संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 425, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 425
| * अध्याय ३२ * | ४१५ |
|---|
| स्नात्वाश्वमेधावभृथे पूतः स्यादथवा द्विजः।<br>प्रदद्याद् वाऽथ विप्रेभ्यः स्वात्मतुल्यं हिरण्यकम्॥ १०॥<br><br>चरेद् वा वत्सरं कृच्छ्रं ब्रह्मचर्यपरायणः।<br>ब्राह्मणः स्वर्णहारी तु तत्पापस्यापनुत्तये॥ ११॥ | अथवा अश्वमेधयज्ञ-सम्बन्धी अवभृथ-स्नान करनेसे द्विज पवित्र हो जाता है। या (शुद्ध होनेके लिये) ब्राह्मणोंको अपने भारके बराबर स्वर्ण-दान करना चाहिये। अथवा सुवर्णकी चोरी करनेवाले ब्राह्मणको उस पापको दूर करनेके लिये एक वर्षतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए कृच्छ्रव्रत करना चाहिये॥ १०-११॥ |
| गुरोर्भार्यां समारुह्य ब्राह्मणः काममोहितः।<br>अवगूहेत् स्त्रियं तप्तां दीप्तां कार्ष्णायसीं कृताम्॥ १२॥<br><br>स्वयं वा शिश्नवृषणावुत्कृत्याधाय चाञ्जलौ।<br>आतिष्ठेद् दक्षिणामाशामानिपातादजिह्मगः॥ १३॥<br><br>गुर्वर्थं वा हतः शुध्येच्चरेद् वा ब्रह्महा व्रतम्।<br>शाखां वा कण्टकोपेतां परिष्वज्याथ वत्सरम्।<br>अधः शयीत नियतो मुच्यते गुरुतल्पगः॥ १४॥<br><br>कृच्छ्रं वाब्दं चरेद् विप्रश्चीरवासाः समाहितः।<br>अश्वमेधावभृथके स्नात्वा वा शुध्यते नरः॥ १५॥<br><br>कालेऽष्टमे वा भुञ्जानो ब्रह्मचारी सदाव्रती।<br>स्थानासनाभ्यां विहरंस्त्रिरहोऽभ्युपयन्नपः॥ १६॥<br><br>अधःशायी त्रिभिर्वर्षैस्तद् व्यपोहति पातकम्।<br>चान्द्रायणानि वा कुर्यात् पञ्च चत्वारि वा पुनः॥ १७॥ | कामसे मोहित होकर गुरुकी भार्याके साथ गमन करनेवाले ब्राह्मणको लोहेसे बनायी गयी कृष्णवर्णकी तप्त एवं उद्दीप्त स्त्रीका आलिङ्गन करना चाहिये। अथवा स्वयं लिङ्ग एवं अण्डकोशको काटकर और अपनी अञ्जलिमें रखकर निष्कपट-भावसे दक्षिण दिशाकी ओर तबतक जाना चाहिये, जबतक शरीरपात न हो जाय। गुरुके लिये मारे जानेसे भी गुरुपत्नीगामी शुद्ध हो जाता है अथवा ब्रह्महत्या-सम्बन्धी व्रतका पालन करना चाहिये या एक वर्षतक काँटोंसे युक्त शाखाका आलिङ्गन करते हुए गुरुपत्नीसे गमन करनेवालेको नियमपूर्वक नीचे भूमिपर सोना चाहिये। इससे वह गुरुपत्नीगामी पापमुक्त हो जाता है। अथवा ब्राह्मणको चीर (कन्था) वस्त्र धारणकर समाहित होकर एक वर्षतक कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। या अश्वमेधयज्ञके अवभृथ-स्नान करनेसे व्यक्ति शुद्ध हो जाता है। अथवा सर्वदा ब्रह्मचर्यपूर्वक व्रत धारणकर अष्टमकाल (अर्थात् चौथे दिन, सायंकाल)-में भोजन करना चाहिये। इसके पूर्व प्रयत्नपूर्वक एक ही स्थानपर एक ही आसनसे रहकर केवल जल पीते हुए तीन दिन व्यतीत करना चाहिये। ऐसा करते हुए तीन वर्षोंतक भूमिपर शयन करनेसे उस (गुरुपत्नी-गमनरूप) पापसे छुटकारा मिलता है, अथवा चार या पाँच चान्द्रायणव्रत करना चाहिये॥ १२-१७॥ |
| पतितैः सम्प्रयुक्तानामथ वक्ष्यामि निष्कृतिम्।<br>पतितेन तु संसर्गं यो येन कुरुते द्विजः।<br>स तत्पापापनोदार्थं तस्यैव व्रतमाचरेत्॥ १८॥<br><br>तप्तकृच्छ्रं चरेद् वाथ संवत्सरमतन्द्रितः।<br>षाण्मासिके तु संसर्गे प्रायश्चित्तार्धमर्हति॥ १९॥ | अब पतितों (पापियों)-के साथ संसर्ग करनेवालोंके निस्तारका उपाय (प्रायश्चित्त) बतलाता हूँ। जिस पतितके साथ जो द्विज (एक वर्षतक) संसर्ग करता है, उसे उस पतितद्वारा किये गये पापको दूर करनेके लिये विहित व्रतका (एक वर्षतक) पालन करना चाहिये। अथवा वर्षभरतक आलस्यरहित होकर तप्तकृच्छ्रव्रतका पालन करना चाहिये। छः महीनोंतक संसर्ग होनेपर उपर्युक्त व्रतका आधा प्रायश्चित्त करे॥ १८-१९॥ |