संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४३२ * कूर्मपुराण *
| यः पठेद् भवतां नित्यं संवादं मम चैव हि।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो गच्छेत परमां गतिम्॥ १५० ॥ | जो मेरे एवं आपके बीच हुए इस संवादको नित्य पढ़ेगा, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर परम गतिको प्राप्त करेगा॥ १५० ॥ |
| श्राद्धे वा दैविके कार्ये ब्राह्मणानां च संनिधौ।<br>पठेत नित्यं सुमनाः श्रोतव्यं च द्विजातिभिः॥ १५१ ॥ | श्राद्धमें अथवा देवकार्य—पूजा आदिमें और ब्राह्मणोंके सम्मुख प्रसन्न-मनसे नित्य इसका पाठ करना चाहिये तथा द्विजातियोंको इसे सुनना चाहिये। जो योगात्मा इसके अर्थका विचारकर पवित्र ब्राह्मणोंको इसे सुनाता है, वह दोषरूपी कञ्चुक (आवरण)-का परित्याग कर भगवान् महेश्वरको प्राप्त करता है॥ १५१-१५२॥ |
| योऽर्थं विचार्य युक्तात्मा श्रावयेद् ब्राह्मणान् शुचीन्।<br>स दोषकाञ्चुकं त्यक्त्वा याति देवं महेश्वरम्॥ १५२ ॥ | |
| एतावदुक्त्वा भगवान् व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>समाश्रास्य मुनीन् सूतं जगाम च यथागतम्॥ १५३ ॥ | इतना कहनेके बाद सत्यवतीके पुत्र भगवान् व्यास मुनियों तथा सूतजीको आश्वासन प्रदानकर जैसे आये थे वैसे ही चले गये^१॥ १५३ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३३ ॥ इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें तैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३३ ॥
चौंतीसवाँ अध्याय
तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें प्रयाग, गया, एकाग्र तथा पुष्कर आदि विविध तीर्थोंकी महिमाका वर्णन, सप्तसारस्वत-तीर्थके वर्णनमें शिवभक्त मङ्कणक मुनिका आख्यान
| ऋषय ऊचुः<br>तीर्थानि यानि लोकेऽस्मिन् विश्रुतानि महान्ति च।<br>तानि त्वं कथयास्माकं रोमहर्षण साम्प्रतम्॥ १ ॥ | ऋषियोंने कहा— रोमहर्षण! अब आप हमें इस संसारमें जो महान् तथा प्रसिद्ध तीर्थ हैं, उन्हें बतलायें॥ १ ॥ |
| रोमहर्षण उवाच<br>शृणुध्वं कथयिष्येऽहं तीर्थानि विविधानि च।<br>कथितानि पुराणेषु मुनिभिर्ब्रह्मवादिभिः॥ २ ॥<br>यत्र स्नानं जपो होमः श्राद्धदानादिकं कृतम्।<br>एकैकशो मुनिश्रेष्ठाः पुनात्यासप्तमं कुलम्॥ ३ ॥<br>पञ्चयोजनविस्तीर्णं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।<br>प्रयागं प्रथितं तीर्थं तस्य माहात्म्यमीरितम्॥ ४ ॥ | रोमहर्षण बोले— हे श्रेष्ठ मुनियो! आप लोग सुनें, मैं पुराणोंमें ब्रह्मवादी मुनियोंद्वारा बताये गये विविध तीर्थोंको बताऊँगा, जिनमें एक बार भी किया गया स्नान, जप, होम, श्राद्ध तथा दान आदि कर्म सात कुलोंको पवित्र कर देता है॥ २-३ ॥<br>परमेष्ठी ब्रह्माका पाँच योजनमें फैला हुआ प्रयाग नामक प्रसिद्ध तीर्थ है, उसका माहात्म्य बतलाया जा चुका है। दूसरा कुरुओंका श्रेष्ठ तीर्थ (कुरुक्षेत्र) है, जो देवताओंद्वारा वन्दित, ऋषियोंके आश्रमोंसे परिपूर्ण और सभी पापोंकी शुद्धि करनेवाला है॥ ४-५ ॥ |
| अन्यच्च तीर्थप्रवरं कुरूणां देववन्दितम्।<br>ऋषीणामाश्रमैर्जुष्टं सर्वपापविशोधनम्॥ ५ ॥ |
१(क)-इस अध्यायमें आये प्रायः सभी पारिभाषिक शब्दोंका अर्थ इस उपरिविभागके पिछले अध्याय १६वें एवं १७वेंमें किया गया है।
(ख)-इस अध्यायमें निर्दिष्ट चान्द्रायण, सांतपन, प्राजापत्य, कृच्छ्र आदि व्रतोंका स्वरूप यहाँ विस्तारके भयसे नहीं लिखा जा रहा है। यह याज्ञवल्क्यस्मृति, प्रायश्चित्ताध्यायके अन्तमें तथा अन्य स्मृतियों एवं निबन्धग्रन्थोंमें द्रष्टव्य है।