संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४० * कूर्मपुराण *
आगच्छन्तं नातिदूरेऽथ दृष्ट्वा
कालो रुद्रं देवदेव्या महेशम्।
व्यपेतभीरखिलेशैकनाथं
राजर्षिस्तं नेतुमभ्याजगाम॥ २३॥
आलोक्यासौ भगवानुग्रकर्मा
देवो रुद्रो भूतभर्ता पुराणः।
एकं भक्तं मत्परं मां स्मरन्तं
देहीतीमं कालमूचे ममेति॥ २४॥
श्रुत्वा वाक्यं गोपतेरुग्रभावः
कालात्मासौ मन्यमानः स्वभावम्।
बद्ध्वा भक्तं पुनरेवाथ पाशैः
क्रुद्धो रुद्रमभिदुद्राव वेगात्॥ २५॥
प्रेक्ष्यायान्तं शैलपुत्रीमथेशः
सोऽन्वीक्ष्यान्ते विश्वमायाविधिज्ञः।
सावज्ञं वै वामपादेन मृत्युं
श्वेतस्यैनं पश्यतो व्याजघान॥ २६॥
ममार सोऽतिभीषणो महेशपादघातितः।
रराज देवतापतिः सहोमया पिनाकधृक्॥ २७॥
निरीक्ष्य देवमीश्वरं प्रहृष्टमानसो हरम्।
ननाम साम्बमव्ययं स राजपुंगवस्तदा॥ २८॥
नमो भवाय हेतवे हराय विश्वसम्भवे।
नमः शिवाय धीमते नमोऽपवर्गदायिने॥ २९॥
नमो नमो नमोऽस्तु ते महाविभूतये नमः।
विभागहीनरूपिणे नमो नराधिपाय ते॥ ३०॥
नमोऽस्तु ते गणेश्वर प्रपन्नदुःखनाशन।
अनादिनित्यभूतये वराहशृङ्गधारिणे॥ ३१॥
नमो वृषध्वजाय ते कपालमालिने नमः।
नमो महानटाय ते नमो वृषध्वजाय ते॥ ३२॥
अथानुगृह्य शंकरः प्रणामतत्परं नृपम्।
स्वगाणपत्यमव्ययं सरूपतामथो ददौ॥ ३३॥
तदनन्तर सम्पूर्ण ईशोंके एकमात्र स्वामी महेश्वर रुद्रको महादेवीके साथ समीपमें ही आते हुए देखकर राजर्षि भयरहित हो गये, (तथापि) काल उन्हें लेने आया। प्राणियोंके स्वामी, पुराण तथा उग्रकर्मा भगवान् रुद्रदेवने यह देखकर कालसे कहा—मेरे शरणागत तथा मेरा स्मरण कर रहे इस मेरे भक्तको मुझे दे दो॥ २३-२४॥
गोपति (इन्द्रियों एवं वाणीके स्वामी)-के वाक्यको सुनकर वह उग्रभाववाला क्रुद्ध कालात्मा अपने स्वभावपर गर्व करते हुए पुनः उस (शिव) भक्तको पाशोंसे बाँधकर वेगपूर्वक रुद्रकी ओर दौड़ा। तब उसे (काल-मृत्यु) आता हुआ देखकर विश्वमायाके विधानको जाननेवाले शंकरने शैलपुत्रीकी ओर देखते हुए उस (श्वेत)-के देखते-देखते अवज्ञापूर्वक अपने बाँयें पैरसे मृत्यु (काल)-को मार दिया। महेश्वरके पादसे आहत होकर अति भयंकर वह (काल) मर गया तथा पिनाक धारण करनेवाले देवताओंके पति महेश्वर पार्वतीके साथ भक्त राजा श्वेतकी रक्षा कर लेनेके कारण प्रसन्न हो गये॥ २५-२७॥
(भक्तवत्सल महादेव रुद्रके अनुग्रहसे) प्रसन्न-मनवाले उस श्रेष्ठ राजाने देव ईश्वर हरको देखकर अम्बासहित उन अव्ययको प्रणाम किया॥ २८॥
(राजाने प्रार्थना करते हुए कहा—) जगत्के कारणरूप और विश्वको उत्पन्न करनेवाले भव एवं हरको नमस्कार है। धीमान् शिवको नमस्कार है। मोक्ष प्रदान करनेवालेको नमस्कार है। महाविभूतिस्वरूप आपको नमस्कार है, बारंबार नमस्कार है। विभागहीन रूपवाले (अखण्डरूप), नरोंके अधिपति आपको नमस्कार है। प्रणतजनोंके दुःखोंका नाश करनेवाले गणोंके ईश्वर! आपको नमस्कार है। अनादि तथा नित्य ऐश्वर्यसम्पन्न और वराहका शृंग धारण करनेवालेको नमस्कार है। वृषध्वज! आपको नमस्कार है। कपालकी माला धारण करनेवालेको नमस्कार है। महानट*! आपको नमस्कार है, वृषध्वज! आपको नमस्कार है॥ २९-३२॥
प्रणाममें तत्पर (अत्यन्त प्रणत) राजाके ऊपर अनुग्रह करके शंकरने उन्हें अपना शाश्वत गाणपत्य पद तथा अपना स्वरूप प्रदान किया॥ ३३॥
* ताण्डवनृत्यके एकमात्र परम अधिष्ठाता महादेव हैं, अतः ये 'महानट' कहे जाते हैं।