भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४२६ * कूर्मपुराण *


अनिर्वर्त्य महायज्ञान् यो भुंक्ते तु द्विजोत्तमः।<br>अनातुरः सति धने कृच्छ्रार्धेन स शुध्यति॥ ७४॥स्वस्थ रहते और धन होनेपर भी जो द्विजोत्तम प्रतिदिन विहित पाँच महायज्ञोंको बिना सम्पन्न किये भोजन करता है, वह अर्धकृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्ध होता है। जो अग्निहोत्री ब्राह्मण पर्वोंमें उपस्थान नहीं करता और जो ऋतुकालमें भार्याके साथ सहवास नहीं करता वह भी अर्धकृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्ध होता है॥ ७४-७५॥
आहिताग्निरुपस्थानं न कुर्याद् यस्तु पर्वणि।<br>ऋतौ न गच्छेद् भार्यां वा सोऽपि कृच्छ्रार्धमाचरेत्॥ ७५॥
विनाऽद्भिरप्सु वाप्यार्तः शारीरं संनिवेश्य च।<br>सचैलो जलमाप्लुत्य गामालभ्य विशुध्यति॥ ७६॥कोई आर्त (मल-मूत्रके वेगसे आर्त-त्रस्त) व्यक्ति यदि जलके अभावमें मल-मूत्रका त्याग अकस्मात् कर देता है या जलके मध्यमें रहता हुआ मल-मूत्रके वेगसे आर्त होनेके कारण जलके मध्य ही अकस्मात् मल-मूत्रका त्याग कर देता है तो मल-मूत्रका प्रक्षालनकर ग्राम या नगर आदिके बाहर नदी आदिमें शरीरपर धारित समस्त वस्त्रोंके साथ उसे स्नान करना चाहिये तथा गौका स्पर्श करना चाहिये, तभी शुद्धि होती है।
बुद्धिपूर्वं त्वभ्युदितो जपेदन्तर्जले द्विजः।<br>गायत्र्यष्टसहस्रं तु त्र्यहं चोपवसेद् व्रती॥ ७७॥जान-बूझकर (सूर्योदयकालतक शयन करनेवाले अथवा आलस्यवश सोये रहनेके कारण सूर्योदयकालीन अनुष्ठानको न करनेवाले) ब्राह्मणको सूर्योदयके समय जलमें प्रविष्ट होकर आठ हजार गायत्रीका जप तथा तीन दिनतक उपवास करना चाहिये॥ ७६-७७॥
अनुगम्येच्छया शूद्रं प्रेतीभूतं द्विजोत्तमः।<br>गायत्र्यष्टसहस्रं च जप्यं कुर्यान्नदीषु च॥ ७८॥इच्छापूर्वक मृत शूद्रके शवका अनुगमन करनेपर द्विजोत्तमको नदीके किनारे आठ हजार गायत्रीका जप करना चाहिये। ब्राह्मणके वध करनेकी झूठी शपथ करनेपर ब्राह्मणको यावकान्न (यवके सत्तू या उससे बने हुए किसी अन्य पदार्थ)-से चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। एक ही पंक्तिमें बैठे हुए ब्राह्मणोंको विषम दान करनेपर कृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्धि होती है। चाण्डालकी छायाका स्पर्श होनेपर स्नान करके घृतका प्राशन करना चाहिये॥ ७८-८०॥
कृत्वा तु शपथं विप्रो विप्रस्य वधसंयुक्तम्।<br>मृषैव यावकान्नेन कुर्याच्चान्द्रायणं व्रतम्॥ ७९॥
पंक्त्यां विषमदानं तु कृत्वा कृच्छ्रेण शुध्यति।<br>छायां श्वपाकस्यारुह्य स्नात्वा सम्प्राशयेद् घृतम्॥ ८०॥
ईक्षेदादित्यमशुचिर्दृष्ट्वाग्निं चन्द्रमेव वा।<br>मानुषं चास्थि संस्पृश्य स्नानं कृत्वा विशुध्यति॥ ८१॥अशुद्धिकी स्थितिमें अग्नि अथवा चन्द्रमाका दर्शनकर सूर्यका दर्शन करना चाहिये। मनुष्यकी हड्डीका स्पर्श होनेपर स्नान करनेसे शुद्धि होती है। मिथ्या (असत् विषयका अथवा दम्भपूर्ण) अध्ययन करनेपर एक वर्षतक भिक्षाव्रत ग्रहण करना चाहिये। कृतघ्नको (ब्रह्मचर्य) व्रतका पालन करते हुए पाँच वर्षतक ब्राह्मणके घरमें निवास करना चाहिये। ब्राह्मणको 'हुंकार' तथा गुरुजनोंको 'त्वंकार' (तुम) कहनेपर स्नान करके दिनभर भोजन नहीं करना चाहिये और उन्हें प्रणामके द्वारा प्रसन्न करना चाहिये॥ ८१-८३॥
कृत्वा तु मिथ्याध्ययनं चरेद् भैक्षं तु वत्सरम्।<br>कृतघ्नो ब्राह्मणगृहे पञ्च संवत्सरं व्रती॥ ८२॥
हुंकारं ब्राह्मणस्योक्त्वा त्वंकारं च गरीयसः।<br>स्नात्वानश्नन्नहःशेषं प्रणिपत्य प्रसादयेत्॥ ८३॥