संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 453, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 453
| * अध्याय ३६ * | ४४३ |
|---|---|
| नदी त्रैलोक्यविख्याता ताम्रपर्णीति नामतः ।<br>तत्र स्नात्वा पितॄन् भक्त्या तर्पयित्वा यथाविधि ।<br>पापकर्तृनपि पितॄंस्तारयेन्नात्र संशयः ॥ २० ॥ | ताम्रपर्णी नामवाली नदी तीनों लोकोंमें विख्यात है। वहाँ स्नानकर विधिपूर्वक भक्तिभावसे पितरोंका तर्पण करनेसे मनुष्य पाप करनेवाले पितरोंको भी मुक्त कर देता है, इसमें संदेह नहीं ॥ २० ॥ |
| चन्द्रतीर्थमिति ख्यातं कावेर्याः प्रभवेऽक्षयम् ।<br>तीर्थं तत्र भवेद् वस्तुं मृतानां स्वर्गतिर्ध्रुवा ॥ २१ ॥ | कावेरीके उद्गम स्थानपर चन्द्रतीर्थ नामसे विख्यात अक्षय फल देनेवाला एक तीर्थ है। वहाँ निवास करने तथा वहाँ मृत्यु होनेपर निश्चय ही स्वर्गकी प्राप्ति होती है। |
| विन्ध्यपादे प्रपश्यन्ति देवदेवं सदाशिवम् ।<br>भक्त्या ये ते न पश्यन्ति यमस्य सदनं द्विजाः ॥ २२ ॥ | जो विन्ध्यपादमें देवाधिदेव सदाशिवका भक्तिपूर्वक दर्शन करते हैं, वे द्विज यमलोकका दर्शन नहीं करते। |
| देविकायां वृषो नाम तीर्थं सिद्धनिषेवितम् ।<br>तत्र स्नात्वोदकं दत्त्वा योगसिद्धिं च विन्दति ॥ २३ ॥ | देविकामें वृष नामका एक तीर्थ है जो सिद्धोंद्वारा सेवित है। वहाँ स्नानकर (पितरोंको) जलदान (तर्पण) करनेसे योगसिद्धि प्राप्त होती है। |
| दशाश्वमेधिकं तीर्थं सर्वपापविनाशनम् ।<br>दशानामश्वमेधानां तत्राप्नोति फलं नरः ॥ २४ ॥ | दशाश्वमेधिक नामक तीर्थ सभी पापोंको विनष्ट करनेवाला है। वहाँ (स्नान, दान आदि पुण्य कार्य करनेसे) मनुष्य दस अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। |
| पुण्डरीकं महातीर्थं ब्राह्मणैरुपसेवितम् ।<br>तत्राभिगम्य युक्तात्मा पौण्डरीकफलं लभेत् ॥ २५ ॥ | पुण्डरीक नामक महातीर्थ ब्राह्मणोंके द्वारा भलीभाँति सेवित है। वहाँकी यात्रा करनेसे संयतचित्त व्यक्ति पौण्डरीक (याग)-का फल प्राप्त करता है ॥ २१-२५ ॥ |
| तीर्थेभ्यः परमं तीर्थं ब्रह्मतीर्थमिति श्रुतम् ।<br>ब्रह्माणमर्चयित्वा तु ब्रह्मलोके महीयते ॥ २६ ॥ | तीर्थोंमें परम तीर्थ 'ब्रह्मतीर्थ' इस नामसे विख्यात है। वहाँ ब्रह्माकी पूजा करनेसे ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। |
| सरस्वत्या विनशनं प्लक्षप्रस्रवणं शुभम् ।<br>व्यासतीर्थं परं तीर्थं मैनाकं च नगोत्तमम् ।<br>यमुनाप्रभवं चैव सर्वपापविशोधनम् ॥ २७ ॥ | सरस्वतीका विनशन अर्थात् लुप्त होनेका स्थान, शुभ प्लक्षप्रस्रवण, श्रेष्ठ व्यासतीर्थ, पर्वतोंमें उत्तम मैनाक तथा सभी पापोंका शोधन करनेवाला यमुनाका उद्गम स्थान—ये सभी तीर्थ हैं(तथा सभी पापोंका शोधन करनेवाले हैं) ॥ २६-२७ ॥ |
| पितॄणां दुहिता देवी गन्धकालीति विश्रुता ।<br>तस्यां स्नात्वा दिवं याति मृतो जातिस्मरो भवेत् ॥ २८ ॥ | पितरोंकी पुत्री गन्धकाली देवी (एक विशेष नदीके रूपमें) विख्यात है। उसमें स्नान करनेसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है और मरनेके उपरान्त पूर्वजन्मोंके स्मरणकी शक्ति प्राप्त होती है। |
| कुबेरतुङ्गं पापघ्नं सिद्धचारणसेवितम् ।<br>प्राणांस्तत्र परित्यज्य कुबेरानुचरो भवेत् ॥ २९ ॥ | सिद्धों तथा चारणोंसे सेवित 'कुबेरतुङ्ग' नामक तीर्थ पापोंको विनष्ट करनेवाला है। वहाँ प्राणोंका परित्याग करनेसे व्यक्ति कुबेरका अनुचर होता है। |
| उमातुङ्गमिति ख्यातं यत्र सा रुद्रवल्लभा ।<br>तत्राभ्यर्च्य महादेवीं गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ३० ॥ | 'उमातुङ्ग' नामक एक प्रसिद्ध तीर्थ है, जहाँ रुद्रकी प्रिया पार्वती स्थित रहती हैं। वहाँ महादेवीकी आराधना करनेसे हजारों गौओंके दानका फल प्राप्त होता है। |
| भृगुतुङ्गे तपस्तप्तं श्राद्धं दानं तथा कृतम् ।<br>कुलान्युभयतः सप्त पुनातीति श्रुतिर्मम ॥ ३१ ॥ | मैंने ऐसा सुना है कि भृगुतुङ्ग (अन्य तीर्थ-विशेष)-पर तपस्या करने, श्राद्ध तथा दान आदि करनेसे व्यक्ति अपने दोनों कुलों (मातृकुल-पितृकुल)-की सात पीढ़ियोंको पवित्र कर देता है ॥ २८-३१ ॥ |