भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ३६ *४४१
सहोमया सपार्षदः सराजपुंगवो हरः।<br>मुनीशसिद्धवन्दितः क्षणाददृश्यतामगात् ॥ ३४ ॥<br><br>काले महेशाभिहते लोकनाथः पितामहः।<br>अयाचत वरं रुद्रं सजीवोऽयं भवत्विति ॥ ३५ ॥<br><br>नास्ति कश्चिदपीशान दोषलेशो वृषध्वज।<br>कृतान्तस्यैव भवता तत्कार्ये विनियोजितः ॥ ३६ ॥<br><br>स देवदेववचनाद् देवदेवेश्वरो हरः।<br>तथास्त्वित्याह विश्वात्मा सोऽपि तादृग्विधोऽभवत् ॥ ३७ ॥<br><br>इत्येतत् परमं तीर्थं कालञ्जरमिति श्रुतम्।<br>गत्वाभ्यर्च्य महादेवं गाणपत्यं स विन्दति ॥ ३८ ॥उमा, पार्षद, तथा श्रेष्ठ राजा (श्वेत)-के साथ हर (महेश्वर) मुनीशों तथा सिद्धोंसे वन्दित होते हुए क्षणभरमें अदृश्य हो गये। महेश्वरके द्वारा कालके मारे जानेपर लोकनाथ पितामह (ब्रह्मा)-ने रुद्रसे इस वरकी याचना की कि यह (काल) जीवित हो जाय। (ब्रह्माने कहा-)<br>ईशान ! वृषध्वज ! इस कृतान्तका लेशमात्र भी दोष नहीं है। आपने ही इसे उस कार्य (मृत्युके कार्य) में नियोजित किया है। देवाधिप (ब्रह्मा)-के कहनेपर उन देवदेवेश्वर विश्वात्मा हरने 'ऐसा ही हो' यह कहा। तब वह काल भी उसी प्रकारका अर्थात् जीवित हो गया ॥ ३४–३७ ॥<br><br>इस प्रकार यह श्रेष्ठ तीर्थ कालञ्जर इस नामसे विख्यात है। यहाँ जाकर महादेवकी आराधना करनेवाला व्यक्ति गाणपत्य पद प्राप्त करता है ॥ ३८ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें पैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३५ ॥


छत्तीसवाँ अध्याय

तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें विविध तीर्थोंकी महिमा, देवदारु-वन-तीर्थका माहात्म्य

सूत उवाचसूतजीने कहा—
इदमन्यत् परं स्थानं गुह्याद् गुह्यतमं महत्।<br>महादेवस्य देवस्य महालयमिति श्रुतम् ॥ १ ॥<br><br>तत्र देवादिदेवेन रुद्रेण त्रिपुरारिणा।<br>शिलातले पदं न्यस्तं नास्तिकानां निदर्शनम् ॥ २ ॥<br><br>तत्र पाशुपताः शान्ता भस्मोद्धूलितविग्रहाः।<br>उपासते महादेवं वेदाध्ययनतत्पराः ॥ ३ ॥<br><br>स्नात्वा तत्र पदं शार्वं दृष्ट्वा भक्तिपुरःसरम्।<br>नमस्कृत्याथ शिरसा रुद्रसामीप्यमाप्नुयात् ॥ ४ ॥<br><br>अन्यच्च देवदेवस्य स्थानं शम्भोर्महात्मनः।<br>केदारमिति विख्यातं सिद्धानामालयं शुभम् ॥ ५ ॥<br><br>तत्र स्नात्वा महादेवमभ्यर्च्य वृषकेतनम्।<br>पीत्वा चैवोदकं शुद्धं गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥ ६ ॥<br><br>श्राद्धदानादिकं कृत्वा ह्यक्षयं लभते फलम्।<br>द्विजातिप्रवरैर्जुष्टं योगिभिर्यतमानसैः ॥ ७ ॥भगवान् महादेवका एक दूसरा गुह्यसे भी गुह्य महान् श्रेष्ठ स्थान है, जो 'महालय' इस नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ त्रिपुरारि तथा देवोंके आदिदेव रुद्रने नास्तिकोंके लिये प्रमाणके रूपमें शिलातलपर चरण (-का चिह्न) स्थापित किया है। वहाँ समस्त शरीरमें भस्म लगाये हुए, शान्त पशुपतिके भक्तजन वेदाध्ययनमें तत्पर रहकर महादेवकी उपासना करते हैं। उस तीर्थमें स्नानकर भक्तिपूर्वक शंकरके पदका दर्शन करके उन्हें सिरसे नमस्कार करनेसे उन रुद्रका सामीप्य प्राप्त होता है ॥ १-४ ॥<br><br>देवाधिदेव महात्मा शम्भुका एक दूसरा स्थान है जो 'केदार' इस नामसे विख्यात है। वह शुभ स्थान सिद्धोंकी निवासभूमि है। वहाँ स्नान करके वृषकेतु महादेवकी आराधना करने और (वहाँके) पवित्र जलका पान करनेसे गाणपत्य-पदकी प्राप्ति होती है। वह तीर्थ श्रेष्ठ द्विजातियों तथा संयतचित्तवाले योगियोंद्वारा सेवित है। वहाँ श्राद्ध, दान आदि कर्म करनेसे अक्षय फल प्राप्त होता है ॥ ५-७ ॥