भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४१८ * कूर्मपुराण *

संवत्सरं व्रतं कुर्याच्छूद्रं हत्वा प्रमादतः।<br>गोसहस्रार्थपादं च दद्यात् तत्पापशान्तये॥ ४६॥प्रमादवश शूद्रकी हत्या करनेपर इस पापके शमनके लिये एक वर्षतक ब्रह्महत्याका व्रत करना चाहिये और एक हजार एक सौ पचीस गौओंका दान करना चाहिये॥ ४६॥
अष्टौ वर्षाणि षट् त्रीणि कुर्याद् ब्रह्महणो व्रतम्।<br>हत्वा तु क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं चैव यथाक्रमम्॥ ४७॥क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—इनमेंसे किसी एकका वध करनेपर क्रमशः आठ, छः तथा तीन वर्षतक ब्रह्महत्या-सम्बन्धी व्रतका पालन करना चाहिये। ब्राह्मणीकी हत्या करनेपर ब्राह्मणको आठ वर्षतक ब्रह्महत्याके व्रतका पालन करना चाहिये। क्षत्राणीकी हत्या करनेपर छः वर्षतक और वैश्याकी हत्या होनेपर तीन वर्षतक तथा शूद्राकी हत्या होनेपर एक वर्षतक ब्रह्महत्या-सम्बन्धी व्रतका पालन करनेसे द्विजोत्तम शुद्ध हो जाता है।
निहत्य ब्राह्मणीं विप्रस्त्वष्टवर्षं व्रतं चरेत्।<br>राजन्यां वर्षषट्कं तु वैश्यां संवत्सरत्रयम्।<br>वत्सरेण विशुद्ध्येत शूद्रां हत्वा द्विजोत्तमः॥ ४८॥
वैश्यां हत्वा प्रमादेन किञ्चिद् दद्याद् द्विजातये।<br>अन्त्यजानां वधे चैव कुर्याच्चान्द्रायणं व्रतम्।<br>पराकेणाथवा शुद्धिरित्याह भगवानजः॥ ४९॥प्रमादवश वैश्यकी स्त्रीकी हत्या करनेपर द्विजको किञ्चित् दान करना चाहिये। अन्त्यजोंका वध होनेपर चान्द्रायण-व्रत करना चाहिये अथवा भगवान् ब्रह्माने पराकव्रतके द्वारा शुद्धि बतलायी है॥ ४७–४९॥
मण्डूकं नकुलं काकं दन्दशूकं च मूषिकम्।<br>श्वानं हत्वा द्विजः कुर्यात् षोडशांशं व्रतं ततः॥ ५०॥मेढक, नकुल, कौआ, दन्दशूक (हिंसक जन्तु), चूहा अथवा कुत्तेकी हत्या करनेपर द्विजको व्रतके सोलहवें अंशका पालन करना चाहिये। कुत्तेकी हत्या करनेपर सावधान होकर तीन रात्रिपर्यन्त दूधमात्र पीकर रहना चाहिये। बिल्ली अथवा नेवलेका वध हो जानेपर एक योजन (चार कोस)-तक मार्गमें (अनशनपूर्वक) चलना चाहिये। द्विजको अश्वका वध करनेपर बारह रात्रिपर्यन्त कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। द्विजोत्तमको चाहिये कि वह सर्पको मारनेपर काले लोहेकी अभ्री (तीक्ष्ण अग्रभागवाला लोहदण्ड)-की प्रतिमा दान करे। साँड़की हत्या करनेपर एक भार धानकी भूसी तथा एक मासा सीसा दान देना चाहिये॥ ५०–५२॥
पयः पिबेत् त्रिरात्रं तु श्वानं हत्वा सुयन्त्रितः।<br>मार्जारं वाथ नकुलं योजनं वाध्वनो व्रजेत्।<br>कृच्छ्रं द्वादशरात्रं तु कुर्यादश्ववधे द्विजः॥ ५१॥
अभ्रीं कार्ष्णायसीं दद्यात् सर्पं हत्वा द्विजोत्तमः।<br>पलालभारं षण्डं च सैसकं चैकमाषकम्॥ ५२॥
घृतकुम्भं वराहं च तिलद्रोणं च तित्तिरिम्।<br>शुकं द्विहायनं वत्सं क्रौञ्चं हत्वा त्रिहायनम्॥ ५३॥वराहकी हत्या करनेपर घृतसे भरा घड़ा और तितिरकी हत्या करनेपर एक द्रोण तिल देना चाहिये। शुककी हत्या करनेपर दो वर्षतकके (गायका) बछड़ा, क्रौञ्चको मारनेपर तीन वर्षके (गायके ) बछड़ेका दान करना चाहिये। हंस, बलाका (वक-पंक्ति), बक (बगुला), मोर, वानर, बाज एवं गिद्धका वध करनेपर ब्राह्मणके लिये गौका दान करना चाहिये॥ ५३- ५४॥
हत्वा हंसं बलाकां च बकं बर्हिणमेव च।<br>वानरं श्येनभासौ च स्पर्शयेद् ब्राह्मणाय गाम्॥ ५४॥
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