संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय ३३ * | ४२७ |
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ताडयित्वा तृणेनापि कण्ठं बद्ध्वापि वाससा।
विवादे वापि निर्जित्य प्रणिपत्य प्रसादयेत्॥ ८४॥
अवगूर्य चरेत् कृच्छ्रमति कृच्छ्रं निपातने।
कृच्छात्तिकृच्छ्रौ कुर्वीत विप्रस्योत्पाद्य शोणितम्॥ ८५॥
गुरोराक्रोशमनृतं कृत्वा कुर्याद् विशोधनम्।
एकरात्रं त्रिरात्रं वा तत्पापस्यापनुत्तये॥ ८६॥
देवर्षीणामभिमुखं ष्ठीवनाक्रोशने कृते।
उल्मुकेन दहेज्जिह्वां दातव्यं च हिरण्यकम्॥ ८७॥
देवोद्याने तु यः कुर्यान्मूत्रोच्चारं सकृद् द्विजः।
छिन्द्याच्छिश्नं तु शुद्ध्यर्थं चरेच्चान्द्रायणं तु वा॥ ८८॥
देवतायतने मूत्रं कृत्वा मोहाद् द्विजोत्तमः।
शिश्नस्योत्कर्तनं कृत्वा चान्द्रायणमथाचरेत्॥ ८९॥
देवतानामृषीणां च देवानां चैव कुत्सनम्।
कृत्वा सम्यक् प्रकुर्वीत प्राजापत्यं द्विजोत्तमः॥ ९०॥
तैस्तु सम्भाषणं कृत्वा स्नात्वा देवान् समर्चयेत्।
दृष्ट्वा वीक्षेत भास्वन्तं स्मृत्वा विश्वेश्वरं स्मरेत्॥ ९१॥
यः सर्वभूताधिपतिं विश्वेशानं विनिन्दति।
न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि॥ ९२॥
चान्द्रायणं चरेत् पूर्वं कृच्छ्रं चैवातिकृच्छ्रकम्।
प्रपन्नः शरणं देवं तस्मात् पापाद् विमुच्यते॥ ९३॥
सर्वस्वदानं विधिवत् सर्वपापविशोधनम्।
चान्द्रायणं च विधिना कृच्छ्रं चैवातिकृच्छ्रकम्॥ ९४॥
पुण्यक्षेत्राभिगमनं सर्वपापविनाशनम्।
देवताभ्यर्चनं नृणामशेषाघविनाशनम्॥ ९५॥
तृणद्वारा भी (उनकी) ताड़ना करनेपर, वस्त्रद्वारा कण्ठ बाँधनेपर, विवादमें पराजित करनेपर प्रणामके द्वारा उन्हें प्रसन्न करना चाहिये। ब्राह्मणको धमकानेपर कृच्छ्रव्रत और पटक देनेपर अतिकृच्छ्रव्रत करना चाहिये। विप्रका रक्त बहानेपर कृच्छ्र तथा अतिकृच्छ्र दोनों व्रत करना चाहिये॥ ८४-८५॥
गुरुको गाली या शाप देनेपर या उनसे झूठ बोलनेपर उस पापकी शुद्धिके लिये (पापके तारतम्यके अनुसार) एक रात या तीन रातका उपवास रखना चाहिये। देवताओं और ऋषियोंकी ओर थूकने तथा (उनके प्रति) आक्रोश (आक्षेप) प्रकट करनेपर उल्मुक (अंगारवाली लकड़ी)-से जीभका दाह करना चाहिये और स्वर्णका दान करना चाहिये। जो द्विज देवताओंके उद्यानमें एक बार भी मल-मूत्र विसर्जित करता है तो शुद्धिके लिये मूत्रेन्द्रियका छेदन कर देना चाहिये अथवा चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। जो द्विजोत्तम देवमन्दिरमें मोहवश मूत्रोत्सर्ग करता है, उसे मूत्रेन्द्रियका उच्छेद करके चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। देवताओं, ऋषियों तथा देवों (देवतुल्य महापुरुषों-माता, पिता, गुरु आदि)-की निन्दा करनेपर द्विजोत्तमको भलीभाँति प्राजापत्य-व्रत करना चाहिये। इनके साथ सम्भाषण करनेपर स्नान करके देवताओंकी पूजा करनी चाहिये और उन्हें देखनेपर सूर्यका दर्शन करना चाहिये तथा विश्वेश्वरका स्मरण करना चाहिये॥ ८६-९१॥
जो सभी प्राणियोंके अधिपति विश्वेशानकी निन्दा करता है, उसके पापकी शुद्धि सौ वर्षोंमें भी सम्भव नहीं है, पर (पश्चात्तापपूर्वक) पहले चान्द्रायणव्रत करे, अनन्तर कृच्छ्र तथा अतिकृच्छ्रव्रतोंको श्रद्धापूर्वक करके देव (शंकर)-की शरणमें जाय। ऐसा करनेपर देव शंकरकी कृपासे ही पापसे मुक्ति हो जाती है। विधिपूर्वक अपना सर्वस्व दान करनेसे सभी पापोंकी शुद्धि हो जाती है। इसी प्रकार विधिपूर्वक चान्द्रायणव्रत करने, कृच्छ्र और अतिकृच्छ्रव्रतोंको करनेसे सभी पाप दूर हो जाते हैं। पुण्य क्षेत्रोंकी यात्रा सभी पापोंको दूर कर देती है। मनुष्योंके लिये देवताओंकी आराधना करना सम्पूर्ण पापोंके नाशका अचूक साधन है॥ ९२-९५॥