संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३५६ | * कूर्मपुराण * |
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| त्रिणाचिकेतच्छन्दोगो ज्येष्ठसामग एव च।<br>अथर्वशिरसोऽध्येता रुद्राध्यायी विशेषतः॥ ५ ॥ | त्रिणाचिकेत¹ (यजुर्वेदके अंशविशेषका अध्येता) छन्दोग² (सामवेदका ज्ञाता) ज्येष्ठसामग³—ज्येष्ठसाम (सामगान) तथा अथर्ववेदका अध्येता और विशेषरूपसे रुद्राध्यायका अध्ययन करनेवाला (ब्राह्मण पंक्तिपावन होता है)॥ ५॥ |
| अग्निहोत्रपरो विद्वान् न्यायविच्च षडङ्गवित्।<br>मन्त्रब्राह्मणविच्चैव यश्च स्याद् धर्मपाठकः॥ ६ ॥<br><br>ऋषिव्रती ऋषीकश्च तथा द्वादशवार्षिकः।<br>ब्राह्मदेयानुसंतानो गर्भशुद्धः सहस्रदः॥ ७ ॥<br><br>चान्द्रायणव्रतचरः सत्यवादी पुराणवित्।<br>गुरुदेवाग्निपूजासु प्रसक्तो ज्ञानतत्परः॥ ८ ॥<br><br>विमुक्तः सर्वतो धीरो ब्रह्मभूतो द्विजोत्तमः।<br>महादेवार्चनरतो वैष्णवः पंक्तिपावनः॥ ९ ॥<br><br>अहिंसानिरतो नित्यमप्रतिग्रहणस्तथा।<br>सत्रिणो दाननिरता विज्ञेयाः पंक्तिपावनाः॥ १०॥ | अग्निहोत्रपरायण, विद्वान्, न्यायवेत्ता, वेदके शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष—इन छः अङ्गोंको जाननेवाला, वेदके मन्त्रभाग एवं ब्राह्मण-भागको जाननेवाला तथा धर्मशास्त्रको पढ़नेवाला, ऋषियोंके व्रतोंका पालन करनेवाला, ऋषीक⁴, बारह वर्षोंतक चलनेवाले व्रत, यज्ञ (सत्र)-का करनेवाला, ब्राह्म⁵-विवाहद्वारा उत्पन्न संतान, गर्भाधानादि संस्कारसे शुद्ध और सहस्रों (शिष्योंको विद्या) दान करनेवाला (ब्राह्मण) पंक्तिपावन होता है। चान्द्रायणव्रत करनेवाला, सत्यवादी, पुराण जाननेवाला, गुरु, देवता और अग्निकी पूजामें आसक्त, ज्ञानपरायण, आसक्ति आदिसे सर्वथा मुक्त, धीर, ब्रह्मज्ञानी, महादेवकी पूजामें निरत रहनेवाला तथा वैष्णव श्रेष्ठ द्विज पंक्तिपावन होता है। नित्य अहिंसा-व्रतपरायण, अप्रतिग्रही, यज्ञ⁶ करनेवाले और दान देने-वाले (ब्राह्मणों)-को पंक्तिपावन जानना चाहिये॥ ६–१०॥ |
| युवानः श्रोत्रियाः स्वस्था महायज्ञपरायणाः।<br>सावित्रीजापनिरता ब्राह्मणाः पंक्तिपावनाः॥ ११ ॥<br><br>कुलीनाः श्रुतवन्तश्च शीलवन्तस्तपस्विनः।<br>अग्निचित्स्नातका विप्रा विज्ञेयाः पंक्तिपावनाः॥ १२ ॥ | श्रोत्रिय, स्वस्थ, महायज्ञ⁷-परायण, गायत्री-जप करनेमें निरत ब्राह्मण युवक (सामर्थ्यसम्पन्न) पंक्तिपावन होते हैं। कुलीन, ज्ञानवान्, शीलवान्, तपस्वी एवं अग्निका चयन⁸ करनेवाले स्नातक⁹ ब्राह्मणोंको पंक्तिपावन जानना चाहिये॥ ११–१२॥ |
१-अध्वर्युवेदभाग (यजुर्वेदका भागविशेष) एवं उसके व्रत त्रिणाचिकेत हैं। इन दोनोंके सम्बन्धसे ब्राह्मण भी 'त्रिणाचिकेत' कहा जाता है (मनु० ३।१८४)।
२-छन्द (वेदविशेष साम)-के गानमें कुशल अथवा सामवेदका अध्येता 'छन्दोग' है (शब्दकल्पद्रुम)।
३-'ज्येष्ठसाम' सामवेद या उसके अध्ययनका अङ्ग व्रत है, इसका सम्बन्ध जिस ब्राह्मणसे है वह 'ज्येष्ठसामग' है।
४-'ऋषीक' का अर्थ 'ऋषिपुत्र' है। प्रकृतमें 'ऋषि-परम्परामें उत्पन्न' अर्थ समझना चाहिये।
५-मूलमें 'ब्राह्मदेयानुसंतान' शब्द है। इसका 'जिसकी कुलपरम्परामें ब्रह्म (वेद)-के अध्ययनाध्यापनकी परम्परा अविच्छिन्नरूपसे चल रही हो'—यह अर्थ भी किया जा सकता है।
६-मूलमें 'सत्री' शब्द है। इसका अर्थ यज्ञ, यज्ञविशेष, दान-परायण, कथाश्रवण एवं अनेक दिन-साध्य अनुष्ठान आदि हैं। इन सबके अनुष्ठाता ब्राह्मणको 'सत्री' कहा जायगा।
७-'महायज्ञ' पञ्चमहायज्ञोंको कहा जाता है, वे इस प्रकार हैं— (१) ब्रह्मयज्ञ (वेदका अध्ययनाध्यापन), (२) पितृयज्ञ (तर्पण), (३) देवयज्ञ (होम), (४) भूतयज्ञ (भूतबलि) और (५) मनुष्ययज्ञ (अतिथि-पूजन)।
८-मूलमें 'अग्निचित्' शब्द है। इसका अर्थ है—'अग्निहोत्री'।
९-सविधि ब्रह्मचर्यव्रत पूर्णकर स्नानविशेषरूप संस्कारके अनन्तर गृहस्थाश्रममें प्रविष्ट या अप्रविष्ट द्विज स्नातक होता है। यहाँ ऐसे ब्राह्मणमात्रको लेना है।