संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४३४ * कूर्मपुराण *
| सोमेश्वरं तीर्थवरं रुद्रस्य परमेष्ठिनः।<br>सर्वव्याधिहरं पुण्यं रुद्रसालोक्यकारणम्॥ २०॥ | परमेष्ठी रुद्रका सोमेश्वर नामक श्रेष्ठ तीर्थ सभी प्रकारकी व्याधियोंका हरण करनेवाला, पवित्र तथा रुद्रलोककी प्राप्ति करानेका साधन है॥ २०॥ |
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| तीर्थानां परमं तीर्थं विजयं नाम शोभनम्।<br>तत्र लिङ्गं महेशस्य विजयं नाम विश्रुतम्॥ २१॥<br><br>षण्मासान् नियताहारो ब्रह्मचारी समाहितः।<br>उषित्वा तत्र विप्रेन्द्रा यास्यन्ति परमं पदम्॥ २२॥<br><br>अन्यच्च तीर्थप्रवरं पूर्वदेशे सुशोभनम्।<br>एकाम्रं देवदेवस्य गाणपत्यफलप्रदम्॥ २३॥<br><br>दत्त्वात्र शिवभक्तानां किञ्चिच्छुभ्रमहीं शुभाम्।<br>सार्वभौमो भवेद् राजा मुमुक्षुर्मोक्षमाप्नुयात्॥ २४॥<br><br>महानदीजलं पुण्यं सर्वपापविनाशनम्।<br>ग्रहणे समुपस्पृश्य मुच्यते सर्वपातकैः॥ २५॥ | विजय नामका एक सुन्दर तीर्थ है जो तीर्थोंमें श्रेष्ठ है। वहाँ महेश्वरका विजय नामक प्रसिद्ध लिङ्ग है। वहाँपर छः महीनेतक संयत आहार करते हुए ब्रह्मचर्य-व्रत धारणकर, एकाग्र-मनसे उपवास कर श्रेष्ठ ब्राह्मण परम पद प्राप्त करते हैं। पूर्व दिशामें अत्यन्त सुन्दर एक दूसरा एकाग्र नामक श्रेष्ठ तीर्थ है जो देवाधिदेव (शंकर)-के गाणपत्यपदरूपी फलको प्रदान करनेवाला है। वहाँ शिवभक्तोंको थोड़ी-सी भी स्थिर तथा सुन्दर भूमि दान करनेसे (दाता) चक्रवर्ती सम्राट् होता है और मोक्षकी इच्छा रखनेवाला मोक्ष प्राप्त करता है। वहाँ महानदीका जल पवित्र और सभी पापोंको नष्ट करनेवाला है, ग्रहणके समय उसका स्पर्श (स्नान आदि) करनेसे सभी पातकोंसे मुक्ति हो जाती है॥ २१—२५॥ |
| अन्या च विरजा नाम नदी त्रैलोक्यविश्रुता।<br>तस्यां स्नात्वा नरो विप्रा ब्रह्मलोके महीयते॥ २६॥<br><br>तीर्थं नारायणस्यान्यन्नाम्ना तु पुरुषोत्तमम्।<br>तत्र नारायणः श्रीमानास्ते परमपूरुषः॥ २७॥<br><br>पूजयित्वा परं विष्णुं स्नात्वा तत्र द्विजोत्तमः।<br>ब्राह्मणान् पूजयित्वा तु विष्णुलोकमवाप्नुयात्॥ २८॥<br><br>तीर्थानां परमं तीर्थं गोकर्णं नाम विश्रुतम्।<br>सर्वपापहरं शम्भोर्निवासः परमेष्ठिनः॥ २९॥<br><br>दृष्ट्वा लिङ्गं तु देवस्य गोकर्णेश्वरमुत्तमम्।<br>ईप्सिताँल्लभते कामान् रुद्रस्य दयितो भवेत्॥ ३०॥<br><br>उत्तरं चापि गोकर्णं लिङ्गं देवस्य शूलिनः।<br>महादेवस्यार्चयित्वा शिवसायुज्यमाप्नुयात्॥ ३१॥ | विप्रो! दूसरी विरजा नामकी एक नदी है जो तीनों लोकोंमें विख्यात है, उसमें स्नान करके मनुष्य ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। नारायणका पुरुषोत्तम नामक एक दूसरा तीर्थ है, वहाँ परम पुरुष श्रीमान् नारायण निवास करते हैं। वहाँ स्नान करके श्रेष्ठ विष्णुकी अर्चना और ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे द्विजोत्तम विष्णुलोक प्राप्त करता है। सभी पापोंको हरनेवाला तीर्थोंमें श्रेष्ठ गोकर्ण नामका एक प्रसिद्ध तीर्थ है। वहाँ परमेष्ठी शम्भुका निवास है। वहाँ देव (शंकर)-के गोकर्णेश्वर नामक उत्तम लिङ्गका दर्शनकर मनुष्य अभीप्सित कामनाओंको प्राप्त करता है और रुद्रका प्रिय होता है। उत्तर गोकर्णमें भी त्रिशूलधारी शंकर महादेवका लिङ्ग है। उसकी अर्चनासे शिव-सायुज्यकी प्राप्ति होती है॥ २६—३१॥ |
| तत्र देवो महादेवः स्थाणुरित्यभिविश्रुतः।<br>तं दृष्ट्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते तत्क्षणान्नरः॥ ३२॥<br><br>अन्यत् कुब्जाम्रमतुलं स्थानं विष्णोर्महात्मनः।<br>सम्पूज्य पुरुषं विष्णुं श्वेतद्वीपे महीयते॥ ३३॥<br><br>यत्र नारायणो देवो रुद्रेण त्रिपुरारिणा।<br>कृत्वा यज्ञस्य मथनं दक्षस्य तु विसर्जितः॥ ३४॥ | देवाधिदेव महादेव वहाँ 'स्थाणु' इस नामसे विख्यात हैं। उनका दर्शनकर मनुष्य तत्क्षण ही सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। महात्मा विष्णुका एक दूसरा कुब्जाम्र नामक अतुलनीय स्थान है, वहाँ विष्णु (-स्वरूप) पुरुषका पूजन करनेसे व्यक्ति (भगवान्के धाम) श्वेतद्वीपमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। यहाँ त्रिपुरारि रुद्रने ही दक्षके यज्ञका विध्वंस करनेके अनन्तर नारायणदेवको प्रतिष्ठित किया है॥ ३२—३४॥ |