संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३३ * | ४३१ ---|---
इयं सा मिथिलेशेन पार्वतीं रुद्रवल्लभाम्।
आराध्य लब्धा तपसा देव्याश्चात्यन्तवल्लभा ॥ १३६ ॥
भर्तुः शुश्रूषणोपेता सुशीलेयं पतिव्रता।
भवानीपार्श्वमानीता मया रावणकामिता ॥ १३७ ॥
या नीता राक्षसेशेन सीता भगवताहृता।
मया मायामयी सृष्टा रावणस्य वधाय सा ॥ १३८ ॥
तदर्थं भवता दुष्टो रावणो राक्षसेश्वरः।
मयोपसंहृता चैव हतो लोकविनाशनः ॥ १३९ ॥
गृहाण विमलामेनां जानकीं वचनान्मम।
पश्य नारायणं देवं स्वात्मानं प्रभवाव्ययम् ॥ १४० ॥
इत्युक्त्वा भगवांश्चण्डो विश्वार्चिर्विश्वतोमुखः।
मानितो राघवेणाग्निर्भूतैश्चान्तरधीयत ॥ १४१ ॥
एतत् पतिव्रतानां वै माहात्म्यं कथितं मया।
स्त्रीणां सर्वाघशमनं प्रायश्चित्तमिदं स्मृतम् ॥ १४२ ॥
अशेषपापयुक्तस्तु पुरुषोऽपि सुसंयतः।
स्वदेहं पुण्यतीर्थेषु त्यक्त्वा मुच्येत किल्बिषात् ॥ १४३ ॥
पृथिव्यां सर्वतीर्थेषु स्नात्वा पुण्येषु वा द्विजः।
मुच्यते पातकैः सर्वैः समस्तैरपि पूरुषः ॥ १४४ ॥
व्यास उवाच
इत्येष मानवो धर्मो युष्माकं कथितो मया।
महेशाराधनार्थाय ज्ञानयोगं च शाश्वतम् ॥ १४५ ॥
योऽनेन विधिना युक्तं ज्ञानयोगं समाचरेत्।
स पश्यति महादेवं नान्यः कल्पशतैरपि ॥ १४६ ॥
स्थापयेद् यः परं धर्मं ज्ञानं तत्पारमेश्वरम्।
न तस्मादधिको लोके स योगी परमो मतः ॥ १४७ ॥
यः संस्थापयितुं शक्तो न कुर्यान्मोहितो जनः।
स योगयुक्तोऽपि मुनिर्नार्त्यर्थं भगवत्प्रियः ॥ १४८ ॥
तस्मात् सदैव दातव्यं ब्राह्मणेषु विशेषतः।
धर्मयुक्तेषु शान्तेषु श्रद्धया चान्वितेषु वै ॥ १४९ ॥
मिथिलानेश जनकने तपद्वारा रुद्रप्रिया पार्वतीकी आराधनाकर देवीकी अत्यन्त प्रिय जिन सीताको पुत्रीरूपमें प्राप्त किया था, उन पतिसेवापरायणा, सुन्दर शीलवाली पतिव्रताको रावण चाह रहा है, जब मैंने यह जाना तब उन्हें (भगवती सीताको) मैं पार्वतीके पास ले आया और राक्षसराज रावणद्वारा ले जायी गयी जिन सीताको आपने प्राप्त किया उन्हें मैंने रावणके वधके लिये मायासे निर्मित किया था, उन्हींके लिये आपने लोकोंका विनाश करनेवाले दुष्ट राक्षसराज रावणको मारा तथा मैंने उन्हीं मायामयी सीताको उपसंहृत (अपनेमें लीन)-कर लिया है। मेरे कहनेसे आप इन विशुद्ध जानकीको ग्रहण करें और अपने-आपको प्रभव, अव्यय, नारायणदेवके रूपमें देखें ॥ १३६–१४० ॥
ऐसा कहकर सभी ओर शिखा (ज्वाला) तथा सभी ओर मुखवाले भगवान् प्रचण्ड (अमित तेजोरूप) अग्निदेव राघव (राम) तथा अन्य लोगोंद्वारा सम्मानित होकर अन्तर्धान हो गये। यह मैंने आप लोगोंको पतिव्रताओंका माहात्म्य बताया। इसे स्त्रियोंके समस्त पापोंको नष्ट करनेवाला प्रायश्चित्त कहा गया है। सम्पूर्ण पापोंसे युक्त पुरुष भी भलीभाँति संयत होकर पुण्य-तीर्थोंमें अपना शरीर त्याग करके पापसे मुक्त हो जाता है। अथवा पृथ्वीके सभी पुण्य तीर्थोंमें स्नान करनेसे द्विज पुरुष समस्त सञ्चित पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १४१–१४४॥
व्यासजीने कहा— इस प्रकार आप लोगोंसे मैंने इस मानवधर्मका और महेश्वरकी आराधनाके लिये सनातन ज्ञानयोगका वर्णन किया। जो इस विधिसे युक्त होकर ज्ञानयोगका पालन करता है, वह महादेवका दर्शन करता है। दूसरा व्यक्ति सैकड़ों कल्पोंमें भी उनका दर्शन नहीं कर सकता। जो इस परम धर्म और परमेश्वर-सम्बन्धी ज्ञानकी स्थापना (अधिकारी लोगोंमें प्रतिष्ठा) करता है, संसारमें उससे बढ़कर और कोई नहीं है, उसे श्रेष्ठ योगी माना गया है। इसकी स्थापना करनेमें समर्थ होनेपर भी जो व्यक्ति मोहवश धर्म एवं ज्ञानकी स्थापना नहीं करता, वह योगसम्पन्न मुनि होनेपर भी भगवान्का अत्यन्त प्रिय नहीं होता। इसलिये सदा ही विशेष-रूपसे धर्मयुक्त शान्त और श्रद्धासम्पन्न ब्राह्मणोंको इसका उपदेश करना चाहिये ॥ १४५–१४९ ॥