भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४२० * कूर्मपुराण *


मणिमुक्ताप्रवालानां ताम्रस्य रजतस्य च।
अयःकांस्योपलानां च द्वादशाहं कणाशनम्॥ ६ ॥

कार्पासकीटजोर्णानां द्विशफैकशफस्य च।
पक्षिगन्धौषधीनां च रज्ज्वाश्चैव त्र्यहं पयः॥ ७ ॥

मणि, मोती, मूूँगा, ताँबा, चाँदी, लोहा, काँसा तथा पत्थरकी चोरी करनेपर बारह दिनतक कण (टूटे चावल)-का भक्षण करना चाहिये। कपास, रेशम, ऊन, दो खुर तथा एक खुरवाले पशु, पक्षी, गन्ध, औषधि तथा रस्सीका हरण करनेपर तीन दिनतक जलमात्र पीकर रहना चाहिये॥ ६-७॥

नरमांसाशनं कृत्वा चान्द्रायणमथाचरेत्।
काकं चैव तथा श्वानं जग्ध्वा हस्तिनमेव च।
वराहं कुक्कुटं चाथ तप्तकृच्छ्रेण शुध्यति॥ ८ ॥

क्रव्यादानां च मांसानि पुरीषं मूत्रमेव च।
गोगोमायुकपीनां च तदेव व्रतमाचरेत्।
उपोष्य द्वादशाहं तु कूष्माण्डैर्जुहुयाद् घृतम्॥ ९ ॥

नकुलोलूकमार्जारं जग्ध्वा सांतपनं चरेत्।
श्वापदोष्ट्रखराञ्जग्ध्वा तप्तकृच्छ्रेण शुध्यति।
व्रतवच्चैव संस्कारं पूर्वेण विधिनेव तु॥ १०॥

मनुष्यका मांस भक्षण करनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। कौआ, कुत्ता, हाथी, वराह और कुक्कुटका मांस खानेपर तप्तकृच्छ्रव्रतसे शुद्धि होती है। कच्चा मांस खानेवाले जानवरों, सियारों तथा बंदरोंका मांस तथा मल-मूत्र भक्षण करनेपर तप्तकृच्छ्रव्रत करना चाहिये तथा बारह दिनोंतक उपवास करके कूष्माण्ड-संज्ञक मन्त्रोंसे घीकी आहुति देनी चाहिये। नेवला, उल्लू तथा बिल्लीका मांस भक्षण करनेपर सान्तपनव्रत करना चाहिये। शिकारी पशु, ऊँट और गदहेका मांस खानेपर तप्तकृच्छ्रव्रतसे शुद्धि होती है। पहले निर्दिष्ट विधानके अनुसार व्रतके समान ही संस्कार भी करना चाहिये॥ ८-१०॥

बकं चैव बलाकं च हंसं कारण्डवं तथा।
चक्रवाकं प्लवं जग्ध्वा द्वादशाहमभोजनम्॥ ११ ॥

कपोतं टिट्टिभं चैव शुकं सारसमेव च।
उलूकं जालपादं च जग्ध्वाप्येतद् व्रतं चरेत्॥ १२॥

शिशुमारं तथा चाषं मत्स्यमांसं तथैव च।
जग्ध्वा चैव कटाहारमेतदेव चरेद् व्रतम्॥ १३॥

कोकिलं चैव मत्स्यांश्च मण्डूकं भुजगं तथा।
गोमूत्रयावकाहारो मासेनैकेन शुध्यति॥ १४॥

जलेचरांश्च जलजान् प्रतुदान् नखविष्किरान्।
रक्तपादांस्तथा जग्ध्वा सप्ताहं चैतदाचरेत्॥ १५॥

शुनो मांसं शुष्कमांसमात्मार्थं च तथा कृतम्।
भुक्त्वा मासं चरेदेतत् तत्पापस्यापनुत्तये॥ १६॥

वार्ताकं भूस्तृणं शिग्रुं खुखुण्डं करकं तथा।
प्राजापत्यं चरेज्जग्ध्वा शंखं कुम्भीकमेव च॥ १७॥

बक (बगुला), बलाक (बक-पंक्ति), हंस, कारण्डव, चक्रवाक तथा प्लव पक्षीका मांस भक्षण करनेपर बारह दिनतक भोजन (अन्न ग्रहण) नहीं करना चाहिये। कपोत, टिट्टिभ, शुक, सारस, उलूक तथा कलहंसका मांस भक्षण करनेपर भी यही व्रत (बारह दिनतक उपवास) करना चाहिये। शिशुमार, नीलकण्ठ, मछलीका मांस तथा गीदड़का मांस भक्षण करनेपर भी यही (उपर्युक्त) व्रत करना चाहिये। कोयल, मत्स्य, मेढक तथा सर्प भक्षण करनेपर एक मासतक गोमूत्रमें अधपके यवका या यवके सत्तू आदिका भक्षण करनेसे शुद्धि होती है। जलचर, जलज, प्रतुद अर्थात् चोंचद्वारा ठोकर मारकर आहार करनेवाले कौआ आदि, नखविष्किर अर्थात् तितिर आदि और लाल पैरवाले पक्षियोंका मांस भक्षण करनेपर एक सप्ताह्तक यह (उपर्युक्त) व्रत करना चाहिये। कुत्तेका मांस, सूखा मांस तथा अपने लिये बनाया मांस खानेपर उस पापको हटानेके लिये एक महीनेतक यह (ऊपर कहा गया) व्रत करना चाहिये। बैगन, भूस्तृण, सहजन, खुखुण्ड, करक, शङ्ख और कुम्भीकका भक्षण करनेपर प्राजापत्यव्रत करना चाहिये॥ ११-१७॥