भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 448, कुल 506 में से

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४३८ * कूर्मपुराण *


एतावदुक्त्वा भगवाञ्जगामादर्शनं हरः।<br>तत्रैव भक्तियोगेन रुद्रमाराधयन्मुनिः॥ ७५ ॥<br><br>एतत् पवित्रमतुलं तीर्थं ब्रह्मर्षिसेवितम्।<br>संसेव्य ब्राह्मणो विद्वान् मुच्यते सर्वपातकैः॥ ७६ ॥इतना कहकर भगवान् हर अदृश्य हो गये। मुनि (मङ्कणक) वहीं (सप्तसारस्वत तीर्थ)-पर भक्तियोगके द्वारा रुद्रकी आराधना करने लगे। यह अतुलनीय पवित्र तीर्थ ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित है। इसका सेवनकर विद्वान् ब्राह्मण सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है॥ ७५-७६॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्‌साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपविभागमें चौंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३४॥


पैंतीसवाँ अध्याय

तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें विविध तीर्थोंका माहात्म्य, कालञ्जर तीर्थकी महिमाके वर्णनके प्रसंगमें शिवभक्त राजा श्वेतकी कथा

सूत उवाचसूतजीने कहा—
अन्यत् पवित्रं विपुलं तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>रुद्रकोटिरिति ख्यातं रुद्रस्य परमेष्ठिनः॥ १ ॥<br>पुरा पुण्यतमे काले देवदर्शनतत्पराः।<br>कोटिब्रह्मर्षयो दान्तास्तं देशमगमन् परम्॥ २ ॥<br>अहं द्रक्ष्यामि गिरिशं पूर्वमेव पिनाकिनम्।<br>अन्योन्यं भक्तियुक्तानां व्याघातो जायते किल॥ ३ ॥परमेष्ठी रुद्रका रुद्रकोटि नामक एक दूसरा महान् पवित्र तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है। पूर्वकालमें किसी पवित्र समयमें देव-दर्शनोंके लिये उत्सुक एक करोड़ इन्द्रियजयी ब्रह्मर्षि उस श्रेष्ठ स्थानपर गये। उन भक्तियुक्त महर्षियोंमें यह महान् विवाद उत्पन्न हो गया कि सबसे पहले मैं ही पिनाकी गिरिशका दर्शन करूँगा॥ १-३॥
तेषां भक्तिं तदा दृष्ट्वा गिरिशो योगिनां गुरुः।<br>कोटिरूपोऽभवद् रुद्रो रुद्रकोटिस्ततः स्मृतः॥ ४ ॥<br><br>ते स्म सर्वे महादेवं हरं गिरिगुहाशयम्।<br>पश्यन्तः पार्वतीनाथं हृष्टपुष्टधियोऽभवन्॥ ५ ॥<br><br>अनाद्यन्तं महादेवं पूर्वमेवाहमिश्वरम्।<br>दृष्टवानिति भक्त्या ते रुद्रन्यस्तधियोऽभवन्॥ ६ ॥<br><br>अथान्तरिक्षे विमलं पश्यन्ति स्म महत्तरम्।<br>ज्योतिस्तत्रैव ते सर्वेऽभिलषन्तः परं पदम्॥ ७ ॥<br><br>एतत् सदेशाध्युषितं तीर्थं पुण्यतमं शुभम्।<br>दृष्ट्वा रुद्रं समभ्यर्च्य रुद्रसामीप्यमाप्नुयात्॥ ८ ॥तब उनकी (विशेष) भक्तिको देखकर योगियोंके गुरु गिरिश रुद्र करोड़ों रूपोंमें हो गये, तभीसे वे रुद्रकोटिके नामसे स्मरण किये जाने लगे। पर्वतकी गुहाके मध्य स्थित पार्वतीनाथ उन महादेव हरका दर्शनकर वे सभी हृष्ट-पुष्ट बुद्धिवाले हो गये। और मैंने ही सबसे पहले अनादि-अनन्त महादेव ईश्वरका दर्शन किया है, इस प्रकार समझकर वे भक्तिभावपूर्वक रुद्रपरायण बुद्धिवाले हो गये। तदनन्तर परम पदकी अभिलाषा रखनेवाले उन सभीने वहीं अन्तरिक्षमें महान्-से-महान् विशुद्ध ज्योतिका दर्शन किया। यह देश (रुद्रद्वारा) निवास किया हुआ पुण्यतम शुभ तीर्थ है। यहाँ रुद्रका दर्शनकर और उनकी सम्यक् आराधना कर रुद्रका सामीप्य (सामीप्य नामक मोक्ष) प्राप्त होता है॥ ४-८॥
अन्यच्च तीर्थप्रवरं नाम्ना मधुवनं स्मृतम्।<br>तत्र गत्वा नियमवानिन्द्रस्यार्धासनं लभेत्॥ ९ ॥एक दूसरा श्रेष्ठ तीर्थ है जो मधुवन नामसे कहा जाता है, नियमपूर्वक वहाँ जानेवाला (निवास करनेवाला) इन्द्रका अर्धासन प्राप्त करता है।
अथान्यत् पुष्पनगरी देशः पुण्यतमः शुभः।<br>तत्र गत्वा पितॄन् पूज्य कुलानां तारयेच्छतम्॥ १०॥एक अन्य पुष्पनगरी नामक देश पुण्यतम तथा शुभ है। वहाँ जाकर पितरोंकी पूजा करनेसे व्यक्ति सौ कुलोंको तार देता है॥ ९-१०॥
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