होता। (श्राद्धभूमिमें) सर्वत्र तिलोंको फैलाना चाहिये। तिलोंके द्वारा असुरोंसे उपहत अर्थात् आक्रान्त (श्राद्धभूमि) शुद्ध हो जाती है ॥ १६-१८ ॥<br><br>तदनन्तर अनेक प्रकारसे शुद्ध किये गये प्रशस्त अन्नसे ऐसे अनेक प्रकारके भोज्य पक्वान्न बनाने चाहिये, जो चोष्य, पेय आदि उत्तमोत्तम व्यंजनोंसे यथाशक्ति समृद्ध हों। तदनन्तर मध्याह्नकाल व्यतीत होनेपर कृतक्षौर (नख और बाल कटाये हुए) द्विजों (ब्राह्मणों)-से मार्गमें मिलकर उन्हें दन्तधावन प्रदान करे ॥ १९-२० ॥<br><br>वैश्वदैवत्य मन्त्रका उच्चारण कर उन्हें उदुम्बरके पात्रोंद्वारा अभ्यञ्जनके लिये उपयोगी तैल, स्नानके लिये जल अलग-अलग दे। तदुपरान्त उनके स्नान कर लेनेपर उठकर हाथ जोड़ते हुए उन्हें क्रमशः पाद्य एवं आचमन देना चाहिये। विश्वेदेवोंके निमित्त जो ब्राह्मण पहले निमन्त्रित हैं, उन्हें तीन कुश रखकर पूर्वाभिमुख आसन प्रदान करना चाहिये ॥ २१-२३ ॥ |
* अध्याय २२ * ३६३
| दक्षिणामुखयुक्तानि पितॄणामासनानि च।<br>दक्षिणाग्रैकदर्भाणि प्रोक्षितानि तिलोदकैः ॥ २४ ॥<br><br>तेषूपवेशयेदेतानासनं स्पृश्य स द्विजम्।<br>आसध्वमिति संजल्पन् आसनास्ते पृथक् पृथक् ॥ २५ ॥<br>द्वौ दैवे प्राङ्मुखौ पित्र्ये त्रयश्चोदङ्मुखास्तथा।<br>एकैकं वा भवेत् तत्र देवमातामहेष्वपि ॥ २६ ॥<br><br>सत्क्रियां देशकालौ च शौचं ब्राह्मणसम्पदम्।<br>पञ्चैतान् विस्तरो हन्ति तस्मान्नेहेत विस्तरम् ॥ २७ ॥<br><br>अपि वा भोजयेदेकं ब्राह्मणं वेदपारगम्।<br>श्रुतशीलादिसम्पन्नमलक्षणविवर्जितम् ॥ २८ ॥ | पितृ-ब्राह्मणोंको दक्षिणाग्र कुशके ऊपर तिलोदकसे प्रोक्षितकर दक्षिणाभिमुख आसन प्रदान करना चाहिये। श्राद्धकर्ता आसनका स्पर्श करते हुए 'आसध्वम्'—'बैठिये' इस प्रकार कहकर उन पितृ-ब्राह्मणोंको पृथक्-पृथक् आसनपर बिठाये १ ॥ २४-२५ ॥<br>(विश्वेदेव) देवसम्बन्धी दो ब्राह्मणोंको पूर्वाभिमुख, पित्र्यसम्बन्धी तीन ब्राह्मणोंको उत्तराभिमुख बैठाना चाहिये अथवा देवसम्बन्धी और मातामह (पित्र्यसम्बन्धी)-के भी निमित्त एक-एक ब्राह्मणको बैठाना चाहिये। (श्राद्धमें) सत्कार, देश, काल, पवित्रता और ब्राह्मणसम्पद्—इन पाँचोंका (अधिक) विस्तारके कारण नाश होता है, अतः विस्तारकी इच्छा नहीं करनी चाहिये २, विस्तारकी अपेक्षा श्रुतशील आदिसे सम्पन्न अनपेक्षित क्षणोंसे रहित वेदके पारंगत एक ही ब्राह्मणको भोजन कराना उचित है ॥ २६-२८ ॥ |
| उद्धृत्य पात्रे चान्नं तत् सर्वस्मात् प्रकृतात् पुनः।<br>देवतायतने चास्मै निवेद्यान्यत् प्रवर्तयेत् ॥ २९ ॥<br><br>प्रास्येदग्नौ तदन्नं तु दद्याद् वा ब्रह्मचारिणे।<br>तस्मादेकमपि श्रेष्ठं विद्वांसं भोजयेद् द्विजम् ॥ ३० ॥ | किसी पात्रमें समस्त प्रकृत वस्तुओं (श्राद्धीय भोज्य पदार्थोंमेंसे उचित मात्रामें भोज्य लेकर) देवमन्दिरमें देवताके उद्देश्यसे प्रथम निवेदित करके अन्य कार्य प्रारम्भ करना चाहिये, उस (श्राद्धीय लवणरहित सिद्ध) अन्नको अग्निमें छोड़ना चाहिये अथवा ब्रह्मचारीको देना चाहिये। अतः एक भी श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये ॥ २९-३० ॥ |
| भिक्षुको ब्रह्मचारी वा भोजनार्थमुपस्थितः।<br>उपविष्टेषु यः श्राद्धे कामं तमपि भोजयेत् ॥ ३१ ॥<br><br>अतिथिर्यस्य नाश्नाति न तच्छ्राद्धं प्रशस्यते।<br>तस्मात् प्रयत्नाच्छ्राद्धेषु पूज्या ह्यतिथयो द्विजैः ॥ ३२ ॥ | श्राद्धमें निमन्त्रित ब्राह्मणोंके बैठ जानेपर भोजनके निमित्त उपस्थित हुए भिक्षुक अथवा ब्रह्मचारीको भी उनकी इच्छानुसार (श्राद्धमें जो यथेष्ट हो वह) भोजन कराना चाहिये। जिसके श्राद्धमें अतिथि भोजन नहीं करता, उसका श्राद्ध प्रशंसनीय नहीं होता। इसलिये द्विजोंको प्रयत्नपूर्वक श्राद्धोंमें अतिथियोंका पूजन करना चाहिये ॥ ३१-३२ ॥ |
| आतिथ्यरहिते श्राद्धे भुञ्जते ये द्विजातयः।<br>काकयोनिं व्रजन्त्येते दाता चैव न संशयः ॥ ३३ ॥<br><br>हीनाङ्गः पतितः कुष्ठी व्रणी पुक्कसनास्तिकौ।<br>कुक्कुटाः शूकरा श्वानो वर्ज्याः श्राद्धेषु दूरतः ॥ ३४ ॥ | जो द्विज (ब्राह्मण) आतिथ्यरहित श्राद्धमें भोजन करते हैं, वे कौएकी योनिमें जाते हैं और दाताकी भी यही गति होती है, इसमें संदेह नहीं। श्राद्धमें हीन अङ्गवाला, पतित, कुष्ठरोगी, व्रणयुक्त, पुक्कस (जातिविशेष), नास्तिक, कुक्कुट, शूकर तथा कुत्ता—ये दूरसे ही हटा देने योग्य हैं ॥ ३३-३४ ॥ |
१-सामान्यतः ब्राह्मणकी जगह कुशपर श्राद्ध किया जाता है, किंतु सपात्रिक श्राद्धमें ब्राह्मणको बैठाकर श्राद्ध करनेका विधान है।
२-इसका आशय यह है कि श्राद्धके अवसरपर अधिक विस्तार करनेपर यथायोग्य सत्कार, उचित देश, श्राद्धके शास्त्रविहित काल, यथाशास्त्र पवित्रता तथा श्राद्धयोग्य ब्राह्मणकी सुलभता निश्चित ही संदिग्ध हो जाती है।
| ३६४ | * कूर्मपुराण * |
|---|---|
| बीभत्सुमशुचिं नग्नं मत्तं धूर्तं रजस्वलाम्।<br>नीलकाषायवसनं पाषण्डांश्च विवर्जयेत् ॥ ३५॥ | वीभत्स, अपवित्र, नग्न, मत्त, धूर्त, रजस्वला स्त्री, नीला और कषाय वस्त्र धारण करनेवाले तथा पाखंडीका परित्याग करना चाहिये ॥ ३५॥ |
| यत् तत्र क्रियते कर्म पैतृकं ब्राह्मणान् प्रति।<br>तत्सर्वमेव कर्तव्यं वैश्वदैवत्यपूर्वकम् ॥ ३६॥ | श्राद्धमें पितृ-ब्राह्मणोंके प्रति जो भी कर्म किया जाता है, वह सब वैश्वदेवकर्मके अनन्तर करना चाहिये। यथाविधि (श्राद्धीय भोजनमें) बैठे हुए उन सभी (ब्राह्मणों)-को आभूषण, माला, यज्ञसूत्र, शिरोवेष्टन, धूप, वस्त्र तथा अनुलेपन आदिके द्वारा अलंकृत करना चाहिये ॥ ३६-३७॥ |
| यथोपविष्टान् सर्वांस्तानलंकुर्याद् विभूषणैः।<br>स्रग्दामभिः शिरोवेष्टैर्धूपवासोऽनुलेपनैः ॥ ३७॥<br>ततस्त्वावाहयेद् देवान् ब्राह्मणानामनुज्ञया।<br>उदङ्मुखो यथान्यायं विश्वे देवास इत्यृचा ॥ ३८॥ | तदनन्तर ब्राह्मणोंकी आज्ञासे उत्तराभिमुख होकर यथाविधि 'विश्वे देवास०' इस ऋचाका पाठकर देवोंका आवाहन करना चाहिये। दो पवित्र (कुश) ग्रहणकर 'शं नो देवी०'—यह मन्त्र पढ़कर प्रक्षालित पात्रमें जल डाले और 'यवोऽसीति०' मन्त्रसे यव (जौ) भी डाले। 'या दिव्या०' इस मन्त्रसे (ब्राह्मणके) हाथपर अर्घ (अर्घपात्रका जल) छोड़े और यथाशक्ति गन्ध, माला, धूप तथा दीप आदि प्रदान करे ॥ ३८-४०॥ |
