संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ३४ * | ४३७ |
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| इत्युक्ते व्याजहारेमं तथा मङ्कणकं हरः।<br>महेशः स्वात्मनो योगं देवीं च त्रिपुरानलः॥ ६१ ॥<br><br>अहं सहस्त्रनयनः सर्वात्मा सर्वतोमुखः।<br>दाहकः सर्वपापानां कालः कालकरो हरः॥ ६२ ॥<br><br>मयैव प्रेर्यते कृत्स्नं चेतनाचेतनात्मकम्।<br>सोऽन्तर्यामी स पुरुषो ह्यहं वै पुरुषोत्तमः॥ ६३ ॥<br><br>तस्य सा परमा माया प्रकृतिस्त्रिगुणात्मिका।<br>प्रोच्यते मुनिभिः शक्तिर्जगद्योनिः सनातनी॥ ६४॥<br><br>स एष मायया विश्वं व्यामोहयति विश्ववित्।<br>नारायणः परोऽव्यक्तो मायारूप इति श्रुतिः॥ ६५ ॥<br><br>एवमेतज्जगत् सर्वं सर्वदा स्थापयाम्यहम्।<br>योजयामि प्रकृत्याऽहं पुरुषं पञ्चविंशकम्॥ ६६ ॥<br><br>तथा वै संगतो देवः कूटस्थः सर्वगोऽमलः।<br>सृजत्यशेषमेवेदं स्वमूर्तेः प्रकृतेरजः॥ ६७ ॥<br><br>स देवो भगवान् ब्रह्मा विश्वरूपः पितामहः।<br>तवैतत् कथितं सम्यक् स्रष्टृत्वं परमात्मनः॥ ६८॥<br><br>एकोऽहं भगवान् कालो ह्यनादिश्रान्तकृद् विभुः।<br>समास्थाय परं भावं प्रोक्तो रुद्रो मनीषिभिः॥ ६९ ॥<br><br>मम वै सापरो शक्तिर्देवी विद्येति विश्रुता।<br>दृष्टा हि भवता नूनं विद्यादेहस्त्वहं ततः॥ ७० ॥<br><br>एवमेतानि तत्त्वानि प्रधानपुरुषेश्वराः।<br>विष्णुर्ब्रह्मा च भगवान् रुद्रः काल इति श्रुतिः॥ ७१ ॥<br><br>त्रयमेतदनाद्यन्तं ब्रह्मण्येव व्यवस्थितम्।<br>तदात्मकं तदव्यक्तं तदक्षरमिति श्रुतिः॥ ७२ ॥<br><br>आत्मानन्दपरं तत्त्वं चिन्मात्रं परमं पदम्।<br>आकाशं निष्कलं ब्रह्म तस्मादन्यन्न विद्यते॥ ७३॥<br><br>एवं विज्ञाय भवता भक्तियोगाश्रयेण तु।<br>सम्पूज्यो वन्दनीयोऽहं ततस्तं पश्य शाश्वतम्॥ ७४॥ | (मङ्कणकके) इतना कहनेपर त्रिपुरदाहक महेश्वर हरने मङ्कणकसे अपने योग तथा देवीका इस प्रकार वर्णन किया। मैं हजार नेत्रोंवाला, सर्वात्मा, सभी ओर मुखवाला, सभी पापोंको जलानेवाला, काल, कालको भी उत्पन्न करनेवाला हर हूँ। मेरे द्वारा ही समस्त चेतन एवं अचेतन-स्वरूप (जगत्) प्रवृत्त किया जाता है। मैं ही वह अन्तर्यामी और मैं ही वह पुरुष तथा पुरुषोत्तम हूँ, जिसकी त्रिगुणात्मिका प्रकृति-रूप परम माया मुनियोंके द्वारा सनातनी शक्ति और जगतका मूल कारण कही जाती है। मैं वही सर्वज्ञ (पुरुष) हूँ जो मायाद्वारा विश्वको व्यामोहित करता है और जिसे श्रुति नारायण, पर, अव्यक्त तथा मायारूप कहती है। मैं इसी प्रकार सदा इस जगत्की स्थापना करता हूँ। मैं प्रकृतिसे उस पुरुषको संयुक्त करता हूँ (जो पचीस तत्त्वोंमें एक-मात्र चेतन प्रमुख तत्त्व है।)॥ ६१-६६॥<br><br>इस प्रकार यह देव (चेतन), कूटस्थ (निर्विकार), सर्वत्र विद्यमान, निर्मल, नित्यपुरुष अपनी ही मूर्ति 'प्रकृति'से संगत होकर समस्त जगत्की सृष्टि करता है। इसी पुरुषको देव, भगवान्, ब्रह्मा, विश्वरूप एवं पितामहके रूपमें समझना चाहिये। इस प्रकार मैंने आपको भलीभाँति परमात्माके सृष्टिकर्तृत्वको बतलाया। मैं अद्वितीय, अनादि, संहार करनेवाला, विभु तथा भगवान् काल हूँ। परम भावका आश्रय ग्रहण करनेपर मनीषी लोग मुझे रुद्र कहते हैं॥ ६७-६९॥<br><br>मेरी ही अपरा शक्ति विद्यादेवीके नामसे प्रसिद्ध है। मेरे विद्या-रूप देहका और मेरा आपने दर्शन किया है। इस प्रकार ये सभी तत्त्व प्रधान, पुरुष और ईश्वररूप हैं। श्रुतिने इन्हें ही विष्णु, ब्रह्मा और कालरूप भगवान् रुद्र कहा है। ये तीनों ही अनादि तथा अनन्त ब्रह्ममें ही स्थित हैं। अतः श्रुतिका कथन है कि ये तीनों देव तदात्मक, (परमपुरुष ईश्वररूप), वही अव्यक्तरूप, वही अक्षररूप, आत्मानन्दस्वरूप, परमतत्त्व, चिन्मात्र और परम पदरूप हैं, आकाशरूप एवं निष्कल ब्रह्म हैं। वास्तवमें परमतत्त्व ईश्वरके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। ऐसा जानकर आपको भक्तियोगका अवलम्बन लेकर मेरी पूजा तथा वन्दना करनी चाहिये। तदनन्तर आपको उस शाश्वत (पुरुष)-के दर्शन होंगे॥ ७०-७४॥ |