भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 431, कुल 506 में से

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पृष्ठ 431
* अध्याय ३३ *४२१

| पलाण्डुं लशुनं चैव भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्।<br>नालिकां तण्डुलीयं च प्राजापत्येन शुध्यति ॥ १८ ॥<br><br>अश्मान्तकं तथा पोतं तप्तकृच्छ्रेण शुध्यति।<br>प्राजापत्येन शुद्धिः स्यात् कक्कुभाण्डस्य भक्षणे ॥ १९ ॥<br><br>अलाबुं किंशुकं चैव भुक्त्वा चैतद् व्रतं चरेत्।<br>उदुम्बरं च कामेन तप्तकृच्छ्रेण शुध्यति ॥ २० ॥ | प्याज एवं लहसुन भक्षण करनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। नालिका शाक और तण्डुलीयक (चौलाई)-का साग खानेपर प्राजापत्य व्रतसे शुद्धि होती है। अश्मान्तक तथा पोतका भक्षण करनेपर तप्तकृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्धि होती है। ककुभके अंडेका भक्षण करनेपर प्राजापत्य-व्रतसे शुद्धि होती है। अलाबु (वर्तुलाकार अर्थात् गोल लौकी) तथा किंशुक (पलाश)-का भक्षण करनेपर भी यही व्रत करना चाहिये। इच्छापूर्वक उदुम्बर (गूलर)-का भक्षण करनेपर तप्तकृच्छ्रसे शुद्धि होती है॥ १८-२०॥ | | वृथा कृसरसंयावं पायसापूपसंकुलम्।<br>भुक्त्वा चैवंविधं त्वन्नं त्रिरात्रेण विशुध्यति ॥ २१ ॥<br><br>पीत्वा क्षीराण्येपेयानि ब्रह्मचारी समाहितः।<br>गोमूत्रयावकाहारो मासेनैकेन शुध्यति ॥ २२ ॥<br><br>अनिर्दशाहं गोक्षीरं माहिषं चाजमेव च।<br>संधिन्याश्च विवत्सायाः पिबन् क्षीरमिदं चरेत् ॥ २३ ॥<br><br>एतेषां च विकाराणि पीत्वा मोहेन मानवः।<br>गोमूत्रयावकाहारः सप्तरात्रेण शुध्यति ॥ २४ ॥ | किसी शास्त्रीय उद्देश्यके बिना व्यर्थ ही या केवल अपने लिये कृसर (अन्न), संयाव (लपसी), खीर और मालपूआके समान पदार्थ भक्षण करनेपर तीन रात्रितक व्रत करनेसे शुद्धि होती है। पीनेके अयोग्य दूधका पान करनेपर सावधानीपूर्वक गोमूत्रमें पके यावकका आहार करनेसे एक मासमें ब्रह्मचारी शुद्ध होता है। ब्यानेके दस दिन हुए बिना अथवा गर्भिणी और बिना बच्चेवाली गौ, भैंस और बकरीका दूध पीनेपर यही व्रत करना चाहिये। इनके (दूधके) विकार अर्थात् घी-दही आदिका मोहवश भक्षण करनेपर मनुष्य सात रात्रितक गोमूत्रमें अधपके यवका अथवा यवके सत्तू आदिका भोजन करनेसे शुद्ध होता है॥ २१-२४॥ | | भुक्त्वा चैव नवश्राद्धे मृतके सूतके तथा।<br>चान्द्रायणेन शुद्ध्येत ब्राह्मणस्तु समाहितः ॥ २५ ॥<br><br>यस्याग्नौ हूयते नित्यं न यस्याग्रं न दीयते।<br>चान्द्रायणं चरेत् सम्यक् तस्यान्नप्राशने द्विजः ॥ २६ ॥<br><br>अभोज्यानां तु सर्वेषां भुक्त्वा चान्नमुपस्कृतम्।<br>अन्तावसायिनां चैव तप्तकृच्छ्रेण शुध्यति ॥ २७ ॥<br><br>चाण्डालान्नं द्विजो भुक्त्वा सम्यक् चान्द्रायणं चरेत्।<br>बुद्धिपूर्वं तु कृच्छाब्दं पुनः संस्कारमेव च ॥ २८ ॥ | (मृत्युके अनन्तर होनेवाले) नवश्राद्ध (मृत व्यक्तिके प्रथम दिनसे लेकर दशम दिनतक किये जानेवाले श्राद्ध), जननाशौच तथा मरणाशौचमें भोजन करनेपर ब्राह्मण समाहित होकर चान्द्रायणव्रत करनेसे शुद्ध होता है। जो (अधिकारी) न नित्य अग्निमें हवन करता है और न अग्रासन (भोजन करनेके पूर्व ब्राह्मण तथा अतिथिको भोजन कराता है, न गोग्रास ही निकालता है) देता है, उसका अन्न भक्षण करनेपर द्विजको चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। जो अभोज्य हैं उन सभीका तथा अन्त्यजोंका पक्वान्न ग्रहण करनेपर तप्तकृच्छ्रव्रतसे शुद्धि होती है। बिना जाने चाण्डालका अन्न भक्षण करके द्विजको भलीभाँति चान्द्रायणव्रत करना चाहिये और जान-बूझकर ऐसा करनेपर एक वर्षतक कृच्छ्रव्रतका पालन करके पुनः (द्विजत्व-प्राप्तिके लिये) संस्कार करना चाहिये॥ २५-२८॥ |

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