भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय ३३ * । ४२५
श्लोकअर्थ
उद्बन्धनादिनिहतं संस्पृश्य ब्राह्मणः क्वचित्।<br>चान्द्रायणेन शुद्धिः स्यात् प्राजापत्येन वा पुनः॥ ६२॥<br><br>उच्छिष्टो यद्यनाचान्तश्चाण्डालादीन् स्पृशेद् द्विजः।<br>प्रमादाद् वै जपेत् स्नात्वा गायत्र्यष्टसहस्रकम्॥ ६३॥<br><br>द्रुपदानां शतं वापि ब्रह्मचारी समाहितः।<br>त्रिरात्रोपोषितः सम्यक् पञ्चगव्येन शुध्यति॥ ६४॥<br><br>चण्डालपतितादींस्तु कामाद् यः संस्पृशेद् द्विजः।<br>उच्छिष्टस्तत्र कुर्वीत प्राजापत्यं विशुद्धये॥ ६५॥उद्वन्धन (फाँसी) आदिद्वारा मरे व्यक्तिका कदाचित् स्पर्श होनेपर ब्राह्मण चान्द्रायण अथवा प्राजापत्यव्रत करनेसे शुद्ध होता है। प्रमादवश यदि जूठे मुँह बिना आचमन किये द्विज चाण्डाल आदिका स्पर्श करता है तो उसे स्नानकर आठ हजार गायत्रीका जप करना चाहिये। ब्रह्मचारीको तो समाहित होकर तीन रात उपवास करके भलीभाँति सौ बार द्रुपदा मन्त्रका जप करना चाहिये और फिर पञ्चगव्यप्राशन करनेपर उसकी शुद्धि होती है। जो उच्छिष्टमुख द्विज इच्छापूर्वक चाण्डाल तथा पतित आदिका स्पर्श करता है, उसे शुद्धिके लिये प्राजापत्यव्रत करना चाहिये॥ ६२—६५॥
चाण्डालसूतकशावांस्तथा नारीं रजस्वलाम्।<br>स्पृष्ट्वा स्नायाद् विशुद्ध्यर्थं तत्स्पृष्टं पतितं तथा॥ ६६॥<br><br>चाण्डालसूतकशावैः संस्पृष्टं संस्पृशेद् यदि।<br>प्रमादात् तत आचम्य जपं कुर्यात् समाहितः॥ ६७॥<br><br>तत्स्पृष्टस्पर्शिनं स्पृष्ट्वा बुद्धिपूर्वं द्विजोत्तमः।<br>आचमेत् तद्विशुद्ध्यर्थं प्राह देवः पितामहः॥ ६८॥चाण्डाल, अशौचयुक्त व्यक्ति, शव, रजस्वला स्त्री, उनसे स्पृष्ट व्यक्ति तथा पतितका स्पर्श करनेपर शुद्धिके लिये स्नान करना चाहिये। प्रमादवश चाण्डाल, अशौचयुक्त व्यक्ति तथा शव—इनको स्पर्श किये व्यक्तिका स्पर्श होनेपर (स्नानोपरान्त) आचमन करके एकाग्र होकर (गायत्री-) जप करना चाहिये। द्विजोत्तम यदि जान-बूझकर चाण्डाल आदिद्वारा स्पर्श किये व्यक्तिका स्पर्श करे तो उसे उस पापकी शुद्धिके लिये (स्नान* करके) आचमन करना चाहिये—ऐसा पितामहदेवने कहा है॥ ६६—६८॥
भुञ्जानस्य तु विप्रस्य कदाचित् संस्रवेद् गुदम्।<br>कृत्वा शौचं ततः स्नायादुपोष्य जुहुयाद् घृतम्॥ ६९॥<br><br>चाण्डालान्त्यशवं स्पृष्ट्वा कृच्छ्रं कुर्याद् विशुद्धये।<br>स्पृष्टाभ्यक्तस्त्वसंस्पृश्यमहोरात्रेण शुध्यति॥ ७०॥भोजन करते समय ब्राह्मणके गुदामार्गसे कदाचित् मलस्राव हो जाय तो शौच करनेके अनन्तर स्नान करना चाहिये और उपवास करके घृतसे हवन करे। चाण्डाल एवं अन्त्यजके शवका स्पर्श करके शुद्धिके लिये कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। उबटन आदि लगानेके बाद अस्पृश्य व्यक्तिका स्पर्श होनेपर एक अहोरात्र उपवास करनेसे शुद्धि होती है॥ ६९-७०॥
सुरां स्पृष्ट्वा द्विजः कुर्यात् प्राणायामत्रयं शुचिः।<br>पलाण्डुं लशुनं चैव घृतं प्राश्य ततः शुचिः॥ ७१॥<br><br>ब्राह्मणस्तु शुना दष्टस्त्र्यहं सायं पयः पिबेत्।<br>नाभेरूर्ध्वं तु दष्टस्य तदेव द्विगुणं भवेत्॥ ७२॥<br><br>स्यादेतत् त्रिगुणं बाह्वोर्मूर्ध्नि च स्याच्चतुर्गुणम्।<br>स्नात्वा जपेद् वा सावित्रीं श्वभिर्दष्टो द्विजोत्तमः॥ ७३॥सुराका स्पर्श करके द्विज तीन प्राणायाम करनेसे शुद्ध होता है। प्याज, लहसुनका स्पर्श होनेपर घृतका प्राशन करनेसे शुद्धि होती है। कुत्तेके काटनेपर ब्राह्मणको (कुत्तेके स्पर्शके प्रायश्चित्तके साथ) तीन दिन सायंकाल केवल दूध पीना चाहिये। नाभिके ऊपरी भागमें काटनेपर यही क्रिया (प्रायश्चित्त) दो बार करनी चाहिये। इसी प्रकार बाहुमें काटनेपर यही क्रिया तीन बार और मस्तकमें काटनेपर चार बार करनी चाहिये अथवा कुत्तेके काटनेपर द्विजोत्तमको स्नान करके गायत्रीका जप करना चाहिये॥ ७१—७३॥

* यथाविधि आचमनकी योग्यता स्नानके बिना नहीं होती है।