भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४३६* कूर्मपुराण *
सोऽन्वीक्ष्य भगवानीशः सगर्वं गर्वशान्तये ।<br>स्वकं देहं विदार्यास्मै भस्मराशिमदर्शयत् ॥ ४९ ॥<br><br>पश्येमं मच्छरीरोत्थं भस्मराशिं द्विजोत्तम ।<br>माहात्म्यमेतत् तपसस्त्वादृशोऽन्योऽपि विद्यते ॥ ५० ॥<br><br>यत् सगर्वं हि भवता नर्तितं मुनिपुंगव ।<br>न युक्तं तापसस्यैतत् त्वत्तोऽप्यत्राधिको ह्यहम् ॥ ५१ ॥तब भगवान् शंकर उन्हें गर्वयुक्त देखकर उनके गर्वको दूर करनेके लिये अपने शरीरको विदीर्ण कर (उसमेंसे निकलती हुई) भस्मराशि उन्हें दिखलायी (और कहा)—हे द्विजोत्तम! मेरे शरीरसे निकलती हुई इस भस्मराशिको देखो। यह तपस्याका माहात्म्य है। आपके समान दूसरा भी है। मुनिपुंगव ! आप (तपस्याके) गर्वसे गर्वित होकर नृत्य कर रहे हैं, यह एक तपस्वीके लिये उचित नहीं है, मैं आपसे भी अधिक (नृत्यकलामें कुशल—बड़ा तपस्वी) हूँ ॥ ४९—५१ ॥
इत्याभाष्य मुनिश्रेष्ठं स रुद्रः किल विश्वदृक् ।<br>आस्थाय परमं भावं ननर्त जगतो हरः ॥ ५२ ॥<br><br>सहस्रशीर्षा भूत्वा सहस्राक्षः सहस्रपात् ।<br>दंष्ट्राकरालवदनो ज्वालामाली भयंकरः ॥ ५३ ॥<br><br>सोऽन्वपश्यदशेषस्य पार्श्वे तस्य त्रिशूलिनः ।<br>विशाललोचनामेकां देवीं चारुविलासिनीम् ।<br>सूर्यायुतसमप्रख्यां प्रसन्नवदनां शिवाम् ॥ ५४ ॥<br><br>सस्मितं प्रेक्ष्य विश्वेशं तिष्ठन्तीममितद्युतिम् ।<br>दृष्ट्वा संत्रस्तहृदयो वेपमानो मुनीश्वरः ।<br>ननाम शिरसा रुद्रं रुद्राध्यायं जपन् वशी ॥ ५५ ॥मुनिश्रेष्ठ (मङ्कणक)—से ऐसा कहकर वे विश्वद्रष्टा तथा संसारके संहारक रुद्र परम भावमें स्थित होकर नृत्य करने लगे। (वे रुद्र) हजारों सिर, हजारों आँख और हजारों चरणवाले, भयंकर दाढ़ोंसे युक्त मुखवाले, ज्वालामालाओंसे व्याप्त तथा अत्यन्त भीषण रूपवाले हो गये। तदनन्तर उन मङ्कणकने उन अशेष (विराट् शरीरवाले) त्रिशूलधारीके पार्श्व-भागमें विशाल नेत्रोंवाली, सुन्दर विलासयुक्त, हजारों सूर्योंके समान तेजवाली और प्रसन्न मुखवाली देवी शिवाको देखा। मुसकराते हुए विश्वेश्वर (शिव) तथा अमित द्युतिसम्पन्न (शिवा)—को स्थित देखकर मुनीश्वर (मङ्कणक)—का हृदय भयभीत हो गया और वे (अपने गर्वको ध्यानमें रखकर) काँपने लगे तथा संयमित होकर रुद्राध्यायका जप करते हुए उन्होंने रुद्रको सिरसे प्रणाम किया ॥ ५२—५५ ॥
प्रसन्नो भगवानीशस्त्र्यम्बको भक्तवत्सलः ।<br>पूर्ववेषं स जग्राह देवी चान्तर्हिताभवत् ॥ ५६ ॥<br><br>आलिङ्ग्य भक्तं प्रणतं देवदेवः स्वयं शिवः ।<br>न भेतव्यं त्वया वत्स प्राह किं ते ददाम्यहम् ॥ ५७ ॥उन भक्तवत्सल त्र्यम्बक भगवान् शिवने प्रसन्न होकर अपना पूर्वरूप धारण किया और देवी अन्तर्हित हो गयीं। साक्षात् देवाधिदेव शिवने शरणागत भक्तका आलिङ्गनकर कहा—वत्स! तुम डरो मत! मैं तुम्हें क्या प्रदान करूँ? ॥ ५६—५७ ॥
प्रणम्य मूर्ध्ना गिरिशं हरं त्रिपुरसूदनम् ।<br>विज्ञापयामास तदा हृष्टः प्रष्टुमना मुनिः ॥ ५८ ॥<br><br>नमोऽस्तु ते महादेव महेश्वर नमोऽस्तु ते ।<br>किमेतद् भगवद्रूपं सुघोरं विश्वतोमुखम् ॥ ५९ ॥<br><br>का च सा भगवत्पार्श्वे राजमाना व्यवस्थिता ।<br>अन्तर्हितेव सहसा सर्वमिच्छामि वेदितुम् ॥ ६० ॥तब प्रसन्न मुनि (मङ्कणक)—ने त्रिपुरका नाश करनेवाले गिरिश हरको सिरसे प्रणामकर पूछनेकी इच्छासे कहा—महादेव! आपको नमस्कार है। महेश्वर! आपको नमस्कार है। सभी ओर मुखवाला आपका यह भयंकर कौन-सा रूप है? और आपके पार्श्वभागमें स्थित होकर सुशोभित होनेवाली वे देवी कौन हैं? जो सहसा अन्तर्धान हो गयीं। मैं सब कुछ जानना चाहता हूँ ॥ ५८—६० ॥