भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४४२कूर्मपुराण
तीर्थं प्लक्षावतरणं सर्वपापविनाशनम्।<br>तत्राभ्यर्च्य श्रीनिवासं विष्णुलोके महीयते॥ ८॥<br><br>अन्यं मगधराजस्य तीर्थं स्वर्गगतिप्रदम्।<br>अक्षयं विन्दति स्वर्गं तत्र गत्वा द्विजोत्तमः॥ ९॥<br><br>तीर्थं कनखलं पुण्यं महापातकनाशनम्।<br>यत्र देवेन रुद्रेण यज्ञो दक्षस्य नाशितः॥ १०॥<br><br>तत्र गङ्गामुपस्पृश्य शुचिर्भावसमन्वितः।<br>मुच्यते सर्वपापैस्तु ब्रह्मलोकं लभेन्मृतः॥ ११॥<br><br>महातीर्थमिति ख्यातं पुण्यं नारायणप्रियम्।<br>तत्राभ्यर्च्य हृषीकेशं श्वेतद्वीपं निगच्छति॥ १२॥<br>अन्यच्च तीर्थप्रवरं नाम्ना श्रीपर्वतं शुभम्।<br>तत्र प्राणान् परित्यज्य रुद्रस्य दयितो भवेत्॥ १३॥(एक) प्लक्षावतरण-तीर्थ (है जो) सभी पापोंको नष्ट करनेवाला है। वहाँ श्रीनिवासकी आराधना करनेसे विष्णुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। मगधराजका एक अन्य तीर्थ है, जो स्वर्ग प्रदान करनेवाला है। वहाँकी यात्रा करनेसे द्विजोत्तमको अक्षय स्वर्ग प्राप्त होता है। कनखल नामका एक तीर्थ है जो पुण्यप्रद तथा महापातकोंको नष्ट करनेवाला है। रुद्रदेवने जहाँ दक्षके यज्ञका विध्वंस किया था। वहाँपर पवित्र भावनासे युक्त होकर गङ्गास्नान करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है और मरनेपर ब्रह्मलोक प्राप्त करता है। ‘महातीर्थ’ इस नामसे विख्यात नारायणका प्रिय एक पवित्र तीर्थ है, वहाँ हृषीकेशकी आराधना करनेसे श्वेतद्वीपकी प्राप्ति होती है॥ ८—१२॥<br><br>‘श्रीपर्वत’ नामका एक दूसरा शुभ श्रेष्ठ तीर्थ है, वहाँ प्राणोंका परित्याग करनेसे व्यक्ति रुद्रका प्रिय होता है। वहाँ देवी (पार्वती)-के साथ महेश्वर रुद्र स्थित रहते हैं। वहाँ किये हुए स्नान, पिण्डदान आदि उत्तम कर्म अक्षय हो जाते हैं॥ १३-१४॥
तत्र संनिहितो रुद्रो देव्या सह महेश्वरः।<br>स्नानपिण्डादिकं तत्र कृतमक्षय्यमुत्तमम्॥ १४॥<br>गोदावरी नदी पुण्या सर्वपापविनाशिनी।<br>तत्र स्नात्वा पितॄन् देवांस्तर्पयित्वा यथाविधि।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा गोसहस्रफलं लभेत्॥ १५॥<br><br>पवित्रसलिला पुण्या कावेरी विपुला नदी।<br>तस्यां स्नात्वोदकं कृत्वा मुच्यते सर्वपातकैः।<br>त्रिरात्रोपोषितेनाथ एकरात्रोषितेन वा॥ १६॥<br><br>द्विजातीनां तु कथितं तीर्थानामिह सेवनम्।<br>यस्य वाङ्मनसी शुद्धे हस्तपादौ च संस्थितौ।<br>अलोलुपो ब्रह्मचारी तीर्थानां फलमाप्नुयात्॥ १७॥गोदावरी नदी पवित्र और सभी पापोंका नाश करनेवाली है। वहाँ स्नानकर विधिपूर्वक पितरों तथा देवताओंका तर्पण करनेसे (मनुष्य) सभी पापोंसे रहित होकर पवित्रात्मा हो जाता है और उसे हजारों गोदान करनेका फल प्राप्त होता है। शुद्ध जलवाली विशाल कावेरी नदी पुण्यस्वरूप ही है। उसमें स्नान कर तीन रात्रि अथवा एक रात्रिका उपवास करके तर्पण आदि करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। द्विजातियोंके लिये यहाँ तीर्थोंके सेवनका विधान किया गया है। जिसके मन एवं वाणी शुद्ध हों तथा हाथ-पैर संयमित हों, ऐसा लोभरहित तथा ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाला द्विज तीर्थों (-में निवास)-का फल प्राप्त करता है॥ १५—१७॥
स्वामितीर्थं महातीर्थं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।<br>तत्र संनिहितो नित्यं स्कन्दोऽमरनमस्कृतः॥ १८॥<br><br>स्नात्वा कुमारधारायां कृत्वा देवादितर्पणम्।<br>आराध्य षण्मुखं देवं स्कन्देन सह मोदते॥ १९॥स्वामितीर्थ नामक महातीर्थ तीनों लोकोंमें विख्यात है। देवताओंद्धारा नमस्कृत (भगवान्) कार्तिकेय वहाँ नित्य स्थित रहते हैं। (वहाँ) कुमारधारामें स्नानकर देवताओंका पूजन तथा पितरोंका तर्पण करके षण्मुख देव कार्तिकेयकी आराधना करनेसे (आराधक) स्कन्द (कार्तिकेय)-के साथ आनन्द प्राप्त करता है॥ १८-१९॥