संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय ३५ * | ४३९ |
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| कालञ्जरं महातीर्थं लोके रुद्रो महेश्वरः।<br>कालं जरितवान् देवो यत्र भक्तप्रियो हरः॥ ११॥<br><br>श्वेतो नाम शिवे भक्तो राजर्षिप्रवरः पुरा।<br>तदाशीस्तन्नमस्कारः पूजयामास शूलिनम्॥ १२॥<br><br>संस्थाप्य विधिना लिङ्गं भक्तियोगपुरःसरः।<br>जजाप रुद्रमनिशं तत्र संन्यस्तमानसः॥ १३॥<br><br>स तं कालोऽथ दीप्तात्मा शूलमादाय भीषणम्।<br>नेतुमभ्यागतो देशं स राजा यत्र तिष्ठति॥ १४॥ | इस लोकमें कालञ्जर नामका एक महातीर्थ है, जहाँ भक्तोंके प्रिय महेश्वर रुद्र हरने कालको जीर्ण किया था। प्राचीन कालमें श्वेत नामक एक श्रेष्ठ राजर्षि थे, जो शिवके भक्त थे। उन्होंने त्रिशूली (रुद्र)-की भक्ति करते हुए उन्हें ही नमस्कार करते हुए उनकी पूजा की। विधिपूर्वक शिवलिङ्गकी स्थापना कर भक्तियोगपूर्वक वहीं वे उन्हीं (रुद्र)-में मन लगाते हुए निरन्तर उनका जप करने लगे। वे राजा (श्वेत) जिस स्थानपर थे कुछ समय बाद वहाँ भयंकर शूल लिये हुए प्रदीप्त स्वरूपवाला काल उन्हें अपने देश ले जानेके लिये आया॥ ११-१४॥ | | वीक्ष्य राजा भयाविष्टः शूलहस्तं समागतम्।<br>कालं कालकरं घोरं भीषणं चण्डदीधितिम्॥ १५॥<br><br>उभाभ्यामथ हस्ताभ्यां स्पृष्ट्वासौ लिङ्गमैश्र्वरम्।<br>ननाम शिरसा रुद्रं जजाप शतरुद्रियम्॥ १६॥<br><br>जपन्तमाह राजानं नमन्तमसकृद् भवम्।<br>एह्येहीति पुरः स्थित्वा कृतान्तः प्रहसन्निव॥ १७॥<br><br>तमुवाच भयाविष्टो राजा रुद्रपरायणः।<br>एकमीशार्चनरतं विहायान्यं निष्षूदय॥ १८॥ | हाथमें शूल लिये हुए, मृत्युजनक, घोर, भीषण, उग्र किरणोंवाले उस कालको आया हुआ देखकर राजा (श्वेत) भयभीत हो गये। उन्होंने अपने दोनों हाथोंसे ईश्वरके लिङ्गका स्पर्श करते हुए सिरसे उनको प्रणाम किया और शतरुद्रियका जप करने लगे। जप कर रहे तथा बार-बार भवको प्रणाम कर रहे राजासे उनके सामने खड़े होकर कृतान्त (काल)-ने हँसते हुए 'आओ', 'आओ' इस प्रकारसे कहा। भयसे व्याकुल रुद्रपरायण राजाने उससे कहा—एकमात्र ईशकी आराधनामें रत व्यक्तिको छोड़कर अन्यको मारो॥ १५-१८॥ | | इत्युक्तवन्तं भगवानब्रवीद् भीतमानसम्।<br>रुद्रार्चनरतो वान्यो मद्वशे को न तिष्ठति॥ १९॥ | इस प्रकार कह रहे भयभीत मनवाले राजासे भगवान् (काल)-ने कहा—चाहे रुद्रकी आराधना करनेवाला हो या अन्य कोई हो, कौन मेरे वशमें नहीं है अर्थात् सभी मुझ कालके वशमें हैं। ऐसा कहकर लोकसंहारक वह काल राजाको पाशोंके द्वारा बाँधने लगा और राजा शतरुद्रियका जप करने लगे॥ १९-२०॥ | | एवमुक्त्वा स राजानं कालो लोकप्रकालनः।<br>बबन्ध पाशै राजापि जजाप शतरुद्रियम्॥ २०॥<br>अथान्तरिक्षे विमलं दीप्यमानं<br>तेजोराशिं भूतभर्तुः पुराणम्।<br>ज्वालामालासांवृतं व्याप्य विश्वं<br>प्रादुर्भूतं संस्थितं संददर्श॥ २१॥<br><br>तन्मध्येऽसौ पुरुषं रुक्मवर्णं<br>देव्या देवं चन्द्रलेखोज्ज्वलाङ्गम्।<br>तेजोरूपं पश्यति स्मातिहृष्टो<br>मेने चास्मन्नाथ आगच्छतीति॥ २२॥ | अनन्तर राजा श्वेतने समस्त प्राणियोंके अधिपति महादेव रुद्रकी तेजोराशिको देखा। यह तेजोराशि आकाशमें अकस्मात् उत्पन्न हुई थी तथा वहीं विद्यमान थी। यह अति निर्मल स्वतः प्रकाशमान, शाश्वत, ज्वालामाला (प्रभामण्डल)-से आवृत्त और समस्त विश्वमें व्याप्त थी। उस (तेजःसमूह)-के मध्य देवीके साथ, स्वर्णिम वर्णवाले, चन्द्रलेखा-सी उज्ज्वल अङ्गवाले तेजोमय पुरुषको देखकर राजा अत्यन्त प्रसन्न हो गये और उन्होंने समझा कि ये मेरे नाथ आ रहे हैं॥ २१-२२॥ |