संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय ३३ * | ४२३ ---|--- स्नानार्हो यदि भुञ्जीत अहोरात्रेण शुध्यति ।<br>बुद्धिपूर्वं तु कृच्छ्रेण भगवानाह पद्मजः ॥ ४१ ॥<br><br>शुष्कपर्युषितादीनि गवादिप्रतिदूषितम् ।<br>भुक्त्वोपवासं कुर्वीत कृच्छ्रपादमथापि वा ॥ ४२ ॥<br><br>संवत्सरान्ते कृच्छ्रं तु चरेद् विप्रः पुनः पुनः ।<br>अज्ञातभुक्तशुद्ध्यर्थं ज्ञातस्य तु विशेषतः ॥ ४३ ॥ | भगवान् ब्रह्माने कहा है कि स्नानके योग्य व्यक्ति यदि बिना स्नान किये भोजन करता है तो वह अहोरात्र उपवास करनेसे शुद्ध हो जाता है, किंतु ज्ञानपूर्वक भोजन करनेपर कृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्धि होती है। शुष्क, बासी आदि तथा गौ आदिद्वारा दूषित (उच्छिष्ट) पदार्थोंका भक्षण करनेपर एक दिनका उपवास अथवा कृच्छ्रव्रतका चतुर्थांश व्रत करना चाहिये। अज्ञानमें अभोज्य पदार्थोंके भक्षणसे होनेवाले पापकी शुद्धिके लिये संवत्सरके अन्तमें ब्राह्मणको बार-बार कृच्छ्रव्रत करना चाहिये और जान-बूझकर ऐसा होनेपर इसे विशेषरूपसे करना चाहिये॥ ४१—४३ ॥ व्रात्यानां यजनं कृत्वा परेषामन्त्यकर्म च।<br>अभिचारमहीनं च त्रिभिः कृच्छ्रैर्विशुध्यति ॥ ४४ ॥<br><br>ब्राह्मणादिहतानां तु कृत्वा दाहादिकाः क्रियाः।<br>गोमूत्रयावकाहारः प्राजापत्येन शुध्यति ॥ ४५ ॥<br><br>तैलाभ्यक्तोऽथवा कुर्याद् यदि मूत्रपुरीषके।<br>अहोरात्रेण शुध्येत श्मश्रुकर्म च मैथुनम् ॥ ४६ ॥ | संस्कारहीन पुरुषोंका यज्ञ कराने और दूसरोंका* अन्त्येष्टिकर्म तथा अभिचार-कर्म करनेपर तीन कृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्धि होती है। ब्राह्मण आदिके द्वारा मारे गये पुरुषोंका दाहादि कर्म करनेपर गोमूत्रमें पके यवान्नका आहार करने और प्राजापत्य-व्रत करनेसे शुद्धि होती है। तेल लगाकर और मल-मूत्रका त्याग करने, श्मश्रुकर्म करने (दाढ़ी आदि बनाने) तथा मैथुन करनेपर अहोरात्र उपवास करनेसे शुद्धि होती है॥ ४४—४६ ॥ एकाहेन विवाहाग्निं परिहार्य द्विजोत्तमः।<br>त्रिरात्रेण विशुध्येत त्रिरात्रात् षडहं पुनः ॥ ४७ ॥<br><br>दशाहं द्वादशाहं वा परिहार्य प्रमादतः।<br>कृच्छ्रं चान्द्रायणं कुर्यात् तत्पापस्यापनुत्तये ॥ ४८ ॥ | एक दिन विवाहाग्नि (गृह्याग्नि)-का त्याग करने अर्थात् उस अग्निमें हवन न करनेसे द्विजोत्तम तीन दिन (उपवास करने)-से शुद्ध होता है और तीन दिनतक नित्य हवन न करनेपर छः दिनोंके उपवाससे शुद्ध होता है। प्रमादवश दस दिन अथवा बारह दिनतक गृह्याग्निका त्याग करनेपर उस पापकी शुद्धिके लिये कृच्छ्रचान्द्रायणव्रत करना चाहिये॥ ४७-४८॥ पतिताद् द्रव्यमादाय तदुत्सर्गेण शुध्यति ।<br>चरेत् सांतपनं कृच्छ्रमित्याह भगवान् प्रभुः ॥ ४९ ॥<br><br>अनाशकनिवृत्तास्तु प्रव्रज्यावसितास्तथा।<br>चरेयुस्त्रीणि कृच्छ्राणि त्रीणि चान्द्रायणानि च ॥ ५० ॥ | भगवान् प्रभुने बताया है कि पतित व्यक्तिसे द्रव्य लेनेपर उस द्रव्यका त्याग कर देनेसे शुद्धि होती है, साथ ही कृच्छ्रसांतपनव्रत करना चाहिये। प्रायोपवेशन-व्रतसे भ्रष्ट तथा संन्यास-आश्रमसे च्युत व्यक्तिको तीन कृच्छ्र और तीन चान्द्रायणव्रत करना चाहिये॥ ४९-५०॥ पुनश्च जातकर्मादिसंस्कारैः संस्कृता द्विजाः।<br>शुद्ध्येयुस्तद् व्रतं सम्यक् चरेयुर्धर्मवर्धनाः ॥ ५१ ॥ | पुनः जातकर्मादि संस्कारोंद्वारा संस्कृत होनेपर धर्मकी वृद्धि चाहनेवाले द्विजोंको भलीभाँति व्रतका पालन करना चाहिये॥ ५१॥
* यद्यपि अधिकारीके अभावमें किसीका अन्त्यकर्म करना पुण्यप्रद होता है, पर यदि यही अन्त्यकर्म लोभवश अधिकारीके रहते हुए भी स्वयं किया जाय तो पापका कारण होता है, अतः इसके लिये प्रायश्चित्तका विधान है।