संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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- अध्याय ३४ * | ४३५ ---|--- समन्ताद् योजनं क्षेत्रं सिद्धर्षिगणवन्दितम्।<br>पुण्यमायतनं विष्णोस्तत्रास्ते पुरुषोत्तमः॥ ३५॥ | यहाँ चारों ओर एक योजनमें फैला क्षेत्र है जो सिद्धों तथा ऋषिगणोंसे वन्दित है। यहींपर विष्णुका पवित्र मन्दिर है, जिसमें पुरुषोत्तम (विष्णु) स्थित हैं॥ ३५॥ अन्यत् कोकामुखं विष्णोस्तीर्थमद्भुतकर्मणः।<br>मृतोऽत्र पातकैर्मुक्तो विष्णुसारूप्यमाप्नुयात्॥ ३६॥ | अद्भुतकर्मा विष्णुका एक दूसरा कोकामुख नामका तीर्थ है, यहाँ मृत मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाता है और विष्णुके सारूप्य (नामक मोक्ष)-को प्राप्त करता है। शालग्राम नामका महातीर्थ विष्णुकी प्रीतिको बढ़ानेवाला है। वहाँ प्राणोंका त्यागकर मनुष्य हृषीकेशका दर्शन प्राप्त करता है। अश्वतीर्थ नामका एक अन्य तीर्थ है जो सिद्धोंका निवास-स्थल तथा अत्यन्त पवित्र है। वहाँ स्वयं नारायण हयग्रीव-रूपसे नित्य स्थित रहते हैं॥ ३६-३८॥ शालग्रामं महातीर्थं विष्णोः प्रीतिविवर्धनम्।<br>प्राणांस्तत्र नरस्त्यक्त्वा हृषीकेशं प्रपश्यति॥ ३७॥ | अश्वतीर्थमिति ख्यातं सिद्धावासं सुपावनम्।<br>आस्ते हयशिरो नित्यं तत्र नारायणः स्वयम्॥ ३८॥ | तीर्थं त्रैलोक्यविख्यातं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।<br>पुष्करं सर्वपापघ्नं मृतानां ब्रह्मलोकदम्॥ ३९॥ | परमेष्ठी ब्रह्माका पुष्कर नामक तीर्थ तीनों लोकोंमें विख्यात है। वह सभी पापोंको नष्ट करनेवाला तथा वहाँ मरनेवालोंको ब्रह्मलोक प्रदान करनेवाला है। जो द्विजोत्तम मनसे भी पुष्करका स्मरण करता है, वह सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है और (इन्द्रलोकमें देवराज) इन्द्रके साथ आनन्द करता है। वहाँ गन्धर्वों, यक्षों, नागों, राक्षसों तथा सिद्धोंके समूहोंके साथ देवता पद्मजन्मा ब्रह्माकी उपासना करते हैं। वहाँ स्नानसे शुद्ध होकर परमेष्ठी ब्रह्मा तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका पूजन करनेसे ब्रह्माजीका साक्षात्कार प्राप्त होता है। वहाँ जाकर अनिन्दित देवराज इन्द्रका दर्शन करनेसे मनुष्य सुन्दर रूपसे सम्पन्न हो जाता है और सभी कामनाओंको प्राप्त करता है॥ ३९-४३॥ मनसा संस्मरेद् यस्तु पुष्करं वै द्विजोत्तमः।<br>पूयते पातकैः सर्वैः शक्रेण सह मोदते॥ ४०॥ | तत्र देवाः सगन्धर्वाः सयक्षोरगराक्षसाः।<br>उपासते सिद्धसङ्घा ब्रह्माणं पद्मसम्भवम्॥ ४१॥ | तत्र स्नात्वा भवेच्छुद्धो ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्।<br>पूजयित्वा द्विजवरान् ब्रह्माणं सम्प्रपश्यति॥ ४२॥ | तत्राभिगम्य देवेशं पुरुहूतमनिन्दितम्।<br>सुरूपो जायते मर्त्यः सर्वान् कामानवाप्नुयात्॥ ४३॥ | सप्तसारस्वतं तीर्थं ब्रह्माद्यैः सेवितं परम्।<br>पूजयित्वा तत्र रुद्रमश्वमेधफलं लभेत्॥ ४४॥ | ब्रह्मा आदिके द्वारा सेवित सप्तसारस्वत नामक एक श्रेष्ठ तीर्थ है। वहाँ रुद्रकी पूजा करनेसे अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। वहाँ मङ्कणक (नामक शिवभक्त मुनि) परमेश्वर रुद्रके शरणागत हुए थे और पञ्चाक्षर-मन्त्र (नमः शिवाय)-का जप करते हुए उन्होंने शिवकी आराधना की थी। (वहाँ) मुनि (मङ्कणक)-ने 'नमः शिवाय' इस श्रेष्ठ पञ्चाक्षर-मन्त्रका जप करते हुए तपस्याद्वारा गोवृषध्वज शिवकी आराधना की थी॥ ४४-४६॥ यत्र मङ्कणको रुद्रं प्रपन्नः परमेश्वरम्।<br>आराधयामास हरं पञ्चाक्षरपरायणः॥ ४५॥ | नमः शिवायेति मुनिः जपन् पञ्चाक्षरं परम्।<br>आराधयामास शिवं तपसा गोवृषध्वजम्॥ ४६॥ | प्रजज्वालाथ तपसा मुनिर्मङ्कणकस्तदा।<br>ननर्त हर्षवेगेन ज्ञात्वा रुद्रं समागतम्॥ ४७॥ | तदनन्तर रुद्रको आया हुआ जानकर मङ्कणक मुनि तपस्याके तेजसे उद्दीप्त हो गये और आनन्दातिरेकसे नृत्य करने लगे। भगवान् रुद्रने उनसे पूछा—'आप क्यों नृत्य कर रहे हैं।' (किंतु वे कुछ बोले नहीं और) देव ईशानको देखनेपर भी (अपनी नृत्यकलाको सर्वोत्तम समझकर) बार-बार नृत्य करते ही रहे॥ ४७-४८॥ तं प्राह भगवान् रुद्रः किमर्थं नर्तितं त्वया।<br>दृष्ट्वापि देवमीशानं नृत्यति स्म पुनः पुनः॥ ४८॥ |