भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४२८* कूर्मपुराण *
अमावस्यां तिथिं प्राप्य यः समाराधयेच्छिवम्।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा तु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ९६ ॥<br><br>कृष्णाष्टम्यां महादेवं तथा कृष्णचतुर्दशीम्।<br>सम्पूज्य ब्राह्मणमुखे सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ९७ ॥<br><br>त्रयोदश्यां तथा रात्रौ सोपहारं त्रिलोचनम्।<br>दृष्ट्वेशं प्रथमे यामे मुच्यते सर्वपातकैः॥ ९८ ॥<br><br>उपोषितश्चतुर्दश्यां कृष्णपक्षे समाहितः।<br>यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चान्तकाय च॥ ९९ ॥<br><br>वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च।<br>प्रत्येकं तिलसंयुक्तान् दद्यात् सप्तोदकाञ्जलीन्।<br>स्नात्वा नद्यां तु पूर्वाह्णे मुच्यते सर्वपातकैः॥ १००॥<br><br>ब्रह्मचर्यमधःशय्यामुपवासं द्विजार्चनम्।<br>व्रतेष्वेतेषु कुर्वीत शान्तः संयतमानसः॥ १०१॥<br><br>अमावस्यायां ब्रह्माणं समुद्दिश्य पितामहम्।<br>ब्राह्मणांस्त्रीन् समभ्यर्च्य मुच्यते सर्वपातकैः॥ १०२॥<br><br>षष्ठ्यामुपोषितो देवं शुक्लपक्षे समाहितः।<br>सप्तम्यामर्चयेद् भानुं मुच्यते सर्वपातकैः॥ १०३॥<br><br>भरण्यां च चतुर्थ्यां च शनैश्चरदिने यमम्।<br>पूजयेत् सप्तजन्मोत्थैर्मुच्यते पातकैर्नरः॥ १०४॥<br><br>एकादश्यां निराहारः समभ्यर्च्य जनार्दनम्।<br>द्वादश्यां शुक्लपक्षस्य महापापैः प्रमुच्यते॥ १०५॥<br><br>तपो जपस्तीर्थसेवा देवब्राह्मणपूजनम्।<br>ग्रहणादिषु कालेषु महापातकशोधनम्॥ १०६॥<br><br>यः सर्वपापयुक्तोऽपि पुण्यतीर्थेषु मानवः।<br>नियमेन त्यजेत् प्राणान् स मुच्येत् सर्वपातकैः॥ १०७॥<br><br>ब्रह्मघ्नं वा कृतघ्नं वा महापातकदूषितम्।<br>भर्तारमुद्धरेन्नारी प्रविष्टा सह पावकम्॥ १०८॥<br><br>एतदेव परं स्त्रीणां प्रायश्चित्तं विदुर्बुधाः।<br>सर्वपापसमुद्भूतौ नात्र कार्या विचारणा॥ १०९॥अमावास्या तिथि आनेपर जो शिवकी भलीभाँति आराधना करता है और ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। कृष्णपक्षकी अष्टमी तथा कृष्णपक्षकी ही चतुर्दशीको महादेव शंकरका पूजन कर ब्राह्मणको भोजन करानेसे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है। त्रयोदशीकी रात्रिके प्रथम याममें उपहारसहित त्रिलोचन ईश शंकरका दर्शन करनेसे मनुष्य सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है। कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको पूर्वाह्नमें समाहित होकर नदीमें स्नानकर उपवास करके यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल तथा सर्वभूतविनाशक—इनमें प्रत्येकके निमित्त तिलमिश्रित सात जलाञ्जलि प्रदान करनेवाला सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है॥ ९६–१००॥<br><br>(प्रायश्चित्तके प्रसंगसे उपदिष्ट) इन सभी व्रतोंमें शान्त और संयतमन होकर ब्रह्मचर्य, भूमिशयन, उपवास तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। अमावास्याको पितामह ब्रह्माको उद्दिष्ट करके तीन ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे सभी पातकोंसे मुक्ति हो जाती है। शुक्लपक्षकी षष्ठीको समाहित होकर उपवास करके सप्तमीको सूर्यदेवकी पूजा करनी चाहिये, इससे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है। शनिवारको भरणी नक्षत्र और चतुर्थी तिथि होनेपर (ऐसे योगमें) जो मनुष्य यमराजका पूजन करता है, वह सात जन्मोंमें किये गये पापोंसे मुक्त हो जाता है। शुक्लपक्षकी एकादशीको निराहार रहकर द्वादशीको जनार्दनकी पूजा करनेसे महापापोंसे मुक्ति मिल जाती है॥ १०१–१०५॥<br><br>सूर्य तथा चन्द्रग्रहण आदि समयोंमें जप, तप, तीर्थ-सेवा और देवता तथा ब्राह्मणोंका पूजन महापातकोंसे शुद्ध करनेवाला होता है। सभी पापोंसे युक्त होनेपर भी जो मनुष्य नियमपूर्वक पुण्य तीर्थोंमें प्राणोंका त्याग करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ १०६-१०७॥<br><br>मृत पतिके साथ अग्निमें प्रवेश करनेवाली नारी ब्रह्मघाती, कृतघ्न अथवा महापातकोंसे दूषित भी पतिका उद्धार कर देती है। विद्वानोंने स्त्रीके लिये सभी प्रकारके पापोंका यही (पातिव्रतधर्म-पालन ही) श्रेष्ठ प्रायश्चित्त बतलाया है। इसमें विचार नहीं करना चाहिये॥ १०८-१०९॥