संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ३३ * | ४२९ |
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| पतिव्रता तु या नारी भर्तृशुश्रूषणोत्सुका।<br>न तस्या विद्यते पापमिह लोके परत्र च॥ ११०॥ | जो नारी पतिव्रता है और पतिकी सेवा-शुश्रूषामें अनुरक्त है, उसके लिये न तो इस लोकमें कोई पाप है और न परलोकमें॥ ११०॥ |
| पतिव्रता धर्मरता रुद्राण्येव न संशयः।<br>नास्याः पराभवं कर्तुं शक्नोतीह जनः क्वचित् ॥ १११ ॥ | (पातिव्रत) धर्मपरायण पतिव्रता (स्त्री) रुद्राणी ही होती है, इसमें संदेह नहीं। इस संसारमें कोई भी मनुष्य इसे कभी भी पराजित करनेमें समर्थ नहीं है। उदाहरणके |
| यथा रामस्य सुभगा सीता त्रैलोक्यविश्रुता।<br>पत्नी दाशरथेर्देवी विजिग्ये राक्षसेश्वरम् ॥ ११२ ॥ | लिये दशरथके पुत्र रामकी तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध सुन्दर पत्नी देवी सीताने राक्षसेश्वर (रावण)-को पराजित कर दिया था। कालसे प्रेरित राक्षसराज रावणने रामकी सुन्दर |
| रामस्य भार्यां विमलां रावणो राक्षसेश्वरः।<br>सीतां विशालनयनां चकमे कालचोदितः ॥ ११३ ॥ | तथा विशाल नेत्रोंवाली भार्या सीताको प्राप्त करनेकी इच्छा की। उसने मायासे तपस्वीका वेष धारणकर जनशून्य वनमें विचरण (निवास) करती हुई कामिनी |
| गृहीत्वा मायया वेषं चरन्तीं विजने वने।<br>समाहर्तुं मतिं चक्रे तापसः किल कामिनीम् ॥ ११४॥ | (सीता)-का अपहरण करनेका विचार किया। तब पतिव्रता भगवती सीताने रावणके दुष्ट भावको समझकर अपने पति दशरथ-पुत्र रामका स्मरण किया और पवित्र |
| विज्ञाय सा च तद्भावं स्मृत्वा दाशरथिं पतिम् ।<br>जगाम शरणं वह्निमावसथ्यं शुचिस्मिता ॥ ११५ ॥ | मुसकानवाली उन सीतादेवीने आवसथ्य अग्निकी शरण ग्रहण की॥ १११-११५॥ |
| उपतस्थे महायोगं सर्वदोषविनाशनम्।<br>कृताञ्जली रामपत्नी साक्षात् पतिमिवाच्युतम् ॥ ११६॥ | रामकी पत्नी (सीतादेवी) हाथ जोड़कर साक्षात् पतिके समान सभी दोषोंको नष्ट करनेवाले महायोगरूप अच्युत (अग्नि)-की शरणमें गयीं (और उनकी स्तुति |
| नमस्यामि महायोगं कृतान्तं गहनं परम् ।<br>दाहकं सर्वभूतानामीशानं कालरूपिणम् ॥ ११७ ॥ | करने लगीं—) महायोगस्वरूप, परम गहन (रहस्यस्वरूप), कृतान्त, दहन करनेवाले, सभी प्राणियोंके नियामक कालरूपी अग्निको मैं नमस्कार करती हूँ। मैं सभी |
| नमस्ये पावकं देवं साक्षिणं विश्वतोमुखम्।<br>आत्मानं दीप्तवपुषं सर्वभूतहृदि स्थितम् ॥ ११८ ॥ | ओर मुखवाले, सभी प्राणियोंके हृदयमें स्थित, दीप्त शरीरवाले, आत्मरूप तथा साक्षीदेव पावक (अग्नि)-को नमस्कार करती हूँ। मैं ब्राह्मणोंके उपकारक, ब्रह्मरूपी, |
| प्रपद्ये शरणं वह्निं ब्रह्मण्यं ब्रह्मरूपिणम्।<br>भूतेशं कृत्तिवसनं शरण्यं परमं पदम् ॥ ११९॥ | कृत्तिवासा,* शरणागतवत्सल, परमपदरूप भूतेश वह्निकी शरण ग्रहण करती हूँ। मैं जगन्मूर्ति, सभी तेजोंके |
| ॐ प्रपद्ये जगन्मूर्ति प्रभवं सर्वतेजसाम्।<br>महायोगेश्वरं वह्निमादित्यं परमेष्ठिनम् ॥ १२० ॥ | उद्भव-स्थान, महायोगेश्वर, परमेष्ठी, आदित्य और ओंकाररूप वह्निदेवकी शरण ग्रहण करती हूँ ॥ ११६-१२० ॥ |
| प्रपद्ये शरणं रुद्रं महाग्रासं त्रिशूलिनम्।<br>कालाग्निं योगिनामीशं भोगमोक्षफलप्रदम् ॥ १२१ ॥ | मैं महाग्रास, त्रिशूली, भोग एवं मोक्षरूप फलोंके प्रदाता, योगियोंके ईश और रुद्रस्वरूप कालाग्निकी शरण ग्रहण करती हूँ। मैं भूर्भुवः तथा स्वःस्वरूप, हिरण्मयगृहमें |
| प्रपद्ये त्वां विरूपाक्षं भूर्भुवःस्वःस्वरूपिणम्।<br>हिरण्मये गृहे गुप्तं महान्तममितौजसम् ॥ १२२ ॥ | सुगुप्त, विरूपाक्ष तथा अमित तेजस्वी आप महान्की शरण ग्रहण करती हूँ ॥ १२१-१२२॥ |
* 'कृत्ति' मृग आदिके चर्मको कहते हैं। अग्नि रुद्रके अंश हैं और रुद्र कृत्तिवासा हैं, इसलिये अग्निको भी कृत्तिवासा कहते हैं।