संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय ३३ * | ४१९ |
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क्रव्यादांस्तु मृगान् हत्वा धेनुं दद्यात् पयस्विनीम्।
अक्रव्यादान् वत्सतरीमुष्ट्रं हत्वा तु कृष्णलम्॥ ५५॥
किञ्चिदेव तु विप्राय दद्यादस्थिमतां वधे।
अनस्थां चैव हिंसायां प्राणायामेन शुध्यति ॥ ५६ ॥
फलदानां तु वृक्षाणां छेदने जप्यमृक्शतम्।
गुल्मवल्लीलतानां तु पुष्पितानां च वीरुधाम्॥ ५७ ॥
अन्येषां चैव वृक्षाणां सरसानां च सर्वशः।
फलपुष्पोद्भवानां च घृतप्राशो विशोधनम्॥ ५८ ॥
हस्तिनां च वधे दृष्टं तप्तकृच्छ्रं विशोधनम्।
चान्द्रायणं पराकं वा गां हत्वा तु प्रमादतः।
मतिपूर्वं वधे चास्याः प्रायश्चित्तं न विद्यते॥ ५९ ॥ | मांस भक्षण करनेवाले अरण्यके पशुओं (व्याघ्र आदि)-की हत्या करनेपर पयस्विनी गौका दान करना चाहिये। मांस न खानेवाले पशुओं—हरिण, खंजरीट आदिकी हत्या करनेपर (गौकी) बछड़ीका दान करना चाहिये और ऊँटका वध करनेपर कृष्णलका (घुंघची अर्थात् एक रत्ती सुवर्णका) दान करना चाहिये। अस्थिवाले पशु-पक्षीका वध करनेपर ब्राह्मणको किञ्चित् दान करना चाहिये और बिना अस्थिवाले पशु-पक्षीका वध होनेपर प्राणायाम करनेसे शुद्धि होती है॥ ५५-५६॥
फलदार वृक्षोंके काटनेपर एक सौ ऋचाओंका जप करना चाहिये। गुल्म, वल्ली, लता तथा फूलवाले वृक्षों और अन्य सभी प्रकारके रसवाले, फल तथा पुष्प देनेवाले वृक्षोंको नष्ट करनेपर घृत-प्राशन करनेसे शुद्धि होती है। हाथीका वध करनेपर तप्तकृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्धि होती है। प्रमादवश गौकी हत्या करनेपर चान्द्रायण अथवा पराकव्रत करना चाहिये और जान-बूझकर वध करनेपर इस हिंसाका कोई प्रायश्चित्त नहीं है॥ ५७-५९॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें बत्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३२॥
तैंतीसवाँ अध्याय
प्रायश्चित्त-प्रकरणमें चोरी तथा अभक्ष्य-भक्षणका प्रायश्चित्त, प्रकीर्ण पापोंका प्रायश्चित्त, समस्त पापोंकी एकत्र मुक्तिके विविध उपाय, पतिव्रताको कोई पाप नहीं लगता, पतिव्रताके माहात्म्यमें देवी सीताका आख्यान, सीताद्वारा अग्निस्तुति, ज्ञानयोगकी प्रशंसा तथा प्रायश्चित्त-प्रकरणका उपसंहार
व्यास उवाच
मनुष्याणां तु हरणं कृत्वा स्त्रीणां गृहस्य च।
वापीकूपजलानां च शुध्येच्चान्द्रायणेन तु॥ १॥
द्रव्याणामल्पसाराणां स्तेयं कृत्वान्यवेश्मतः।
चरेत् सांतपनं कृच्छ्रं तन्निर्यात्यात्मशुद्धये॥ २॥
धान्यान्नधनचौर्यं तु कृत्वा कामाद् द्विजोत्तमः।
स्वजातीयगृहादेव कृच्छ्रार्धेन विशुध्यति॥ ३॥
भक्ष्यभोज्यापहरणे यानशय्यासनस्य च।
पुष्पमूलफलानां च पञ्चगव्यं विशोधनम्॥ ४॥
तृणकाष्ठद्रुमाणां च शुष्कान्नस्य गुडस्य च।
चैलचर्मामिषाणां च त्रिरात्रं स्यादभोजनम्॥ ५॥ | व्यासजीने कहा— मनुष्य, स्त्री, गृह, वापी, कूप तथा जलाशयोंका अपहरण करनेपर चान्द्रायणव्रत करनेसे शुद्धि होती है। दूसरेके घरोंसे अल्प सारवाली अर्थात् सामान्य वस्तुओंकी चोरी करनेपर उस पापसे अपनी शुद्धिके लिये कृच्छ्रसान्तपनव्रत करना चाहिये। द्विजोत्तम यदि इच्छापूर्वक अपनी जातिवाले बान्धवोंके घरसे धान्य, अन्न अथवा धनकी चोरी करे तो अर्धकृच्छ्रव्रतका पालन करनेसे शुद्ध होता है। भक्ष्य एवं भोज्य पदार्थों तथा यान, शय्या, आसन, पुष्प, मूल तथा फलोंकी चोरीकी शुद्धि पञ्चगव्य-प्राशनसे होती है। तृण, काष्ठ, वृक्ष, शुष्कान्न, गुड़, वस्त्र, चर्म तथा मांसकी चोरी करनेपर तीन रात्रितक भोजन नहीं करना चाहिये॥ १-५॥