| द्वे पवित्रे गृहीत्वाथ भाजने क्षालिते पुनः।<br>शं नो देव्या जलं क्षिप्त्वा यवोऽसीति यवांस्तथा ॥ ३९॥ | |
| या दिव्या इति मन्त्रेण हस्ते त्वर्घ्यं विनिक्षिपेत्।<br>प्रदद्याद् गन्धमाल्यानि धूपादीनि च शक्तितः ॥ ४०॥<br>अपसव्यं ततः कृत्वा पितॄणां दक्षिणामुखः।<br>आवाहनं ततः कुर्यादुशन्तस्त्वेत्यृचा बुधः ॥ ४१॥ | तदनन्तर विद्वान् व्यक्तिको अपसव्य एवं दक्षिणाभिमुख होकर 'उशन्तस्त्व०' इस ऋचासे पितरोंका आवाहन करना चाहिये। आवाहन करके उनकी आज्ञासे 'आ यन्तु नः०' इस मन्त्रका जप करना चाहिये। 'शं नो देवी०' इस मन्त्रसे पात्रमें जल डाले और 'तिलोऽसि०' इस मन्त्रसे तिल भी छोड़े। पहलेके समान अर्घ प्रदानकर अथवा ब्राह्मणोंके हाथमें (जलादि) प्रदानकर समाहित होकर पात्रमें संस्रव-अर्घका अवशिष्ट जल रखे। तदनन्तर 'पितृभ्यःस्थानम्०' इस मन्त्रसे पात्रको अधोमुख (उलटकर) रखे। घृतयुक्त अन्न लेकर 'अग्नौ करिष्ये' ऐसा पूछे और (उन ब्राह्मणोंद्वारा) 'कुरुष्व—करो' ऐसी आज्ञा प्राप्त होनेपर उपवीती (सव्य होकर) हवन (अग्नौकरण) करे। हाथमें कुश लेकर और यज्ञोपवीती (सव्य) होकर होम करना चाहिये। पितृसम्बन्धी कार्य प्राचीनावीती (अपसव्य) होकर करे और वैश्वदेवसम्बन्धी कार्य होमके समान अर्थात् सव्य होकर करे ॥ ४१-४५॥ |
| आवाह्य तदनुज्ञातो जपेदा यन्तु नस्ततः।<br>शं नो देव्योदकं पात्रे तिलोऽसीति तिलांस्तथा ॥ ४२॥ | |
| क्षिप्त्वा चार्घं यथापूर्वं दत्त्वा हस्तेषु वै पुनः।<br>संस्रवांश्च ततः सर्वान् पात्रे कुर्यात् समाहितः।<br>पितृभ्यः स्थानमतेन न्युब्जं पात्रं निधापयेत् ॥ ४३॥ | |
| अग्नौ करिष्येत्यादाय पृच्छत्यन्नं घृतप्लुतम्।<br>कुरुष्वेत्यभ्यनुज्ञातो जुहुयादुपवीतवान् ॥ ४४॥ | |
| यज्ञोपवीतिना होमः कर्तव्यः कुशपाणिना।<br>प्राचीनावीतिना पित्र्यं वैश्वदेवं तु होमवत् ॥ ४५॥ | |
| दक्षिणं पातयेज्जानुं देवान् परिचरन् पुमान्।<br>पितॄणां परिचर्यासु पातयेदितरं तथा ॥ ४६॥ | पुरुषको दाहिना जानु जमीनपर रखकर देवोंकी परिचर्या करनी चाहिये और पितरोंकी परिचर्यामें बायाँ जानु जमीनपर रखना चाहिये ॥ ४६॥ |
- अध्याय २२ * ३६५
| सोमाय वै पितृमते स्वधा नम इति ब्रुवन्।<br>अग्नये कव्यवाहाय स्वधेति जुहुयात् ततः॥ ४७ ॥ | तब ‘सोमाय वै पितृमते स्वधा नमः’ इस मन्त्रका उच्चारणकर ‘अग्नये कव्यवाहनाय स्वधा’ ऐसा कहकर हवन करे॥ ४७ ॥ |
| अग्न्यभावे तु विप्रस्य पाणावेवोपपादयेत्।<br>महादेवान्तिके वाथ गोष्ठे वा सुसमाहितः ॥ ४८ ॥ | अग्निके अभाव होनेपर सावधानचित्त होकर ब्राह्मणके हाथपर, महादेवके समीप अथवा गोशालामें हवनीय द्रव्य रखना चाहिये। |
| ततस्तैरभ्यनुज्ञातो गत्वा वै दक्षिणां दिशम्।<br>गोमयेनोपलिप्योर्वी स्थानं कृत्वा तु सैकतम् ॥ ४९ ॥<br><br>मण्डलं चतुरस्रं वा दक्षिणावनतं शुभम्।<br>त्रिरुल्लिखेत् तस्य मध्यं दर्भेणैकेन चैव हि ॥ ५० ॥<br><br>ततः संस्तीर्य तत्स्थाने दर्भान् वै दक्षिणाग्रकान्।<br>त्रीन् पिण्डान् निर्वपेत् तत्र हविः शेषात् समाहितः ॥ ५१ ॥ | तदनन्तर उनकी आज्ञा प्राप्तकर दक्षिण दिशामें जाकर भूमिको गोमय (गोबर)-से लीपकर उस स्थानमें बालू बिछाये। तदनन्तर उस स्थानपर दक्षिणकी ओर झुकी हुई गोल अथवा चौकोर शुभ (बालुकामय) बेदी बनाये, उस बेदीके बीचमें एक कुशसे तीन रेखा खींचे और उस स्थान (बेदी)-पर दक्षिणाग्र कुशोंको बिछाकर हविके बचे हुए अंशसे निर्मित तीन पिण्ड उस (बेदी)-पर प्रदान करे॥ ४८-५१॥ |
| न्युप्य पिण्डांस्तु तं हस्तं निमृज्याल्लेपभागिनाम्।<br>तेषु दर्भेष्वथाचम्य त्रिरायम्य शनैरसूनू।<br>तदन्नं तु नमस्कुर्यात् पितॄनेव च मन्त्रवित् ॥ ५२ ॥ | पिण्ड-प्रदानके अनन्तर लेपभागके अधिकारी* पितरोंके लिये पिण्डाधार-कुशोंके मूलमें उस (पिण्ड-शेषसे संसृष्ट) हाथका प्रोक्षण करे। तदनन्तर मन्त्रवेत्ताको चाहिये कि आचमन करे और धीरे-धीरे श्वास खींचकर अपने बायेंसे पीछे मुख करके धीरे-धीरे श्वास छोड़ते हुए पिण्डोंके सामने अपना मुख कर पूरा श्वास छोड़े तथा उस अन्न एवं पितरोंको नमस्कार करे। पुनः पिण्डके समीप (ऊपर) धीरे-धीरे (अर्घपात्रका) शेष जल छोड़े (इसे अवनेजन कहते हैं)। |
| उदकं निनयेच्छेषं शनैः पिण्डान्तिके पुनः।<br>अवजिघ्रेच्च तान् पिण्डान् यथान्युप्तान् समाहितः ॥ ५३ ॥ | तदनन्तर सावधानीके साथ रखे हुए उन पिण्डोंको झुककर क्रमानुसार सूंघे (और पाकपात्रमें रख दे)॥ ५२-५३॥ |
| अथ पिण्डावशिष्टान्नं विधिना भोजयेद् द्विजान्।<br>मांसान्यपूपान् विविधान् दद्यात् कृसरपायसम् ॥ ५४ ॥<br><br>सूपशाकफलानीक्षून् पयो दधि घृतं मधु।<br>अन्नं चैव यथाकामं विविधं भक्ष्यपेयकम् ॥ ५५ ॥ | पिण्डदानसे बचा हुआ अन्न ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक खिलाना चाहिये। पूआ, कृसर, पायस (तिलके साथ पकाये चावलकी खीर), सूप, शाक, फल, ईख, दूध, दही, घृत, मधु, अन्न तथा अनेक प्रकारके खाने और पीने योग्य पदार्थ उनकी (ब्राह्मणोंकी) रुचिके अनुसार खिलाने चाहिये॥ ५४-५५॥ |
| यद यदिष्टं द्विजेन्द्राणां तत्सर्वं विनिवेदयेत्।<br>धान्यांस्तिलांश्च विविधान् शर्करा विविधास्तथा ॥ ५६ ॥ | श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको जो-जो रुचिकर हो (और श्राद्धमें विहित हो) वह सब देना चाहिये। साथ ही अनेक प्रकारके धान्य, तिल तथा शर्कराका दान करना चाहिये॥ ५६॥ |
* पितामहके ऊपरके प्रपितामह आदि तीसरी परम्परासे आगेके सभी पितर पिण्डके अधिकारी नहीं होते हैं, अपितु पिण्ड बनाते समय हाथमें जो पिण्डका शेष अन्न संसृष्ट (लगा) रहता है, उसीको ग्रहण करनेके अधिकारी होते हैं, अतः प्रपितामहके आगेकी पीढ़ीवाले पितरोंको 'लेपभागभुक्' कहा जाता है। इनकी तृप्ति तभी होती है, जब प्रपितामहतक तीन परम्पराको पिण्ड प्रदान कर लेनेके अनन्तर पिण्डोंके आधारकुशोंके मूलमें उन दोनों हाथोंका प्रोक्षण किया जाय, जिनसे पिण्डोंको बनाया गया है।
३६६ * कूर्मपुराण *
| उष्मन्नं द्विजातिभ्यो दातव्यं श्रेय इच्छता ।<br>अन्यत्र फलमूलेभ्यः पानकेभ्यस्तथैव च ॥ ५७ ॥ | कल्याण प्राप्त करनेकी इच्छावाले (श्राद्धकर्ताको चाहिये कि) ब्राह्मणोंको फल, मूल और पानक (विविध स्वादयुक्त पेय पदार्थविशेष)-को छोड़कर अन्य सभी अन्न उष्ण-अवस्थामें (गरम-गरम) प्रदान करे ॥ ५७॥ |
