संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३२ * ४१७
| बन्धकीगमने विप्रस्त्रिरात्रेण विशुध्यति।<br>गवि मैथुनमासेव्य चरेच्चान्द्रायणव्रतम्॥ ३४॥<br><br>अजावीमैथुनं कृत्वा प्राजापत्यं चरेद् द्विजः।<br>पतितां च स्त्रियं गत्वा त्रिभिः कृच्छ्रैर्विशुध्यति॥ ३५॥<br><br>पुल्कसीगमने चैव कृच्छ्रं चान्द्रायणं चरेत्।<br>नटीं शैलूषकीं चैव रजकीं वेणुजीविनीम्।<br>गत्वा चान्द्रायणं कुर्यात् तथा चर्मोपजीविनीम्॥ ३६॥<br>ब्रह्मचारी स्त्रियं गच्छेत् कथञ्चित्काममोहितः।<br>सप्तागारं चरेद् भैक्षं वसित्वा गर्दभाजिनम्॥ ३७॥<br><br>उपस्पृशेत् त्रिशवणं स्वपापं परिकीर्तयन्।<br>संवत्सरेण चैकेन तस्मात् पापात् प्रमुच्यते॥ ३८॥<br><br>ब्रह्महत्याव्रतं वापि षण्मासानाचरेद् यमी।<br>मुच्यते ह्यवकीर्णी तु ब्राह्मणानुमते स्थितः॥ ३९॥<br><br>सप्तरात्रमकृत्वा तु भैक्षचर्याग्निपूजनम्।<br>रेतसश्च समुत्सर्गे प्रायश्चित्तं समाचरेत्॥ ४०॥<br><br>ओंकारपूर्विकाभिस्तु महाव्याहृतिभिः सदा।<br>संवत्सरं तु भुञ्जानो नक्तं भिक्षाशनः शुचिः॥ ४१॥<br><br>सावित्रीं च जपेच्चैव नित्यं क्रोधविवर्जितः।<br>नदीतीरेषु तीर्थेषु तस्मात् पापाद् विमुच्यते॥ ४२॥<br>हत्वा तु क्षत्रियं विप्रः कुर्याद् ब्रह्मणो व्रतम्।<br>अकामतो वै षण्मासान् दद्यात् पञ्चशतं गवाम्॥ ४३॥<br><br>अब्दं चरेत नियतो वनवासी समाहितः।<br>प्राजापत्यं सान्तपनं तप्तकृच्छ्रं तु वा स्वयम्॥ ४४॥<br><br>प्रमाप्याकामतो वैश्यं कुर्यात् संवत्सरद्वयम्।<br>गोसहस्रं सपादं च दद्यात् ब्रह्मणो व्रतम्।<br>कृच्छ्रातिकृच्छ्रैर् वा कुर्याच्चान्द्रायणमथापि वा॥ ४५॥ | व्यभिचारिणी स्त्रीके साथ गमन करनेपर ब्राह्मण तीन रातमें शुद्ध होता है। गौके साथ मैथुन करनेपर चान्द्रायणव्रतका पालन करना चाहिये। बकरी या भेड़ीके साथ मैथुन करनेवाले द्विजको प्राजापत्य-व्रत करना चाहिये। पतित स्त्रीके साथ सहवास करनेपर तीन कृच्छ्रव्रतोंसे शुद्धि होती है। पुल्कसी (शूद्रामें निषादसे उत्पन्न स्त्री)-के साथ गमन करनेपर कृच्छ्रचान्द्रायणव्रत करना चाहिये। नटी, नर्तकी धोबिन, बाँसके द्वारा तथा चर्मके द्वारा जीविका निर्वाह करनेवाली स्त्रीके साथ मैथुन करनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये॥ ३४—३६॥<br><br>कदाचित् यदि कामसे मोहित होकर ब्रह्मचारी स्त्रीके साथ गमन करता है तो उसे गदहेका चर्म धारणकर सात घरोंसे भिक्षा माँगनी चाहिये। अपने पापको प्रकट करते हुए तीनों कालोंमें स्नान करना चाहिये। इस प्रकार एक वर्षतक करनेसे वह इस पापसे मुक्त हो जाता है। अवकीर्णी (ब्रह्मचर्यव्रतसे च्युत संन्यासी या ब्रह्मचारी) ब्राह्मणके कथनानुसार संयमपूर्वक छः मासतक ब्रह्महत्या-सम्बन्धी व्रत करनेसे (इस पापसे) मुक्त हो जाता है। यदि सात अहोरात्रतक समर्थ रहनेपर भी भिक्षाचरण तथा अग्निहोत्र न करे तथा बुद्धिपूर्वक अपने शुक्र (वीर्य)-का परित्याग करे तो इस प्रकारका प्रायश्चित्त करना चाहिये—नदी-तीरमें अथवा तीर्थमें एक वर्षतक शान्तभावसे पवित्रताके साथ प्रणव एवं महाव्याहृतियोंसे युक्त सावित्री (गायत्री)-का निरन्तर जप करे और भिक्षामात्रसे प्राप्त अन्न केवल रात्रिमें ग्रहण करे। ऐसा करनेसे उपर्युक्त दोनों पापोंसे मुक्ति मिलती है॥ ३७—४२॥<br><br>बुद्धिपूर्वक क्षत्रियकी हत्या करनेपर ब्राह्मणको ब्रह्महत्या-सम्बन्धी व्रतका पालन करना चाहिये। अनचाहे क्षत्रियकी हत्या हो जानेपर छः महीनेतक पाँच सौ गायोंका दान करना चाहिये। अथवा स्वयं वनमें रहते हुए एक वर्षतक एकाग्रतापूर्वक संयमित होकर प्राजापत्य, सान्तपन अथवा तप्तकृच्छ्रव्रत करना चाहिये। अनिच्छापूर्वक वैश्यकी हत्या करनेपर दो वर्षतक ब्रह्महत्या-सम्बन्धी व्रतका पालन करना चाहिये तथा एक हजार दो सौ पचास गायोंका दान करना चाहिये अथवा कृच्छ्र या अतिकृच्छ्रव्रत एवं चान्द्रायणव्रत करना चाहिये॥ ४३—४५॥ |