संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४२४ * कूर्मपुराण *
| अनुपासितसंध्यस्तु तदहर्यापको वसेत्।<br>अनश्नन् संयतमना रात्रौ चेद् रात्रिमेव हि॥ ५२॥<br><br>अकृत्वा समिदाधानं शुचिः स्नात्वा समाहितः।<br>गायत्र्यष्टसहस्रस्य जप्यं कुर्याद् विशुद्धये॥ ५३॥<br><br>उपासीत न चेत् संध्यां गृहस्थोऽपि प्रमादतः।<br>स्नात्वा विशुध्यते सद्यः परिश्रान्तस्तु संयमात्॥ ५४॥<br><br>वेदोदितानि नित्यानि कर्माणि च विलोप्य तु।<br>स्नातकव्रतलोपं तु कृत्वा चोपवसेद् दिनम्॥ ५५॥ | (प्रातः) संध्या न करनेपर उस दिन वैसे ही बिना भोजन किये संयतमन होकर रहना चाहिये और सायं-संध्या न करनेपर रात्रिमें भोजन नहीं करना चाहिये। (गार्हपत्याग्निमें) समिधा न डालनेपर अर्थात् नित्य-हवन (नित्यकर्म—अग्निहोत्र) न करनेपर उस पापकी शुद्धिके लिये स्नान करके पवित्रतापूर्वक समाहित होकर आठ हजार गायत्रीका जप करना चाहिये। गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी व्यक्ति यदि प्रमादसे संध्या नहीं करता है तो स्नान करके उपवास करनेसे वह शुद्ध हो जाता है और थकानके कारण संध्या न करनेवाला संयम (मन एकाग्रकर पश्चात्तापमात्र) करनेसे शुद्ध हो जाता है। वेदमें बताये गये नित्य-कर्मोंका लोप करने तथा स्नातकके व्रतका लोप करनेपर स्नातकको एक दिनका उपवास करना चाहिये॥ ५२—५५॥ |
| संवत्सरं चरेत् कृच्छ्रमग्न्युत्सादी द्विजोत्तमः।<br>चान्द्रायणं चरेद् व्रात्यो गोप्रदानेन शुध्यति॥ ५६॥<br><br>नास्तिक्यं यदि कुर्वीत प्राजापत्यं चरेद् द्विजः।<br>देवद्रोहं गुरुद्रोहं तप्तकृच्छ्रेण शुध्यति॥ ५७॥<br><br>उष्ट्रयानं समारुह्य खरयानं च कामतः।<br>त्रिरात्रेण विशुध्येत् तु नग्नो वा प्रविशेज्जलम्॥ ५८॥ | अग्निका परित्याग करनेवाले द्विजोत्तमको एक वर्षतक कृच्छ्रव्रत करना चाहिये और संस्कारहीन व्यक्ति चान्द्रायणव्रत करने और गोदान करनेसे शुद्ध हो जाता है। नास्तिकता करनेवाले द्विजको प्राजापत्य-व्रतका पालन करना चाहिये। देवतासे तथा गुरुसे द्रोह करनेपर तप्तकृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्धि होती है। इच्छापूर्वक ऊँट या गदहेकी सवारी करनेपर तीन रात्रिपर्यन्त उपवास करनेसे शुद्धि होती है। इसी प्रकार नग्न होकर जलमें प्रवेश करनेपर तीन राततक उपवास करना चाहिये॥ ५६—५८॥ |
| षष्ठान्नकालतामासं संहिताजप एव च।<br>होमाश्च शाकला नित्यमपांक्तानां विशोधनम्॥ ५९॥<br><br>नीलं रक्तं वसित्वा च ब्राह्मणो वस्त्रमेव हि।<br>अहोरात्रोषितः स्नातः पञ्चगव्येन शुध्यति॥ ६०॥ | पंक्तिसे बहिष्कृत यदि ऐसे लोग हैं, जिनके लिये विशेष प्रायश्चित्तका उपदेश नहीं किया गया है, वे लोग एक मासतक नियमपूर्वक 'षष्ठान्नकालता' (तीन दिन भोजन न कर तीसरे दिन सायं केवल एक बार सात्त्विक (हविष्यान्न) भोजन करें, संहिताजप (वेदसंहिताके मन्त्रोंका पाठ) करें तथा शाकल होम (बौधायनस्मृति प्रश्न ४, अध्याय ३ के अनुसार) करें तो शुद्ध हो सकते हैं। नीला या लाल वस्त्र धारण करनेपर ब्राह्मण एक अहोरात्र उपवास करनेके अनन्तर स्नानकर पञ्चगव्यका पान करनेसे शुद्ध होता है॥ ५९-६०॥ |
| वेदधर्मपुराणानां चण्डालस्य तु भाषणे।<br>चान्द्रायणेन शुद्धिः स्यान्न ह्यान्या तस्य निष्कृतिः॥ ६१॥ | चाण्डालको वेद, धर्मशास्त्रों तथा पुराणोंका उपदेश करनेपर चान्द्रायणसे शुद्धि होती है, इसके अतिरिक्त उसकी निष्कृति (निस्तार)-का कोई अन्य उपाय नहीं है॥ ६१॥ |