| नाश्रूणि पातयेज्जातु न कुप्येन्नानृतं वदेत्।<br>न पादेन स्पृशेदन्नं न चैतदवधूनयेत् ॥ ५८ ॥ | (श्राद्धकर्ता) कभी भी अश्रुपात न करे, न कोप करे, न झूठ बोले, पाँवसे अन्नको स्पर्श न करे और न अन्नका (पैरोंसे) अवधूनन (मर्दन) करे। |
| क्रोधेन चैव यद् दत्तं यद् भुक्तं त्वरया पुनः ।<br>यातुधाना विलुम्पन्ति जल्पता चोपपादितम् ॥ ५९ ॥ | क्रोध करके जो दिया जाता है, जल्दी-जल्दी जो भोजन किया जाता है और बोलते हुए जो खाया जाता है, उस पदार्थको राक्षस हर लेते हैं। ब्राह्मणोंके समीप स्वेदयुक्त शरीरसे न रहे। श्राद्धस्थलसे श्येन, |
| स्विन्नगात्रो न तिष्ठेत संनिधौ तु द्विजन्मनाम्।<br>न चात्र श्येनकाकादीन् पक्षिणः प्रतिषेधयेत् ।<br>तद्रूपाः पितरस्तत्र समायान्ति बुभुक्षवः ॥ ६० ॥<br>न दद्यात् तत्र हस्तेन प्रत्यक्षलवणं तथा।<br>न चायसेन पात्रेण न चैवाश्रद्धया पुनः ॥ ६१ ॥ | कौआ आदि पक्षियोंको हटाना नहीं चाहिये, क्योंकि (सम्भव है) इनके ही रूपमें पितृगण वहाँ खानेकी इच्छासे आये हों ॥ ५८-६०॥<br>वहाँ (श्राद्धमें) हाथसे प्रत्यक्ष लवण नहीं देना चाहिये। लोहेके पात्रद्वारा और अश्रद्धासे कोई वस्तु नहीं देनी चाहिये। स्वर्ण, रजत या औदुम्बरके पात्रसे तथा विशेष रूपसे खड्ग नामके पात्रविशेषसे दिया |
| काञ्चनेन तु पात्रेण राजतौदुम्बरेण वा।<br>दत्तमक्षयतां याति खड्गेन च विशेषतः ॥ ६२ ॥ | हुआ पदार्थ अक्षय होता है। जो व्यक्ति श्राद्धमें मिट्टीके बर्तनोंमें पितरोंको भोजन कराता है, वह घोर नरकमें जाता है, ऐसे ही भोजन करनेवाले |
| पात्रे तु मृण्मये यो वै श्राद्धे भोजयते पितॄन् ।<br>स याति नरकं घोरं भोक्ता चैव पुरोधसः ॥ ६३ ॥<br>न पंक्त्यां विषमं दद्यान्न याचेन्न च दापयेत्।<br>याचिता दापिता दाता नरकान् यान्ति दारुणान् ॥ ६४ ॥ | ब्राह्मण तथा (श्राद्ध करानेवाले) पुरोहित भी नरकमें जाते हैं ॥ ६१-६३॥<br>एक पंक्तिमें (भोजन करनेवालोंके साथ परोसनेमें) विषम व्यवहार नहीं करना चाहिये। सबको समान रूपसे देना चाहिये। (भोजन करनेवालोंको भी विषम दृष्टिसे) न तो माँगना चाहिये न किसी दूसरेको दिलाना चाहिये, क्योंकि ऐसा (करनेपर) माँगनेवाला, दिलानेवाला और देनेवाला-ये तीनों भीषण नरकोंमें जाते हैं। शिष्ट लोगोंको मौन होकर भोजन करना चाहिये। (अन्नके) प्राकृत गुणोंका वर्णन नहीं करना चाहिये। |
| भुञ्जीरन् वाग्यताः शिष्टा न ब्रूयुः प्राकृतान् गुणान् ।<br>तावद्धि पितरोऽश्नन्ति यावन्नोक्ता हविर्गुणाः ॥ ६५ ॥ | पितर तभीतक भोजन करते हैं, जबतक भोज्य पदार्थके गुणोंका वर्णन नहीं होता ॥ ६४-६५॥ |
* अध्याय २२ *
३६७
नाग्रासनोपविष्टस्तु भुञ्जीत प्रथमं द्विजः।
बहूनां पश्यतां सोऽज्ञः पंक्त्या हरति किल्बिषम्॥ ६६॥
न किञ्चिद् वर्जयेच्छ्राद्धे नियुक्तस्तु द्विजोत्तमः।
न मांसं प्रतिषेधेत न चान्यस्यान्नमीक्षयेत्॥ ६७॥
यो नाश्नाति द्विजो मांसं नियुक्तः पितृकर्मणि।
स प्रेत्य पशुतां याति सम्भवानेकविंशतिम्॥ ६८॥
स्वाध्यायं श्रावयेदेषां धर्मशास्त्राणि चैव हि।
इतिहासपुराणानि श्राद्धकल्पांश्च शोभनान्॥ ६९॥
ततोऽन्नमुत्सृजेद् भुक्ते अग्रतो विकिरन् भुवि।
पृष्ट्वा तृप्ताः स्थ इत्येवं तृप्तानाचामयेत् ततः॥ ७०॥
आचान्ताननुजानीयादभितो रम्यतामिति।
स्वधाऽस्त्विति च तं ब्रूयुर्ब्राह्मणास्तदनन्तरम्॥ ७१॥
ततो भुक्तवतां तेषामन्नशेषं निवेदयेत्।
यथा ब्रूयुस्तथा कुर्यादनुज्ञातस्तु वै द्विजैः॥ ७२॥
पित्र्ये स्वदितमित्येव वाक्यं गोष्ठेषु सूनृतम्।
सम्पन्नमित्यभ्युदये दैवे रोचत इत्यपि॥ ७३॥
विसृज्य ब्राह्मणांस्तान् वै दैवपूर्वं तु वाग्यतः।
दक्षिणां दिशमाकाङ्क्षन् याचेतेमान् वरान् पितॄन्॥ ७४॥
अग्रासनपर (प्रथम पंक्तिमें) बैठे हुए किसी एक द्विजको उस पंक्ति या अन्य पंक्तिमें बैठे द्विजों (ब्राह्मणों)-के देखते-देखते (उनके द्वारा भोजन प्रारम्भ करनेके पूर्व) पहले अकेले भोजन आरम्भ नहीं करना चाहिये (अर्थात् अपनी तथा अन्य पंक्तियोंमें बैठे हुए सभी ब्राह्मणोंके साथ ही भोजन आरम्भ करना चाहिये)। क्योंकि ऐसा करनेपर वह अज्ञ (द्विज) पंक्तिमें बैठे हुए देखनेवालोंके पापका भागी होता है। श्राद्धमें नियुक्त श्रेष्ठ द्विजको किसी वस्तुका बहिष्कार नहीं करना चाहिये और दूसरेके अन्नकी ओर नहीं देखना चाहिये। श्राद्धमें भोजन करते हुए ब्राह्मणोंको वेद, धर्मशास्त्र, इतिहास-पुराण तथा शुभ श्राद्धकल्पों (श्राद्धीय नियमों)-को सुनाना चाहिये। ब्राह्मणोंके भोजन कर लेनेपर उनसे 'क्या आप लोग तृप्त हो गये?' इस प्रकार पूछना चाहिये और उनके भोजनपात्रके सम्मुख परिवेषणसे अवशिष्ट अन्नका विकिरण करना चाहिये (साथ ही वृद्ध प्रपितामह आदि लेपभागके अधिकारी पितरोंके लिये श्राद्धीय सिद्ध अन्नका उत्सर्ग करना चाहिये)। तदनन्तर तृप्त ब्राह्मणोंको आचमन कराना चाहिये॥ ६६-७०॥
आचमन कर लेनेपर उन्हें 'चतुर्दिक् रमण करें' ऐसा कहना चाहिये। तब ब्राह्मण उसे 'स्वधाऽस्तु' कहकर आशीर्वाद दें। उनके (ब्राह्मणोंके) भोजन करनेसे शेष बचे अन्नको (उन ब्राह्मणोंको ही) निवेदित करे। अनन्तर वे ब्राह्मण जैसा कहें, वैसा ही उनकी आज्ञासे करे¹॥ ७१-७२॥
पित्र्यकार्य (माता-पिताके एकोद्दिष्ट श्राद्ध)-में 'स्वदितम्', गोष्ठीश्राद्धमें² 'सूनृतम्', आभ्युदयिक³ श्राद्धमें 'सम्पन्नम्' तथा दैव (देवश्राद्ध⁴)-में 'रोचते' ऐसा कहना चाहिये॥ ७३॥
निमन्त्रित ब्राह्मणोंको बिदाकर मौन होकर दैव-कार्य (पूर्वाभिमुख आचमन, विष्णुस्मरण आदि पुनः) करके दक्षिणाभिमुख होकर पितरोंसे इन वरोंकी याचना करे-॥ ७४॥
१-ब्राह्मण-भोजनके अनन्तर 'शेषात्रं किं कर्तव्यम्?' पूछना चाहिये। ब्राह्मणको कहना चाहिये: 'इष्टैः सह भोक्तव्यम्'।
२-बारह श्राद्धोंमें गोष्ठीश्राद्ध विश्वामित्रके द्वारा बताया गया है।
३-आभ्युदयिक श्राद्ध-वृद्धिश्राद्ध (विवाह, यज्ञोपवीत-संस्कार आदिमें करणीय नान्दीश्राद्ध)।
४-भविष्यपुराणमें देवताओंके उद्देश्यसे श्राद्धका विधान है। (द्रष्टव्य मनु० ३। २५४ व्याख्या कुल्लूकभट्टी)
३६८ * कूर्मपुराण *
| दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदाः संततिरेव च।<br>श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहुदेयं च नोऽस्त्विति॥ ७५॥ | हमारे (कुलमें) दान देनेवालोंकी, वेद (ज्ञान)-की तथा संततिकी वृद्धि हो। (शास्त्रों, ब्राह्मणों, पितरों, देवों आदिमें) हमारी श्रद्धा हटे नहीं। मेरे पास दान देनेके लिये बहुतसे पदार्थ हों॥ ७५॥ |
|---|---|
| पिण्डांस्तु गोऽजविप्रेभ्यो दद्यादग्नौ जलेऽपि वा।<br>मध्यमं तु ततः पिण्डमद्यात् पत्नी सुतार्थिनी॥ ७६॥ | (श्राद्धके) पिण्डोंको गाय, अज (बकरा) अथवा ब्राह्मणको दे, ऐसा सम्भव न होनेपर अग्नि अथवा जलमें विसर्जित करना चाहिये। पुत्रकी इच्छा करनेवाली (श्राद्धकर्ताकी) पत्नीको मध्यम पिण्डका भक्षण करना चाहिये। तदनन्तर हाथोंको धोकर आचमन करके अवशिष्ट भोज्य पदार्थोंसे अपनी जातीय बान्धवोंको तृप्त करे, उन जातीय बन्धुओंके तृप्त हो जानेपर अपने भृत्यजनोंको भोजन कराये। तत्पश्चात् पत्नियोंके साथ स्वयं भी शेष अन्नको ग्रहण करे॥ ७६-७७॥ |
| प्रक्षाल्य हस्तावाचम्य ज्ञातीन् शेषेण तोषयेत्।<br>ज्ञातिष्वपि च तृप्तेषु स्वान् भृत्यान् भोजयेत् ततः।<br>पश्चात् स्वयं च पत्नीभिः शेषमन्नं समाचरेत्॥ ७७॥ | |
| नोद्वासयेत् तदुच्छिष्टं यावन्नास्तंगतो रविः।<br>ब्रह्मचारी भवेतां तु दम्पती रजनीं तु ताम्॥ ७८॥ | (श्राद्धस्थलसे) जूठा अन्न तबतक नहीं उठाना चाहिये, जबतक सूर्यास्त न हो जाय। श्राद्धकी उस रात्रिमें पति-पत्नीको ब्रह्मचर्यपूर्वक रहना चाहिये। श्राद्ध करके और श्राद्धका भोजन करके जो मैथुन करता है, वह महारौरव नामक नरकमें जाता है, तदुपरान्त कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है। श्राद्धकर्ता तथा श्राद्धके भोजन करनेवालेको पवित्र, क्रोधरहित, शान्त, सत्यवादी तथा सावधान रहना चाहिये और स्वाध्याय तथा यात्राका त्याग करना चाहिये॥ ७८-८०॥ |
| दत्त्वा श्राद्धं तथा भुक्त्वा सेवते यस्तु मैथुनम्।<br>महारौरवमासाद्य कीटयोनिं व्रजेत् पुनः॥ ७९॥ | |
| शुचिरक्रोधनः शान्तः सत्यवादी समाहितः।<br>स्वाध्यायं च तथाध्वानं कर्ता भोक्ता च वर्जयेत्॥ ८०॥ | |
| श्राद्धं भुक्त्वा परश्राद्धं भुञ्जते ये द्विजातयः।<br>महापातिकिभिस्तुल्या यान्ति ते नरकान् बहून्॥ ८१॥ | (किसी एक) श्राद्धमें भोजन करनेके बाद जो ब्राह्मण दूसरे श्राद्धमें भोजन करते हैं, वे महापातकियोंके समान हैं और बहुतसे नरकोंमें जाते हैं। इस प्रकार आप लोगोंसे मैंने इस सनातन श्राद्धकल्पका वर्णन किया। उदासीन (अनासक्त) तत्त्ववेत्ताको नित्य अपक्व अन्नसे श्राद्ध करना चाहिये॥ ८१-८२॥ |
| एष वो विहितः सम्यक् श्राद्धकल्पः सनातनः।<br>आमेन वर्तयेन्नित्यमुदासीनोऽथ तत्त्ववित्॥ ८२॥ | |
| अनग्निरध्वगो वापि तथैव व्यसनान्वितः।<br>आमश्राद्धं द्विजः कुर्याद् विधिज्ञः श्रद्धयान्वितः।<br>तेनाग्नौकरणं कुर्यात् पिण्डांस्तेनैव निर्वपेत्॥ ८३॥ | अग्निहोत्रसे रहित, यात्रा करनेवाले अथवा व्यसनसे युक्त (किसी प्रकारकी आपत्ति या रोगसे ग्रस्त) श्रद्धालु और विधिको जाननेवाले द्विजको आमश्राद्ध (अपक्व अन्नसे किया जानेवाला श्राद्ध) करना चाहिये। वह उसी अपक्व अन्नसे 'अग्नौकरण'* करे और उसीसे पिण्डदान भी करे। जो इस विधिसे शान्त-मन होकर श्राद्ध करता है, वह सभी कल्मषोंसे दूर होता हुआ योगियोंके नित्य पदको प्राप्त करता है॥ ८३-८४॥ |
| योऽनेन विधिना श्राद्धं कुर्यात् संयतमानसः।<br>व्यपेतकल्मषो नित्यं योगिनां वर्तते पदम्॥ ८४॥ |
* यह 'अग्नौकरण' ब्राह्मणके हाथपर होता है। (मनु० ३। २१२)
| * अध्याय २२ * | ३६९ |
|---|
| तस्मात् सर्वप्रयत्नेन श्राद्धं कुर्याद् द्विजोत्तमः।<br>आराधितो भवेदीशस्तेन सम्यक् सनातनः॥ ८५॥<br><br>अपि मूलैःफलैर्वापि प्रकुर्यान्निर्धनो द्विजः।<br>तिलोदकैस्तर्पयेद् वा पितॄन् स्नात्वा समाहितः॥ ८६॥<br><br>न जीवत्पितृको दद्याद्धोमान्तं चाभिधीयते।<br>येषां वापि पिता दद्यात् तेषां चैके प्रचक्षते॥ ८७॥<br><br>पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः।<br>यो यस्य म्रियते तस्मै देयं नान्यस्य तेन तु॥ ८८॥<br><br>भोजयेद् वापि जीवन्तं यथाकामं तु भक्तितः।<br>न जीवन्तमतिक्रम्य ददाति श्रूयते श्रुतिः॥ ८९॥<br><br>द्व्यामुष्यायणिको दद्याद् बीजिक्षेत्रिकयोः समम्।<br>रिक्थादर्धं समादद्यान्नियोगोत्पादितो यदि॥ ९०॥<br><br>अनियुक्तः सुतो यश्च शुल्कतो जायते त्विह।<br>प्रदद्याद् बीजिने पिण्डं क्षेत्रिणे तु ततोऽन्यथा॥ ९१॥<br><br>द्वौ पिण्डौ निर्वपेत् ताभ्यां क्षेत्रिणे बीजिने तथा।<br>कीर्तयेदथ चैकस्मिन् बीजिनं क्षेत्रिणं ततः॥ ९२॥<br><br>मृताहनि तु कर्तव्यमेकोद्दिष्टं विधानतः।<br>अशौचे स्वे परिक्षीणे काम्यं वै कामतः पुनः॥ ९३॥ | इसलिये द्विजोत्तमको सभी प्रयत्नोंसे श्राद्ध करना चाहिये। इससे सनातन ईशकी सम्यक् रूपसे आराधना हो जाती है॥ ८५॥<br><br>सर्वथा निर्धन द्विजको मूल अथवा फलोंसे श्राद्ध करना चाहिये। अथवा स्नानकर समाहित होकर तिल और जलद्वारा पितरोंका तर्पण करना चाहिये। जिसके पिता जीवित हों उसे श्राद्ध नहीं करना चाहिये अथवा उसके लिये होमपर्यन्त श्राद्ध करनेका विधान है। कुछ लोगोंका कहना है कि पिता जिन्हें पिण्डदान करते हों उन्हें ही (वह) पिण्डदान करे। पिता, पितामह तथा प्रपितामहमेंसे जिसकी मृत्यु हुई हो उसीके निमित्त श्राद्धकर्ताको पिण्डदान करना चाहिये, न कि अन्य किसी (जीवित व्यक्ति)-के निमित्त। अथवा जीवित पुरुषको इसकी अभिरुचिके अनुसार भक्तिपूर्वक भोजन कराये। श्रुतिमें कहा गया है कि (पितादि) जीवित व्यक्तिका अतिक्रमणकर पिण्डदान नहीं करना चाहिये॥ ८६-८९॥<br><br>द्व्यामुष्यायणिक¹ पुत्र बीजी² एवं क्षेत्री³ दोनों पिताओंको पिण्डदान करे। यह पुत्र सम्पत्तिका आधा भाग ले सकता है। जो पुत्र नियोग-विधिसे उत्पन्न नहीं है, शुल्क⁴ (मूल्य) देकर गृहीत है, वह बीजी (जिस पुरुषके बीजसे उत्पन्न हुआ है वह बीजी है)-को पिण्डदान करेगा और क्षेत्राधिकारी पिताके पिण्डदानका उसे अधिकार नहीं होता। (नियोगसे उत्पन्न पुत्रको) क्रमशः क्षेत्री और बीजीको दो पिण्ड देने चाहिये। एक-एक पिण्ड देते समय क्रमशः अलग-अलग दोनोंका नाम कीर्तन करना चाहिये⁵॥ ९०-९२॥<br><br>(पिताकी) मृत्यु-तिथिमें विधिपूर्वक एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना चाहिये। अपना अशौच समाप्त होनेपर इच्छानुसार काम्य श्राद्ध किये जा सकते हैं॥ ९३॥ |
