भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४२२* कूर्मपुराण *
असुरामद्यपानेन कुर्याच्चान्द्रायणव्रतम्।<br>अभोज्यान्नं तु भुक्त्वा च प्राजापत्येन शुध्यति॥ २९॥सुराभिन्न मद्यका पान करनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये और अभोज्यान्न-भक्षण करनेपर प्राजापत्यव्रतसे शुद्धि होती है। मल, मूत्र एवं वीर्यका भक्षण करनेपर भी यही (प्राजापत्य नामक) व्रत करना चाहिये। अन्य सभी न कहे गये पापोंमें यथाविधि एक दिनका उपवास करना चाहिये॥ २९-३०॥
विण्मूत्रप्राशनं कृत्वा रेतसश्चैतदाचरेत्।<br>अनादिष्टेषु चैकाहं सर्वत्र तु यथार्थतः॥ ३०॥<br>विड्वराखरोष्ट्राणां गोमायोः कपिकाकयोः।<br>प्राश्य मूत्रपुरीषाणि द्विजश्चान्द्रायणं चरेत्॥ ३१॥ग्रामसूकर, गदहा, ऊँट, शृगाल, बंदर तथा कौएके मल-मूत्रका भक्षण करनेपर द्विजको चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। अज्ञानसे मल-मूत्रका भक्षण करने और सुराका स्पर्श करनेपर तीनों वर्णवाले द्विजातियोंको पुनः संस्कार करना चाहिये। अज्ञानवश कच्चा मांसभक्षी पक्षियोंके मूत्र-पुरीषका भक्षण हो जानेपर द्विजोत्तमको महासांतपन नामक व्रत करना चाहिये। गृध्र,मेढक, कुरर पक्षी एवं विष्किर (नखसे बिखेरकर खानेवाले पक्षी)-का भक्षण करनेपर (अथवा इनके मूत्र-पुरीषादिका भक्षण करनेपर) कृच्छ्रव्रत करना चाहिये॥ ३१-३३॥
अज्ञानात् प्राश्य विण्मूत्रं सुरासंस्पृष्टमेव च।<br>पुनः संस्कारमर्हन्ति त्रयो वर्णा द्विजातयः॥ ३२॥
क्रव्यादं पक्षिणां चैव प्राश्य मूत्रपुरीषकम्।<br>महासांतपनं मोहात् तथा कुर्याद् द्विजोत्तमः।<br>भासमण्डूककुररे विष्किरे कृच्छ्रमाचरेत्॥ ३३॥<br>प्राजापत्येन शुध्येत ब्राह्मणोच्छिष्टभोजने।<br>क्षत्रिये तप्तकृच्छ्रं स्याद् वैश्ये चैवातिकृच्छ्रकम्।<br>शूद्रोच्छिष्टं द्विजो भुक्त्वा कुर्याच्चान्द्रायणव्रतम्॥ ३४॥ब्राह्मणका उच्छिष्ट भक्षण करनेपर प्राजापत्य-व्रतसे शुद्धि होती है। क्षत्रियोंका उच्छिष्ट भक्षण करनेपर तसकृच्छ्र नामक व्रत करना चाहिये, वैश्यका उच्छिष्ट ग्रहण करनेपर अतिकृच्छ्र और शूद्रका उच्छिष्ट ग्रहण करनेपर ब्राह्मणको चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। सुराके पात्रमें जल पीनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। कुत्तेका जूठा खानेपर द्विजकी शुद्धि तीन रात्रितक उपवास करनेसे होती है। कुत्तेका पीतशेष इच्छापूर्वक ग्रहण करनेवालेको तीन राततक गोमूत्रमें पके हुए यवान्नका आहारमात्र ग्रहण करना चाहिये॥ ३४-३५॥
सुराभाण्डोदरे वारि पीत्वा चान्द्रायणं चरेत्।<br>शुनोच्छिष्टं द्विजो भुक्त्वा त्रिरात्रेण विशुध्यति।<br>गोमूत्रयावकाहारः पीतशेषं च रागवान्॥ ३५॥
अपो मूत्रपुरीषाद्यैर्दूषिताः प्राशयेद् यदा।<br>तदा सांतपनं प्रोक्तं व्रतं पापविशोधनम्॥ ३६॥<br>चाण्डालकूपभाण्डेषु यदि ज्ञानात् पिबेज्जलम्।<br>चरेत् सांतपनं कृच्छ्रं ब्राह्मणः पापशोधनम्॥ ३७॥<br>चाण्डालेन तु संस्पृष्टं पीत्वा वारि द्विजोत्तमः।<br>त्रिरात्रेण विशुध्येत पञ्चगव्येन चैव हि॥ ३८॥<br>महापातकिसंस्पर्शं भुङ्क्तेऽस्नात्वा द्विजो यदि।<br>बुद्धिपूर्वं तु मूढात्मा तप्तकृच्छ्रं समाचरेत्॥ ३९॥<br>स्पृष्ट्वा महापातकिनं चाण्डालं वा रजस्वलाम्।<br>प्रमादाद् भोजनं कृत्वा त्रिरात्रेण विशुध्यति॥ ४०॥यदि मल तथा मूत्र आदिसे दूषित जलका पान कर ले तो उस पापकी शुद्धिके लिये सांतपन नामक व्रत बतलाया गया है। चाण्डालके कूपसे तथा उसके बरतनोंमें यदि ज्ञानपूर्वक ब्राह्मण जल पी ले तो उस पापकी शुद्धिके लिये कृच्छ्रसांतपन नामक व्रत करना चाहिये। चाण्डालके द्वारा स्पर्श हुआ जल पीनेपर द्विजोत्तम तीन रात्रितक पञ्चगव्य ग्रहण करनेसे शुद्ध होता है। महापातकीका स्पर्श होनेपर बिना स्नान किये यदि द्विज जान-बूझकर मोहवश भोजन करता है तो उसे तसकृच्छ्र करना चाहिये। प्रमादवश महापातकी, चाण्डाल या रजस्वलाका स्पर्शकर भोजन करनेपर तीन रात्रिपर्यन्त उपवाससे शुद्धि होती है॥ ३६-४०॥