संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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४१६ * कूर्मपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एभिर्व्रतैरपोहन्ति महापातकिनो मलम्।<br>पुण्यतीर्थाभिगमनात् पृथिव्यां वाथ निष्कृतिः ॥ २० ॥ | इन व्रतोंके द्वारा महापातकी अपने पापको दूर करते हैं। अथवा पृथ्वीके पुण्य-तीर्थोंकी यात्रा करनेसे भी निष्कृति (निस्तार) हो जाती है॥ २०॥ |
| ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः।<br>कृत्वा तैश्चापि संसर्गं ब्राह्मणः कामकारतः ॥ २१ ॥ | ब्रह्महत्या, सुरापान, चोरी तथा गुरुपत्नीके साथ गमन करनेवाले अथवा स्वेच्छापूर्वक उनके साथ संसर्ग करनेवाले ब्राह्मणको भी पुण्य-तीर्थमें समाहित होकर |
| कुर्यादनशनं विप्रः पुण्यतीर्थे समाहितः।<br>ज्वलन्तं वा विशेदग्निं ध्यात्वा देवं कपर्दिनम् ॥ २२ ॥ | अनशनव्रत करना चाहिये अथवा कपर्दी भगवान् शंकरका ध्यान करते हुए जलती हुई अग्निमें प्रवेश करना चाहिये। धर्मवादी मुनियोंने (इसके अतिरिक्त) |
| न ह्यान्या निष्कृतिर्दृष्टा मुनिभिर्धर्मवादिभिः।<br>तस्मात् पुण्येषु तीर्थेषु दहेद् वापि स्वदेहकम् ॥ २३ ॥ | दूसरा प्रायश्चित्त नहीं बतलाया है, इसलिये पुण्य-तीर्थोंमें अपना शरीर जला देना चाहिये॥ २१-२३॥ |
| गत्वा दुहितरं विप्रः स्वसारं वा स्नुषामपि।<br>प्रविशेज्ज्वलनं दीप्तं मतिपूर्वमिति स्थितिः ॥ २४ ॥ | (जान-बूझकर) अपनी पुत्री, बहिन या पुत्रवधूके साथ गमन करनेवालेको जलती हुई प्रदीप्त अग्निमें प्रवेश करना चाहिये। ऐसी मर्यादा है। मौसी, मामी, फूआ |
| मातृष्वसां मातुलानीं तथैव च पितृष्वसाम्।<br>भागिनेयीं समारुह्य कुर्यात् कच्छातिकृच्छ्रकौ ॥ २५ ॥ | तथा भांजीके साथ गमन करनेपर कृच्छ्र तथा अतिकृच्छ्र नामक व्रतोंको करना चाहिये और इन पापोंकी शान्तिके |
| चान्द्रायणं च कुर्वीत तस्य पापस्य शान्तये।<br>ध्यायन् देवं जगद्योनिमनादिनिधनं परम् ॥ २६ ॥ | लिये जगद्योनि अनादिनिधन परमदेवका ध्यान करते हुए चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। भाईकी पत्नीके साथ |
| भ्रातृभार्यां समारुह्य कुर्यात् तत्पापशान्तये।<br>चान्द्रायणानि चत्वारि पञ्च वा सुसमाहितः ॥ २७ ॥ | सहवास करनेपर उस पापकी शान्तिके लिये अच्छी प्रकार समाहित-मन होकर चार अथवा पाँच चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। फूआकी लड़की, मौसीकी लड़की |
| पैतृष्वत्रेयीं गत्वा तु स्वस्त्रीयां मातृरेव च।<br>मातुलस्य सुतां वापि गत्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥ २८ ॥ | अथवा मामाकी लड़कीके साथ गमन करनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। मित्रकी पत्नी तथा सालीके साथ सहवास |
| सखिभार्यां समारुह्य गत्वा श्यालीं तथैव च।<br>अहोरात्रोषितो भूत्वा तप्तकृच्छ्रं समाचरेत् ॥ २९ ॥ | करनेपर एक अहोरात्र उपवास करके तप्तकृच्छ्रव्रत करना चाहिये। रजस्वलाके साथ गमन करनेपर विप्र |
| उदक्यागमने विप्रस्त्रिरात्रेण विशुध्यति।<br>चाण्डालीगमने चैव तप्तकृच्छ्रत्रयं विदुः।<br>सह सांतपनेनास्य नान्यथा निष्कृतिः स्मृता ॥ ३० ॥ | तीन रातमें शुद्ध होता है और चाण्डालीके साथ गमन करनेपर तीन तप्तकृच्छ्र व्रतोंके साथ सांतपनव्रत करनेसे शुद्धि होती है। अन्य किसी प्रकारसे निष्कृति (निस्तार) नहीं कही गयी है॥ २४-३०॥ |
| मातृगोत्रां समासाद्य समानप्रवरां तथा।<br>चान्द्रायणेन शुध्येत प्रयतात्मा समाहितः ॥ ३१ ॥ | माताके गोत्रकी अथवा समान प्रवरवाले कुलकी स्त्रीसे समागम करनेपर इन्द्रियजयी होकर एकाग्रतापूर्वक चान्द्रायणव्रत करनेसे शुद्धि होती है। (समागमके |
| ब्राह्मणो ब्राह्मणीं गत्वा कृच्छ्रमेकं समाचरेत्।<br>कन्यकां दूषयित्वा तु चरेच्चान्द्रायणव्रतम् ॥ ३२ ॥ | अयोग्य) ब्राह्मणीके साथ समागम करनेपर ब्राह्मणको एक कृच्छ्रव्रत करना चाहिये और कन्याको दूषित करनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। अमानुषी स्त्री, |
| अमानुषीषु पुरुष उदक्यायामयोनिषु।<br>रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्छ्रं सान्तपनं चरेत् ॥ ३३ ॥ | रजस्वला, अयोनि तथा जलमें वीर्यपात करनेपर पुरुषको कृच्छ्रसांतपनव्रत करना चाहिये॥ ३१-३३॥ |