१-शास्त्रीय विधिसे विवाहके लिये किसी योग्य वरको चुना जाय और उसे यह वचन दे दिया जाय कि 'मैं अपनी कन्याका विवाह तुमसे करूँगा' वह वर दैववश यदि गत हो जाय तो शास्त्रानुसार उस वाग्दत्ता कन्याका पुनर्विवाह सम्भव नहीं है, किंतु दिवंगत वरको पिण्ड देनेके लिये और उसकी सम्पत्तिके स्वामित्वके लिये पुत्रकी आवश्यकता हो तो उस वाग्दत्ता कन्याका देवर या सगोत्रसे विवाह करना शास्त्रविहित है। यही नियोग-विवाह है। इससे उत्पन्न पुरुषको द्व्यामुष्यायणिक कहते हैं।
२-वाग्दत्ता कन्यासे नियोग-विधिसे विवाह करनेवाला देवर आदि बीजी है अर्थात् विद्यमान पिता।
३-वाग्दत्ता कन्याका दिवंगत वर क्षेत्री है अर्थात् दिवङ्गत पिता।
४-औरस आदि बारह प्रकारके पुत्र धर्मशास्त्रमें बताये गये हैं। उनमें एक क्रीत पुत्र होता है। यह मूल्य देकर माता-पितासे ले लिया जाता है और अपने पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया जाता है। यही पुत्र शुल्कसे गृहीत पुत्ररूपमें यहाँ निर्दिष्ट है।
५-क्षेत्री एवं बीजी दोनोंको पिण्डदान नियोगसे उत्पन्न वही पुत्र करेगा, जिसकी उत्पत्तिके पूर्व देवर आदि तथा वाग्दत्ता कन्याने परस्पर यह संविदा कर ली हो कि यह उत्पन्न होनेवाला पुत्र हम दोनोंका होगा।
३७० * कूर्मपुराण *
| पूर्वाह्ने चैव कर्तव्यं श्राद्धमभ्युदयार्थिना।<br>देववत्सर्वमेव स्याद् यवैः कार्या तिलक्रिया॥ ९४ ॥ | अभ्युदयकी कामना करनेवालेको पूर्वाह्नमें ही आभ्युदयिक (नान्दी) श्राद्ध करना चाहिये। देवकार्यके समान इसमें सभी कार्य करने चाहिये। तिलोंका कार्य जौसे करना चाहिये। इसमें सीधे कुशोंका प्रयोग करे (मोटकके रूपमें द्विगुणीकृत कुशोंका प्रयोग न करे)। युग्म ब्राह्मणोंको भोजन कराये और 'नान्दीमुखाः पितरः प्रीयन्ताम्' अर्थात् नान्दीमुख नामक पितर तृप्त हों—ऐसा कहना चाहिये॥ ९४-९५॥ |
| दर्भाश्च ऋजवः कार्या युग्मान् वै भोजयेद् द्विजान्।<br>नान्दीमुखास्तु पितरः प्रीयन्तामिति वाचयेत्॥ ९५ ॥<br>मातृश्राद्धं तु पूर्वं स्यात् पितॄणां स्यादनन्तरम्।<br>ततो मातामहानां तु वृद्धौ श्राद्धत्रयं स्मृतम्॥ ९६ ॥ | पहले मातृश्राद्ध तदनन्तर पितृश्राद्ध करना चाहिये। उसके बाद मातामहादिका श्राद्ध होता है। वृद्धिश्राद्धमें इन्हीं तीन प्रकारके श्राद्धोंका वर्णन हुआ है¹। देवकार्य (विश्वेदेव कार्य) करनेके अनन्तर पिण्डदान करना चाहिये। दाहिनी ओरसे ही विश्वेदेवकार्य करना चाहिये। एकाग्रचित्तसे² सव्य होकर पूर्वाभिमुख हो पिण्डदान करना चाहिये॥ ९६-९७॥ |
| देवपूर्वं प्रदद्याद् वै न कुर्यादप्रदक्षिणम्।<br>प्राङ्मुखो निर्वपेत् पिण्डानुपवीती समाहितः॥ ९७ ॥<br>पूर्वं तु मातरः पूज्या भक्त्या वै सगणेश्वराः।<br>स्थण्डिलेषु विचित्रेषु प्रतिमासु द्विजातिषु॥ ९८ ॥ | सर्वप्रथम (नान्दीश्राद्धके पूर्व) भक्तिपूर्वक गणेश्वरोंसे युक्त (षोडश) मातृकाओंका पूजन करना चाहिये। मनोरम स्थण्डिल, प्रतिमा अथवा ब्राह्मणोंमें पुष्प, धूप, नैवेद्य, गन्ध तथा अलंकारों आदिके द्वारा (षोडश मातृकाओंका) पूजन करना चाहिये। मातृगणोंकी पूजाकर विद्वान्को चाहिये कि वह तीनों श्राद्ध³ करे। मातृपूजन किये बिना जो श्राद्ध करता है, (षोडश) मातृकाएँ क्रुद्ध होकर उससे अप्रसन्न हो जाती हैं॥ ९८-१००॥ |
| पुष्पैर्धूपैश्च नैवेद्यैर्गन्धाद्यैर्भूषणैरपि।<br>पूजयित्वा मातृगणं कुर्याच्छ्राद्धत्रयं बुधः॥ ९९ ॥ | |
| अकृत्वा मातृयागं तु यः श्राद्धं परिवेशयेत्।<br>तस्य क्रोधसमाविष्टा हिंसामिच्छन्ति मातरः॥ १००॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे द्वाविंशोऽध्यायः॥ २२॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिभागमें बाईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २२॥
१-पुत्रादिकी उत्पत्तिके समय होनेवाले विशेष श्राद्धके लिये यह व्यवस्था है। सामान्यतः सभी श्राद्धोंमें प्रथम पिता आदिका, अनन्तर माता आदिका श्राद्ध होता है।
२-यह किसी विशेष श्रौतकर्मके पिण्डदानकी व्यवस्था है। सामान्यतः पिण्डदान दक्षिणाभिमुख एवं अपसव्य होकर किया जाता है।
३-ये तीन श्राद्ध—पिता आदि तीन, माता आदि तीन तथा मातामह आदि तीनका समझना चाहिये। नान्दीश्राद्धमें ये तीनों श्राद्ध होते हैं।
- अध्याय २३ * ३७१
तेईसवाँ अध्याय
आशौच-प्रकरणमें जननाशौच और मरणाशौचकी क्रियाविधि, शुद्धि-विधान, सपिण्डता, सद्यःशौच, अन्त्येष्टि-संस्कार, सपिण्डीकरण-विधि, मासिक तथा सांवत्सरिक श्राद्ध आदिका वर्णन
| व्यास उवाच<br>दशाहं प्राहुराशौचं सपिण्डेषु विपश्चितः।<br>मृतेषु वाथ जातेषु ब्राह्मणानां द्विजोत्तमाः॥ १॥<br>नित्यानि चैव कर्माणि काम्यानि च विशेषतः।<br>न कुर्याद् विहितं किञ्चित् स्वाध्यायं मनसापि च॥ २॥ | **व्यासजीने कहा—**हे द्विजोत्तमो! विद्वानोंने ब्राह्मणोंके लिये सपिण्डोंकी मृत्यु अथवा जन्म होनेपर दस दिनका आशौच कहा है। (आशौचमें) विशेषरूपसे विहित नित्य तथा काम्य कुछ भी कर्म न करे। मनसे भी स्वाध्याय (वेदाध्ययन) न करे॥ १-२॥ |
| शुचीनक्रोधनान् भूम्यान् शालाग्नौ भावयेद् द्विजान्।<br>शुष्कान्नेन फलैर्वापि वैतानं जुहुयात् तथा॥ ३॥ | यज्ञशालाके अग्निकार्यके लिये पवित्र, क्रोधरहित, भूमिदेवरूप ब्राह्मणोंको नियुक्त करना चाहिये। शुष्क अन्न अथवा फलोंके द्वारा वैतानाग्निमें हवन (श्रौत होम) करना चाहिये॥ ३॥ |
| न स्पृशेयुरिमानन्ये न च तेभ्यः समाहरेत्।<br>चतुर्थे पञ्चमे वाह्नि संस्पर्शः कथितो बुधैः॥ ४॥ | दूसरे लोग इन आशौचग्रस्त व्यक्तियोंको स्पर्श न करें और न कोई वस्तु ही उनसे लें। विद्वानोंने चौथे अथवा पाँचवें दिन इनके स्पर्शका विधान किया है। (सपिण्डोंके) जननाशौचमें सपिण्डोंको स्पर्श करनेमें दोष नहीं होता। तथापि उत्पन्न हुए बालक और उसे जन्म देनेवाली (सद्यः) प्रसूता स्त्रीका मनुष्योंको स्पर्श नहीं करना चाहिये॥ ४-५॥ |
