संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 443, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 443
- अध्याय ३४ * | ४३३ ---|--- तत्र स्नात्वा विशुद्धात्मा दम्भमात्सर्यवर्जितः।<br>ददाति यत्किञ्चिदपि पुनात्युभयतः कुलम्॥ ६ ॥ | वहाँ स्नान करके विशुद्धात्मा व्यक्ति दम्भ और मात्सर्यसे रहित होकर जो कुछ भी दान करता है, उससे वह दोनों (माता-पिताके) कुलोंको पवित्र करता है॥ ६॥ गयातीर्थं परं गुह्यं पितॄणां चातिवल्लभम्।<br>कृत्वा पिण्डप्रदानं तु न भूयो जायते नरः॥ ७ ॥<br><br>सकृद् गयाभिगमनं कृत्वा पिण्डं ददाति यः।<br>तारिताः पितरस्तेन यास्यन्ति परमां गतिम्॥ ८ ॥<br><br>तत्र लोकहितार्थाय रुद्रेण परमात्मना।<br>शिलातले पदं न्यस्तं तत्र पितॄन् प्रसादयेत्॥ ९ ॥<br><br>गयाऽभिगमनं कर्तुं यः शक्तो नाभिगच्छति।<br>शोचन्ति पितरस्तं वै वृथा तस्य परिश्रमः॥ १०॥ | गया नामक परम गुह्य तीर्थ पितरोंको अत्यन्त प्रिय है। वहाँ पिण्डदान करके मनुष्यका पुनः जन्म नहीं होता। जो एक बार भी गया जाकर पिण्डदान करता है, उसके द्वारा तारे गये पितर (नरक आदि कष्टप्रद लोकोंसे मुक्त होकर) परम गतिको प्राप्त करते हैं। वहाँ (गयामें) संसारके कल्याणकी कामनासे परमात्मा रुद्रने शिलातलपर चरण (-का चिह्न) स्थापित किया है। वहाँपर पितरोंको (पिण्डदान आदिद्वारा) प्रसन्न करना चाहिये। गयाकी यात्रा करनेमें समर्थ होनेपर भी जो वहाँ नहीं जाता, उसके सम्बन्धमें पितर शोक करते हैं, उसका (अन्य सभी) परिश्रम व्यर्थ ही होता है॥ ७-१०॥ गायन्ति पितरो गाथाः कीर्तयन्ति महर्षयः।<br>गयां यास्यति यः कश्चित् सोऽस्मान् संतारयिष्यति॥ ११॥<br><br>यदि स्यात् पातकोपेतः स्वधर्मरतिवर्जितः।<br>गयां यास्यति वंश्यो यः सोऽस्मान् संतारयिष्यति॥ १२॥<br><br>एष्टव्या बहवः पुत्राः शीलवन्तो गुणान्विताः।<br>तेषां तु समवेतानां यद्येकोऽपि गयां व्रजेत्॥ १३॥<br><br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन ब्राह्मणस्तु विशेषतः।<br>प्रदद्याद् विधिवत् पिण्डान् गयां गत्वा समाहितः॥ १४॥<br><br>धन्यास्तु खलु ते मर्त्या गयायां पिण्डदायिनः।<br>कुलान्युभयतः सप्त समुद्धृत्याप्नुयात् परम्॥ १५॥ | पितर इस गाथाका गान करते हैं और महर्षि इसका कीर्तन करते हैं कि जो कोई भी गया जायगा, वही हमें तारेगा अर्थात् असद्गतिसे मुक्त करेगा। मेरे वंशमें उत्पन्न व्यक्ति किसी कारण भले ही पापयुक्त हो, स्वधर्ममें निष्ठा न रखता हो, तब भी यदि गया-तीर्थकी यात्रा करेगा तो वह हम लोगोंका तारक होगा। शीलवान् तथा गुणवान् बहुतसे पुत्रोंकी अभिलाषा करनी चाहिये; क्योंकि उन सभीमेंसे कोई एक तो गया जायगा। इसलिये सभी प्रयत्नोंके द्वारा विशेषरूपसे ब्राह्मणको तो गया जाकर समाहित-मनसे विधिवत् पिण्डदान करना चाहिये। वे मनुष्य धन्य हैं जो गयामें पिण्डदान करते हैं। वे दोनों (माता-पिताके) कुलकी सात पीढ़ियोंका उद्धार कर स्वयं भी परमगति प्राप्त करते हैं॥ ११-१५॥ अन्यच्च तीर्थप्रवरं सिद्धावासमुदाहृतम्।<br>प्रभासमिति विख्यातं यत्रास्ते भगवान् भवः॥ १६॥<br><br>तत्र स्नानं तपः श्राद्धं ब्राह्मणानां च पूजनम्।<br>कृत्वा लोकमवाप्नोति ब्रह्मणोऽक्षय्यमुत्तमम्॥ १७॥<br><br>तीर्थं त्रैयम्बकं नाम सर्वदेवनमस्कृतम्।<br>पूजयित्वा तत्र रुद्रं ज्योतिष्टोमफलं लभेत्॥ १८॥<br><br>सुवर्णाक्षं महादेवं समभ्यर्च्य कपर्दिनम्।<br>ब्राह्मणान् पूजयित्वा तु गाणपत्यं लभेद ध्रुवम्॥ १९॥ | अन्य प्रभास नामक प्रसिद्ध श्रेष्ठ तीर्थ है, जिसे सिद्धोंका निवास-स्थान बतलाया गया है। वहाँ भगवान् भव (शंकर) स्थित हैं। वहाँ स्नान, तप, श्राद्ध तथा ब्राह्मणोंका पूजन करनेसे ब्रह्माके अक्षय्य और उत्तम लोककी प्राप्ति होती है। त्रैयम्बक नामक तीर्थ सभी देवताओंद्वारा नमस्कृत है। वहाँ रुद्रकी आराधना करनेसे ज्योतिष्टोम-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। वहाँ कपर्दी तथा सुवर्णाक्ष महादेवकी भलीभाँति आराधना करने तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे निश्चय ही गाणपत्य-पदकी प्राप्ति होती है॥ १६-१९॥