भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय २१ * | ३५५ ---|---

कालशाकं महाशल्कं खड्गलोहामिषं मधु।
आनन्त्यायैव कल्पन्ते मुन्यन्नानि च सर्वशः ॥ ४४ ॥
क्रीत्वा लब्ध्वा स्वयं वाथ मृतानाहृत्य वा द्विजः।
दद्याच्छ्राद्धे प्रयत्नेन तदस्याक्षयमुच्यते ॥ ४५ ॥
पिप्पलीं क्रमुकं चैव तथा चैव मसूरकम्।
कूष्माण्डालाबुवार्ताकान् भूस्तृणं सुरसं तथा ॥ ४६ ॥
कुसुम्भपिण्डमूलं वै तन्दुलीयकमेव च।
राजमाषांस्तथा क्षीरं माहिषं च विवर्जयेत् ॥ ४७ ॥
कोद्रवान् कोविदारांश्च पालक्यान् मरिचांस्तथा।
वर्जयेत् सर्वयत्नेन श्राद्धकाले द्विजोत्तमः ॥ ४८ ॥ | श्राद्धमें पिप्पली, सुपारी, मसूर, कूष्माण्ड, (वर्तुलाकार— गोल) लौकी, बैगन, रसयुक्त भूस्तृण, कुसुम्भ, पिण्डमूल (रर्जर), तन्दुलीयक, (चौंराई शाकविशेष) राजमाष (वर्वट, वर्वटी, कड़ाई लोकभाषामें) और भैंसके दूधका प्रयोग नहीं करना चाहिये। श्रेष्ठ द्विजको श्राद्धमें कोदो, कोविदार (कचनार), पालक तथा मरिचका प्रयत्नपूर्वक त्याग करना चाहिये॥ ४४-४८॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २०॥


इक्कीसवाँ अध्याय

श्राद्ध-प्रकरणमें निमन्त्रणके योग्य पंक्तिपावन ब्राह्मणों तथा त्याज्य पंक्ति-दूषकोंके लक्षण

व्यास उवाच | व्यासजी बोले—द्विजको चाहिये कि चन्द्रमाके क्षय होनेपर अर्थात् अमावास्याको स्नानकर यथोक्त रीतिसे पितरोंका तर्पण करके शान्तचित्त होकर तथा पवित्रतापूर्वक पिण्डान्वाहार्यक श्राद्ध करे। (श्राद्धसे) पूर्व ही वेदमें पारंगत विद्वान् ब्राह्मणका अन्वेषण करना चाहिये, क्योंकि उसे ही (वेदपारग ब्राह्मणको ही) हव्य, कव्य, तीर्थ और दानका अतिथि (अधिकारी) कहा गया है॥ १-२॥ स्नात्वा यथोक्तं संतर्प्य पितॄंश्चन्द्रक्षये द्विजः।<br>पिण्डान्वाहार्यकं श्राद्धं कुर्यात् सौम्यमनाः शुचिः ॥ १ ॥<br><br>पूर्वमेव परीक्षेत ब्राह्मणं वेदपारगम्।<br>तीर्थं तद् हव्यकव्यानां प्रदाने चातिथिः स्मृतः ॥ २ ॥ | ये सोमपा विरजसो धर्मज्ञाः शान्तचेतसः।<br>व्रतिनो नियमस्थाश्च ऋतुकालाभिगामिनः ॥ ३ ॥ | जो सोमपायी, रजोगुणसे हीन, धर्मको जाननेवाले, शान्तचित्त, व्रतपरायण, नियममें स्थित, ऋतुकालमें गमन करनेवाले हैं (वे ब्राह्मण पंक्तिपावन हैं)। पञ्चाग्निका सेवन करनेवाला, अध्ययनशील, यजुर्वेदका ज्ञाता, बह्वृच् (ऋग्वेदी) त्रिसौपर्ण¹ तथा त्रिमधु² अर्थात् ऋग्वेदके अंश-विशेषका अध्येता, ॥ ३-४॥ पञ्चाग्निरप्यधीयानो यजुर्वेदविदेव च।<br>बह्वृचश्च त्रिसौपर्णस्त्रिमधुर्वाथ यो भवेत् ॥ ४ ॥ |


१-ऋग्वेदका विशेष वेदभाग एवं उसका व्रत त्रिसुपर्ण कहा जाता है, अतः इसके सम्बन्धसे ब्राह्मणको त्रिसुपर्ण या त्रिसौपर्ण कहा जाता है (मनु० ३। १८४)।
२-तीन बार मधु शब्द जिन ऋचाओंमें आया है, वे 'मधुव्वाता......' आदि तीन ऋचाएँ (शब्दकल्पद्रुम)।