| सूतके तु सपिण्डानां संस्पर्शो न प्रदुष्यति।<br>सूतकं सूतिकां चैव वर्जयित्वा नृणां पुनः॥ ५॥<br>अधीयानस्तथा यज्वा वेदविच्च पिता भवेत्।<br>संस्पृश्याः सर्व एवैते स्नानान्माता दशाहतः॥ ६॥ | जननाशौचमें वेदका अध्ययन करनेवाला, यज्ञ करनेवाला और वेद जाननेवाला पिता—ये सभी स्नान करनेसे स्पर्श करने योग्य हो जाते हैं। माता दस दिनोंके बाद (स्पर्श-योग्य होती है) निर्गुण¹ अथवा अति-निर्गुण लोगोंके लिये दस दिनोंका आशौच कहा गया है। एक², दो अथवा तीन गुणवालोंके लिये चार, तीन या एक दिनमें शुद्धि होनेका विधान है। दस दिन हो जानेपर सम्यक्-रूपसे अध्ययन एवं हवन करना चाहिये। प्रजापति मनुने चौथे दिन (एक गुणवाले अशौची)-के स्पर्शका विधान किया है। क्रियाहीन, मूर्ख, महारोगी और मनमाना आचरण करनेवाले व्यक्तियोंका आशौच मरणपर्यन्त कहा³ गया है॥ ६—९॥ |
| दशाहं निर्गुणे प्रोक्तमशौचं चातिनिर्गुणे।<br>एकद्वित्रिगुणैर्युक्तं चतुस्त्र्येकदिनैः शुचिः॥ ७॥ | |
| दशाहात् तु परं सम्यगधीयीत जुहोति च।<br>चतुर्थे तस्य संस्पर्शं मनुराह प्रजापतिः॥ ८॥ | |
| क्रियाहीनस्य मूर्खस्य महारोगिण एव च।<br>यथेष्टाचरणस्याहुर्मरणान्तमशौचकम् ॥ ९॥ |
१-वेदाध्ययन एवं अग्निहोत्रादि कर्मसे रहितको निर्गुण कहा जाता है।
२-जो स्मार्ताग्निमान् है वह एक गुणवाला है। जो स्मार्ताग्निमान् तथा वेदाध्ययनसम्पन्न है, वह दो गुणवाला है। जो इन दोनोंके साथ श्रौताग्निमान् है, वह तीन गुणोंवाला है। (मनु० ३। ५९ कुल्लूकभट्टी)
३-इस वचनका तात्पर्य क्रियाहीनता आदिकी निन्दामें है।
| ३७२ | * कूर्मपुराण * |
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| त्रिरात्रं दशरात्रं वा ब्राह्मणानामशौचकम्।<br>प्राक्संस्कारात् त्रिरात्रं स्यात् तस्मादूर्ध्वं दशाहकम्॥ १०॥ | ब्राह्मणोंका आशौच तीन रात अथवा दस रात-तकका होता है। (उपनयन) संस्कार होनेके पूर्व (तथा चूडासंस्कारके अनन्तर मृत्यु होनेपर) तीन रातका और (उपनयन) संस्कार होनेपर दस रातका अशौच होता है॥ १०॥ | | ऊनद्विवार्षिके प्रेते मातापित्रोस्तदिष्यते।<br>त्रिरात्रेण शुचिस्त्वन्यो यदि ह्यात्यन्तनिर्गुणः॥ ११॥<br><br>अदन्तजातमरणे पित्रोरेकाहमिष्यते।<br>जातदन्ते त्रिरात्रं स्याद् यदि स्यातां तु निर्गुणौ॥ १२॥<br><br>आदन्तजननात् सद्य आचौलादेकरात्रकम्।<br>त्रिरात्रमौपनयनात् सपिण्डानामुदाहृतम्॥ १३॥<br><br>जातमात्रस्य बालस्य यदि स्यान्मरणं पितुः।<br>मातुश्च सूतकं तत् स्यात् पिता स्यात् स्पृश्य एव च॥ १४॥<br><br>सद्यः शौचं सपिण्डानां कर्तव्यं सोदरस्य च।<br>ऊर्ध्वं दशाहादेकाहं सोदरो यदि निर्गुणः॥ १५॥ | दो वर्षसे कम अवस्थावाले बालकके मरनेपर केवल माता-पिताको तीन रातका अशौच होता है। अत्यन्त निर्गुण (सपिण्डकी मृत्यु) होनेपर तीन रातमें शुद्धि होती है। बिना दाँतवाले शिशुके मरनेपर माता-पिताको एक दिनका अशौच कहा गया है। यदि माता-पिता निर्गुण हों तो दाँत उत्पन्न हुए शिशुकी मृत्यु होनेपर उन्हें तीन रातका अशौच होता है। दाँत उत्पन्न होनेके पूर्वतक बालककी मृत्यु होनेपर सद्यः चूडाकरण-संस्कारके पूर्वतक एक रात तथा उपनयनसे पूर्वतक तीन रातका आशौच सपिण्डोंके लिये कहा गया है। उत्पन्न होते ही बालककी मृत्यु होनेपर पिता और माताको अशौच होता है, किंतु पिता (स्नानके बाद) स्पर्शके योग्य होता है। सपिण्डों और सहोदर भाईकी (जन्मसे) दस दिनोंके भीतर मृत्यु होनेपर (स्नानमात्रसे) सद्यः पवित्रता होती है। दस दिनके पश्चात् (मृत्यु होनेपर) एक दिनका अशौच उस सहोदरको होगा जो निर्गुण होता है॥ ११—१५॥ | | अथोर्ध्वं दन्तजननात् सपिण्डानामाशौचकम्।<br>एकरात्रं निर्गुणानां चौलादूर्ध्वं त्रिरात्रकम्॥ १६॥<br><br>अदन्तजातमरणं सम्भवेद् यदि सत्तमाः।<br>एकरात्रं सपिण्डानां यदि तेऽत्यन्तनिर्गुणाः॥ १७॥<br><br>व्रतादेशात् सपिण्डानामार्वाक् स्नानं विधीयते।<br>सर्वेषामेव गुणिनामूर्ध्वं तु विषमं पुनः॥ १८॥ | तदनन्तर दाँत निकलनेतक निर्गुण सपिण्डोंको एक रातका अशौच होता है। चौलकर्मके उपरान्त (सपिण्डोंके मरनेपर) तीन रातका अशौच होता है। श्रेष्ठ जनो! सपिण्डी (यदि) अत्यन्त निर्गुण हों तो बिना दाँत निकले उनकी मृत्यु होनेपर एक रातका अशौच होता है। उपनयनके पूर्व सपिण्डोंकी मृत्यु होनेपर सभी गुणवानोंके लिये स्नानका विधान है, किंतु उपनयनके बाद मृत्यु होनेपर भिन्न स्थिति (अलग-अलग अशौचकी व्यवस्था) होती है॥ १६—१८॥ | | अर्वाक् षण्मासतः स्त्रीणां यदि स्याद् गर्भसंस्रवः।<br>तदा माससमैस्तासामशौचं दिवसैः स्मृतम्॥ १९॥<br><br>तत ऊर्ध्वं तु पतने स्त्रीणां द्वादशरात्रिकम्।<br>सद्यः शौचं सपिण्डानां गर्भस्रावाच्च वा ततः॥ २०॥ | छः महीनेसे पूर्व यदि स्त्रियोंका गर्भस्राव हो जाता है तो जितने महीनेका गर्भ रहता है, उतने ही दिनों-तकका उनका (स्त्रियोंका) अशौच कहा गया है, उसके बाद गर्भपात होनेपर स्त्रियोंके लिये बारह रात्रिका और सपिण्डोंके लिये सद्यः शौचका विधान है॥ १९-२०॥ |
- अध्याय २३ * | ३७३ ---|---
| गर्भच्युतावहोरात्रं सपिण्डेऽत्यन्तनिर्गुणे।<br>यथेष्टाचरणे ज्ञातौ त्रिरात्रमिति निश्चयः॥ २१॥ | गर्भस्राव तथा अत्यन्त निर्गुण सपिण्डकी मृत्यु होनेपर एक अहोरात्रका और मनमाने आचरणवाले जाति-बन्धुके (यहाँ गर्भस्राव होनेपर) तीन रातका अशौच निश्चित है। यदि जननाशौचके मध्य दूसरा जननाशौच हो जाय और मरणाशौचके बीचमें दूसरा मरणाशौच पड़ जाय तो प्रथम अशौचके जितने दिन शेष रहते हैं, उतने ही दिनोंमें दूसरे अशौचकी भी शुद्धि हो जाती है। किंतु प्रथम अशौच एक ही दिनका बचा हो तो तीन रातका आशौच होता है। मरणाशौचके मध्य जननाशौच होनेपर अथवा जननाशौचके बीचमें मरणाशौच आ जानेपर मरणाशौचके पूरा होनेपर ही शुद्धि होती है। यदि पूर्वका अशौच वृद्धिमद् (बड़ा गुरुतर) अशौच हो तो पूर्वके अशौचकी शुद्धिसे ही दोनों अशौचोंकी शुद्धि होती है। यदि पाँचवीं रात्रि बीत जानेपर वृद्धिमद् अशौच हो तो दूसरे अशौचकी शुद्धि पूर्वके ही अशौचसे हो जाती है॥ २१-२४॥ |
| यदि स्यात् सूतके सूतिर्मरणे वा मृतिर्भवेत्।<br>शेषेणैव भवेच्छुद्धिरहःशेषे त्रिरात्रकम्॥ २२॥ | |
| मरणोत्पत्तियोगे तु मरणाच्छुद्धिरिष्यते।<br>अघवृद्धिमदाशौचमूर्ध्वं चेत् तेन शुध्यति॥ २३॥ | |
| अथ चेत् पञ्चमीरात्रिमतीत्य परतो भवेत्।<br>अघवृद्धिमदाशौचं तदा पूर्वेण शुध्यति॥ २४॥ | |
