भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४३०* कूर्मपुराण *
वैश्वानरं प्रपद्येऽहं सर्वभूतेष्ववस्थितम्।<br>हव्यकव्यवहं देवं प्रपद्ये वह्निमीश्वरम्॥ १२३॥सभी प्राणियोंमें अवस्थित वैश्वानरकी मैं शरण ग्रहण करती हूँ। मैं हव्य तथा कव्यको वहन करनेवाले ईश्वर वह्निदेवकी शरणमें हूँ। मैं उस पर-तत्त्व, वरणीय, साक्षात् सविता और तेजोरूप परम ज्योति अग्निकी शरण ग्रहण करती हूँ। हव्यवाहन! आप मेरी रक्षा करें॥ १२३-१२४॥
प्रपद्ये तत्परं तत्त्वं वरेण्यं सवितुः स्वयम्।<br>भर्गमग्निपरं ज्योती रक्ष मां हव्यवाहन॥ १२४॥
इति वह्न्यष्टकं जप्त्वा रामपत्नी यशस्विनी।<br>ध्यायन्ती मनसा तस्थौ राममुन्मीलितेक्षणा॥ १२५॥इस वह्न्यष्टकका जप करके यशस्विनी उन्मीलित नेत्रोंवाली रामकी पत्नी सीता मनसे रामका ध्यान करती हुई स्थित हो गयीं॥ १२५॥
अथावसथ्याद् भगवान् हव्यवाहो महेश्वरः।<br>आविरासीत् सुदीप्तात्मा तेजसा प्रवहन्निव॥ १२६॥स्तुति करनेके अनन्तर उस आवसथ्य अग्निसे अत्यन्त उदीप्त स्वरूपवाले (दुष्ट भाववाले रावणपर क्रुद्ध होनेके कारण) तेजसे जलते हुएके समान भगवान् महेश्वर हव्यवाह प्रकट हो गये। रावणके वधकी इच्छासे मायामयी सीताको उत्पन्नकर वे पावक (अग्निदेव) धर्ममयी सीताको लेकर अन्तर्हित हो गये। धर्ममयी सीता-जैसी ही उस मायामयी सीताको देखकर राक्षसराज रावण उसे ही लेकर सागरके मध्यमें स्थित लंकाको चला गया। रावणका वध करके (भगवती) सीताको प्राप्तकर लक्ष्मणसहित रामका मन शंकायुक्त हो गया। जनसामान्यको विश्वास दिलानेके लिये वह मायासे निर्मित सीता उदीप्त अग्निमें प्रविष्ट हो गयीं और अग्निने उन्हें अपनेमें मिला लिया॥ १२६-१३०॥
सृष्ट्वा मायामयीं सीतां स रावणवधेप्सया।<br>सीतामादाय धर्मिष्ठां पावकोऽन्तरधीयत॥ १२७॥
तां दृष्ट्वा तादृशीं सीतां रावणो राक्षसेश्वरः।<br>समादाय ययौ लङ्कां सागरान्तरसंस्थिताम्॥ १२८॥
कृत्वाथ रावणवधं रामो लक्ष्मणसंयुतः।<br>समादायाभवत् सीतां शङ्काकुलितमानसः॥ १२९॥
सा प्रत्ययाय भूतानां सीता मायामयी पुनः।<br>विवेश पावकं दीप्तं ददाह ज्वलनोऽपि ताम्॥ १३०॥
दग्ध्वा मायामयीं सीतां भगवानुग्रदीधितिः।<br>रामायादर्शयत् सीतां पावकोऽभूत् सुरप्रियः॥ १३१॥मायामयी सीताको अपनेमें लीन कर लेनेके पश्चात् उग्र किरणोंवाले भगवान् पावक (अग्नि)-ने रामको (वास्तविक) सीताका दर्शन कराया। इससे 'पावक' देवताओंके प्रिय बन गये। सुन्दर मध्य-भागवाली उन जनककी पुत्रीने अपने दोनों हाथोंसे अपने स्वामी रामके दोनों चरणोंको पकड़कर भूमिपर प्रणाम किया॥ १३१-१३२॥
प्रगृह्य भर्तुश्चरणौ कराभ्यां सा सुमध्यमा।<br>चकार प्रणतिं भूमौ रामाय जनकात्मजा॥ १३२॥
दृष्ट्वा हृष्टमना रामो विस्मयाकुललोचनः।<br>ननाम वह्निं शिरसा तोषयामास राघवः॥ १३३॥(सीताको) देखकर आश्चर्यचकित नेत्रोंवाले रघुवंशी रामने प्रसन्नमन हो सिरसे प्रणामकर अग्निको संतुष्ट किया। भगवान् (राम)-ने वह्निसे कहा—मेरे समीपमें आयी यह दिव्यगुणोंवाली सीता किस प्रकार पहले आपद्वारा अपनेमें लीन की जाती हुई देखी गयी। लोकोंको अपनेमें पचा लेनेवाले तथा हव्यको वहन करनेवाले अग्निने उन दशरथपुत्र रामसे सभी लोगोंकी संनिधिमें ही वह सब बताया जो पूर्वमें घटित हुआ था॥ १३३-१३५॥
उवाच वह्निंभगवान् किमेषा वरवर्णिनी।<br>दग्धा भगवता पूर्वं दृष्टा मत्पार्श्वमागता॥ १३४॥
तमाह देवो लोकानां दाहको हव्यवाहनः।<br>यथावृत्तं दाशरथिं भूतानामेव संनिधौ॥ १३५॥
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