| देशान्तरगतं श्रुत्वा सूतकं शावमेव तु।<br>तावत्प्रयतो मर्त्यो यावच्छेषः समाप्यते॥ २५॥ | देशान्तरमें गये हुएका जननाशौच या मरणाशौच-सम्बन्धी समाचार सुननेके बाद उतने समयतक संयम (अशौचके नियमका पालन) करना चाहिये जबतक शेष दिन समाप्त न हो जाय। (एक वर्षके भीतर) व्यतीत हुए मरणाशौचका समाचार सुननेपर सपिण्डोंको तीन रातका अशौच होता है, उसी प्रकार एक वर्ष बीतनेके बाद समाचार मिलनेपर मरणाशौचमें स्नानमात्र करना चाहिये॥ २५-२६॥ |
| अतीते सूतके प्रोक्तं सपिण्डानां त्रिरात्रकम्।<br>तथैव मरणे स्नानमूर्ध्वं संवत्सराद् यदि॥ २६॥ | |
| वेदान्तविच्चाधीयानो योऽग्निमान् वृत्तिकर्शितः।<br>सद्यः शौचं भवेत् तस्य सर्वावस्थासु सर्वदा॥ २७॥ | वेदान्तको जाननेवाला (ब्रह्मनिष्ठ), अध्ययनकर्ता (गुरुकुलमें निवास करनेवाला ब्रह्मचारी), अग्निहोत्री तथा वृत्तिहीन लोगोंको सभी अवस्थाओंमें सदा सद्यः शौच होता है ॥ २७ ॥ |
| स्त्रीणामसंस्कृतानां तु प्रदानात् पूर्वतः सदा।<br>सपिण्डानां त्रिरात्रं स्यात् संस्कारे भर्तुरेव हि॥ २८॥ | अविवाहित स्त्रियों (कन्याओं)-की पाणिग्रहणसे पूर्व मृत्यु होनेपर सपिण्डोंके निमित्त सदा तीन रातका अशौच होता है और विवाह-संस्कारके अनन्तर मृत्यु होनेपर केवल पति और पतिकुलमें अशौच होता है। वाग्दानसे पूर्व कन्याओंकी मृत्यु होनेपर एक दिनका अशौच कहा गया है और दो वर्षसे कम अवस्थावाली कन्याके मरनेपर सद्यः शौच बताया गया है॥ २८-२९॥ |
| अहस्त्वदत्तकन्यानामशौचं मरणे स्मृतम्।<br>ऊनद्विवर्षान्मरणे सद्यः शौचमुदाहृतम्॥ २९॥ |
| ३७४ | * कूर्मपुराण * |
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| आदन्तात् सोदरे सद्य आचौलादेकरात्रकम्।<br>आप्रदानात् त्रिरात्रं स्याद् दशरात्रमतः परम्॥ ३०॥ | दाँत निकलनेसे पूर्व कन्याकी मृत्यु होनेपर सहोदर भाईको सद्यः शौच होता है और चूड़ाकरणके कालतक मृत्यु होनेपर एक रात्रिका अशौच होता है। कन्यादानके पूर्व (कन्याका मरण होनेपर) तीन रातका और विवाहके बाद मरण होनेपर दस रातका (पतिकुलमें) अशौच होता है॥ ३०॥ |
| मातामहानां मरणे त्रिरात्रं स्यादशौचकम्।<br>एकोदकानां मरणे सूतके चैतदेव हि॥ ३१॥ | मातामहकी मृत्यु होनेपर (दौहित्रको) तीन रातका अशौच होता है। समानोदकोंके^१ मरण या जन्ममें भी तीन रातका ही अशौच होता है। योनि-सम्बन्धवालों (भांजा, मामा, मौसी, बूआ-कुलके लोग आदि) तथा बान्धवोंकी मृत्यु होनेपर पक्षिणी (आगामी तथा वर्तमान दिनसे युक्त रात्रि)-तक अशौच होता है^२। गुरु एवं सहपाठी (-के मरणमें) एक रात्रिका अशौच बतलाया गया है। जिस देशमें निवास करता हो, उस देशके राजाकी मृत्यु होनेपर सज्ज्योतिकालतकका^३ अशौच होता है और पिताके घरमें विवाहित कन्याकी मृत्यु होनेपर पिताको तीन रातका अशौच होता है। पूर्वमें अन्यकी भार्या रहनेवाली स्त्री, उसके पुत्र तथा कृत्रिम पुत्रके मरणमें तीन रातका आशौच होता है। इसी प्रकार आचार्यके मरणमें भी तीन रातका आशौच होता है। गुरुपुत्र तथा गुरुपत्नीका एक अहोरात्रका और उपाध्याय तथा अपने ग्राममें श्रोत्रियकी मृत्यु होनेपर भी एक दिनका आशौच होता है॥ ३१—३५॥ |
| पक्षिणी योनिसम्बन्धे बान्धवेषु तथैव च।<br>एकरात्रं समुद्दिष्टं गुरौ सब्रह्मचारिणि॥ ३२॥ | |
| प्रेते राजनि सञ्ज्योतिर्यस्य स्याद् विषये स्थितिः।<br>गृहे मृतासु दत्तासु कन्यकासु त्र्यहं पितुः॥ ३३॥ | |
| परपूर्वासु भार्यासु पुत्रेषु कृतकेषु च।<br>त्रिरात्रं स्यात् तथाचार्ये स्वभार्यास्वन्यगासु च॥ ३४॥ | |
| आचार्यपुत्रे पत्न्यां च अहोरात्रमुदाहृतम्।<br>एकाहं स्यादुपाध्याये स्वग्रामे श्रोत्रियेऽपि च॥ ३५॥ | |
| त्रिरात्रमसपिण्डेषु स्वगृहे संस्थितेषु च।<br>एकाहं चास्ववर्ये स्यादेकरात्रं तदिष्यते॥ ३६॥ | अपने घरमें रहनेवाले असपिण्डकी मृत्यु होनेपर तीन रातका अशौच होता है और अपने घरमें (स्वेच्छासे रहनेवाले) अन्य किसी व्यक्तिकी मृत्यु होनेपर एक दिनका अशौच होता है। सास एवं ससुरके मरनेपर तीन रातका और अपने घरमें स्थित रहनेवाले सगोत्रके मरणमें सद्यः शौच कहा गया है। ब्राह्मणकी शुद्धि दस दिनमें, क्षत्रियकी बारह दिनमें, वैश्यकी पंद्रह दिनमें और शूद्रकी एक माहमें शुद्धि होती है। ब्राह्मणद्वारा क्षत्राणी, वैश्या और शूद्रासे उत्पन्न बान्धवोंकी मृत्यु होनेपर ब्राह्मणकी शुद्धि दस दिनोंमें होती है॥ ३६—३९॥ |
| त्रिरात्रं श्वश्रमरणे श्वशुरे वै तदेव हि।<br>सद्यः शौचं समुद्दिष्टं सगोत्रे संस्थिते सति॥ ३७॥ | |
| शुध्येद् विप्रो दशाहेन द्वादशाहेन भूमिपः।<br>वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुध्यति॥ ३८॥ | |
| क्षत्रविद्शूद्रदायादा ये स्युर्विप्रस्य बान्धवाः।<br>तेषामशौचे विप्रस्य दशाहाच्छुद्धिरिष्यते॥ ३९॥ |
१-सातवीं परम्परासे चौदहवीं परम्परातकके लोग समानोदक होते हैं।
२-इस प्रसंगमें यह विवेक है—दिनमें मरण होनेपर वह दिन उसके बादकी रात्रि, उसके बाद दूसरे दिन नक्षत्रदर्शनतक अशौच होगा। रात्रिमें मरण होनेपर वह रात्रि बादका दिन पुनः उसके बादकी रात्रितक पक्षिणी माना जायगा और तबतक अशौच होगा।
३-दिनमें मरण होनेपर रात्रिमें स्नानसे शुद्धि और रात्रिमें मरण होनेपर दिनमें स्नानसे शुद्धि यही 'सज्ज्योतिकाल' से अशौचमें शुद्धिका अर्थ है।
- अध्याय २३ * | ३७५ ---|--- राजन्यवैश्यावप्येवं हीनवर्णासु योनिषु।<br>स्वमेव शौचं कुर्यातां विशुद्ध्यर्थमसंशयम्॥ ४०॥ | क्षत्रिय और वैश्यको भी हीनवर्णकी स्त्रियोंसे उत्पन्न बान्धवोंकी मृत्यु होनेपर पूर्ण शुद्धिके लिये अपने वर्णके अनुसार विहित शौच-विधिका पालन करना चाहिये^१॥ ३९-४०॥ सर्वे तूत्तरवर्णानाशौचं कुर्युरादृताः।<br>तद्वर्णविधिदृष्टेन स्वं तु शौचं स्वयोनिषु॥ ४१॥ | सभी वर्णके व्यक्तियोंको उत्तर वर्णके लिये विहित अशौचका आदरपूर्वक पालन करना चाहिये। किंतु अपने वर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न बन्धुकी मृत्यु होनेपर अपने ही वर्णके अनुसार अशौचका पालन करना चाहिये। षड्रात्रं वा त्रिरात्रं स्यादेकरात्रं क्रमेण हि।<br>वैश्यक्षत्रियविप्राणां शूद्रेष्वाशौचमेव तु॥ ४२॥ | शूद्र सपिण्डकी मृत्यु या जन्म होनेपर वैश्य, क्षत्रिय तथा ब्राह्मणोंको क्रमानुसार छः रात, तीन रात और एक रातका आशौच होता है। द्विजश्रेष्ठो! वैश्य सपिण्डके अर्धमासोऽथ षड्रात्रं त्रिरात्रं द्विजपुंगवाः।<br>शूद्रक्षत्रियविप्राणां वैश्येष्वाशौचमिष्यते॥ ४३॥ | जन्म या मृत्युपर शूद्र, क्षत्रिय और ब्राह्मणोंको क्रमशः आधे मास, छः रात तथा तीन रातका आशौच होता है। षड्रात्रं वै दशाहं च विप्राणां वैश्यशूद्रयोः।<br>अशौचं क्षत्रिये प्रोक्तं क्रमेण द्विजपुंगवाः॥ ४४॥ | द्विजश्रेष्ठो! क्षत्रिय सपिण्डके जन्म या मरणमें क्रमशः ब्राह्मणको छः दिन और वैश्य तथा शूद्रको दस दिनोंका अशौच होता है। ब्रह्माजीने कहा है कि ब्राह्मण शूद्रविट्क्षत्रियाणां तु ब्राह्मणे संस्थिते सति।<br>दशरात्रेण शुद्धिः स्यादित्याह कमलोद्भवः॥ ४५॥ | (सपिण्ड)-का (जन्म-मरण होनेपर) शूद्र, वैश्य तथा क्षत्रियकी शुद्धि दस रातमें होती है^२॥ ४१-४५॥ असपिण्डं द्विजं प्रेतं विप्रो निर्हृत्य बन्धुवत्।<br>अशित्वा च सहोषित्वा दशरात्रेण शुध्यति॥ ४६॥ | असपिण्ड द्विजकी मृत्यु होनेपर बन्धुवत् उसके प्रेतकर्ममें सम्मिलित होकर भोजन एवं निवास करनेवाला ब्राह्मण दस रातमें शुद्ध होता है। मृत व्यक्तिके यहाँ यद्यन्नमत्ति तेषां तु त्रिरात्रेण ततः शुचिः।<br>अनदन्नन्नमह्नैव न च तस्मिन् गृहे वसेत्॥ ४७॥ | भोजन करनेपर तीन रातमें शुद्धि होती है। अन्न न खानेवालेकी उसी दिन शुद्धि हो जाती है, परंतु उसके घरमें निवास नहीं करना चाहिये। सोदकेष्वेतदेव स्यान्मातुराप्तेषु बन्धुषु।<br>दशाहेन शवस्पर्शे सपिण्डश्चैव शुध्यति॥ ४८॥ | समानोदक तथा माताके श्रेष्ठ बान्धवोंके मरणमें शव वहन करनेवाला सपिण्ड व्यक्ति दस दिनोंमें शुद्ध होता है। यदि निर्हरति प्रेतं प्रलोभाक्रान्तमानसः।<br>दशाहेन द्विजः शुध्येद् द्वादशाहेन भूमिपः॥ ४९॥ | यदि कोई व्यक्ति लोभके वशीभूत हो शवको ढोता है तो वह यदि ब्राह्मण है तो दस दिनोंमें, क्षत्रिय है तो बारह दिनोंमें, वैश्य है तो आधे मासमें और शूद्र है तो एक अर्धमासेन वैश्यस्तु शूद्रो मासेन शुध्यति।<br>षड्रात्रेणाथवा सर्वे त्रिरात्रेणाथवा पुनः॥ ५०॥ | मासमें शुद्ध होता है अथवा सभी वर्णके व्यक्ति छः रात या तीन रातमें शुद्ध हो जाते हैं॥ ४६-५०॥ अनाथं चैव निर्हृत्य ब्राह्मणं धनवर्जितम्।<br>स्नात्वा सम्प्राश्य तु घृतं शुध्यन्ति ब्राह्मणादयः॥ ५१॥ | धनहीन अनाथ ब्राह्मणके शवका वहन आदि कर्म करनेवाले ब्राह्मणादि स्नान करके घृतका प्राशन करनेसे शुद्ध हो जाते हैं॥ ५१॥
१-यह अन्य युग-विषयक है। अपने वर्णसे इतर वर्णमें विवाह कलियुगमें सर्वथा निषिद्ध है।
२-यह अशौचकी व्यवस्था घनिष्ठ सम्पर्क, एक साथ रहने अथवा परस्पर उपकार्य-उपकारक-भाव रहनेपर है।
३७६ * कूर्मपुराण *
| अवरश्चेद् वरं वर्णमवरं वा वरो यदि।<br>अशौचे संस्पृशेत् स्नेहात् तदाशौचेन शुध्यति॥ ५२॥ | स्नेहवश यदि हीनवर्णके व्यक्ति उच्च वर्णके शवका और उच्च वर्णके व्यक्ति हीनवर्णके शवका स्पर्श करते हैं तो वे उस मृतवर्णके निर्धारित अशौच (नियमपालन)-से शुद्ध होते हैं। यदि ब्राह्मण अपनी इच्छासे मरे हुए द्विजका अनुगमन करता है (शव-यात्रामें जाता है) तो वह वस्त्रसहित स्नानकर, अग्निका स्पर्श करके घृतका प्राशन करनेसे शुद्ध हो जाता है। (द्विजके शवका अनुगमन करनेपर) क्षत्रियकी शुद्धि एक दिनमें, वैश्यकी दो दिनमें, शूद्रकी तीन दिनोंमें कही गयी है। (अशौचके दिन बीतनेके बाद) सौ बार प्राणायाम (भी शुद्धिके लिये) करना चाहिये॥ ५२-५४॥ |
| प्रेतीभूतं द्विजं विप्रो योऽनुगच्छेत् कामतः।<br>स्नात्वा सचैलं स्पृष्ट्वाग्निं घृतं प्राश्य विशुध्यति॥ ५३॥ | |
| एकाहात् क्षत्रिये शुद्धिर्वैश्ये स्याच्च द्व्यहेन तु।<br>शूद्रे दिनत्रयं प्रोक्तं प्राणायामशतं पुनः॥ ५४॥ | |
| अनस्थिसंचिते शूद्रे रौति चेद् ब्राह्मणः स्वकैः।<br>त्रिरात्रं स्यात् तथाशौचमेकाहं त्वन्यथा स्मृतम्॥ ५५॥ | शूद्रके अस्थिसंचय होनेसे पहले यदि ब्राह्मण उसके स्वजनोंके साथ विलाप करता है तो उसे तीन रातका अशौच होता है, इसके विपरीत (अस्थि-संचयनतक प्रेतकर्म हो जानेके अनन्तर यदि शूद्रका मरण जानकर ब्राह्मण उसके बान्धवोंके साथ विलाप करता है, उनका स्पर्श करता है तो उसे) एक दिनका अशौच होता है। अस्थिसंचयके पूर्व (शूद्रके घर विलाप करनेवाले) क्षत्रिय एवं वैश्यको एक दिनका और अन्य अवस्थामें सज्ज्योति(काल)-तकका आशौच होता है। ब्राह्मणकी स्नानमात्रसे शुद्धि होती है। ब्राह्मणके अस्थिसंचयके पूर्व यदि (असपिण्ड, असगोत्र, सम्बन्धरहित) ब्राह्मण रोता है तो वस्त्रोंसहित स्नानमात्रसे उसकी शुद्धि हो जाती है, इसमें संदेह नहीं॥ ५५-५७॥ |
| अस्थिसंचयनादर्वागेकाहं क्षत्रवैश्ययोः।<br>अन्यथा चैव सज्ज्योतिर्ब्राह्मणे स्नानमेव तु॥ ५६॥ | |
| अनस्थिसंचिते विप्रे ब्राह्मणो रौति चेत् तदा।<br>स्नानेनैव भवेच्छुद्धिः सचैलेन न संशयः॥ ५७॥ | |
| यस्तैः सहाशनं कुर्याच्छयनादीनि चैव हि।<br>बान्धवो वापरो वापि स दशाहेन शुध्यति॥ ५८॥ | आशौचीजनोंके साथ जो भोजन तथा शयन आदि करता है, वह चाहे बान्धव हो या कोई दूसरा, दस दिनमें शुद्ध होता है। जो इच्छापूर्वक उनका एक बार भी अन्न ग्रहण करता है तो वह अशौच पूरा होनेपर स्नान करनेसे शुद्ध हो जाता है। दुर्भिक्षसे पीड़ित व्यक्ति जितने दिनतक उस (अशौची)-का अन्न ग्रहण करता है, उतने दिनोंतकका उसे अशौच होता है, तदनन्तर उसे प्रायश्चित्त करना चाहिये॥ ५८-६०॥ |
| यस्तेषामन्नमश्नाति सकृदेवापि कामतः।<br>तदाशौचे निवृत्तेऽसौ स्नानं कृत्वा विशुध्यति॥ ५९॥ | |
| यावत्तदन्नमश्नाति दुर्भिक्षोपहतो नरः।<br>तावन्त्यहान्यशौचं स्यात् प्रायश्चित्तं ततश्चरेत्॥ ६०॥ | |
| दाहाद्यशौचं कर्तव्यं द्विजानामग्निहोत्रिणाम्।<br>सपिण्डानां तु मरणे मरणादितरेषु च॥ ६१॥ | अग्निहोत्री द्विजोंका दाह-कालसे अशौच आरम्भ होता है, अतः (तभीसे इनके मरणके निमित्त) नियमका पालन करना चाहिये। सपिण्डोंके मरने तथा जन्ममें भी अशौचका पालन करना चाहिये। पुरुषकी सपिण्डता सातवीं पीढ़ीमें समाप्त हो जाती है। अपने वंशके मूल पुरुषका नाम ज्ञात न होनेपर समानोदकता नष्ट हो जाती है॥ ६१-६२॥ |
| सपिण्डता च पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते।<br>समानोदकभावस्तु जन्मनाम्नोरवेदने॥ ६२॥ |