संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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४१४ * कूर्मपुराण *
बत्तीसवाँ अध्याय
प्रायश्चित्त*-प्रकरणमें महापातकोंके प्रायश्चित्तका विधान तथा अन्य उपपातकोंसे शुद्धिका उपाय
| व्यास उवाच | व्यासजीने कहा—सुरापान करनेवाले द्विजोत्तमको अग्निके समान वर्णवाली प्रतप्त (अति उष्ण) सुराका स्वयं पान करना चाहिये। उससे शरीरके दग्ध होनेपर वह (पापसे) मुक्त हो जाता है। अथवा अग्निके समान रंगवाला (अति उष्ण) गोमूत्र या गोबरका रस अथवा (गौका) दुग्ध, घृत या जल पीनेपर द्विज (पापसे) मुक्त हो जाता है। उस (सुरापानजन्य) पापके शमनके लिये जलसे भींगा वस्त्र धारणकर तथा प्रयत्नपूर्वक नारायण हरिका ध्यान कर पुनः ब्रह्महत्यासम्बन्धी (प्रायश्चित्त) व्रतका पालन करना चाहिये॥ १–३॥ |
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| सुरापस्तु सुरां तप्तामग्निवर्णां स्वयं पिबेत्।<br>तया स काये निर्दग्धे मुच्यते तु द्विजोत्तमः॥ १॥ | |
| गोमूत्रमग्निवर्णं वा गोशकृद्रसमेव वा।<br>पयो घृतं जलं वाथ मुच्यते पातकात् ततः॥ २॥ | |
| जलार्द्रवासाः प्रयतो ध्यात्वा नारायणं हरिम्।<br>ब्रह्महत्याव्रतं चाथ चरेत् तत्पापशान्तये॥ ३॥ | |
| सुवर्णस्तेयकृद् विप्रो राजानमभिगम्य तु।<br>स्वकर्म ख्यापयन् ब्रूयान्मां भवाननुशास्त्विति॥ ४॥ | सुवर्णकी चोरी करनेवाले ब्राह्मणको चाहिये कि वह राजाके पास जाकर अपने (पाप) कर्मको बताते हुए कहे—'आप मुझे दण्डित करें'। राजा मूसल लेकर स्वयं उसे एक बार मारे। इस प्रकार वध हो जानेपर ब्राह्मण चोरी-रूप (महापाप)-से शुद्ध हो जाता है अथवा तपस्या करनेसे वह शुद्ध होता है। मूसल अथवा खैरकी लकड़ीकी लाठी और दोनों ओर तीक्ष्ण धारवाली शक्ति या लोहेका दण्ड कंधेपर लेकर उस (पापयुक्त ब्राह्मण)-को राजाके पास केश खोले दौड़ते हुए जाना चाहिये और अपने उस (पापकर्म)-को बताते हुए कहना चाहिये—'मैंने यह कर्म किया है, आप मुझे दण्ड दें।' दण्डसे अथवा (यथाशास्त्र प्रायश्चित्तपूर्वक शरीर) परित्याग कर देनेसे सुवर्ण-चोर चोरी (-रूप पापकर्म)-से मुक्त हो जाता है। उसको दण्डित न करनेसे तो राजा चोरका पाप (स्वयं) प्राप्त कर लेता है। तपस्याद्वारा सुवर्णकी चोरीसे उत्पन्न पापको दूर करनेकी इच्छा रखनेवाले द्विजको चाहिये कि वह चीर (फटे-पुराने) वस्त्र धारण करके जंगलमें जाकर ब्रह्महत्या-सम्बन्धी (प्रायश्चित्त) व्रतका पालन करे॥ ४–९॥ |
| गृहीत्वा मुसलं राजा सकृद् हन्यात् ततः स्वयम्।<br>वधे तु शुद्ध्यते स्तेनो ब्राह्मणस्तपसैव वा॥ ५॥ | |
| स्कन्धेनादाय मुसलं लकुटं वाऽपि खादिरम्।<br>शक्तिं चोभयतस्तीक्ष्णामायसं दण्डमेव वा॥ ६॥ | |
| राजा तेन च गन्तव्यो मुक्तकेशेन धावता।<br>आचक्षाणेन तत्पापमेवंकर्माऽस्मि शाधि माम्॥ ७॥ | |
| शासनाद् वा विमोक्षाद् वा स्तेनः स्तेयाद् विमुच्यते।<br>अशासित्वा तु तं राजा स्तेनस्याप्नोति किल्बिषम्॥ ८॥ | |
| तपसाऽपनुनुत्सुस्तु सुवर्णस्तेयजं मलम्।<br>चीरवासा द्विजोऽरण्ये चरेद् ब्रह्महणो व्रतम्॥ ९॥ |
* 'प्रायः' का अर्थ तप है। चित्तका अर्थ निश्चय है। इसलिये दृढ़-संकल्पपूर्वक तप करना ही प्रायश्चित्तका आचरण है (याज्ञ० मिता० श्लोक २७५)। मनुस्मृति अ० ११ तथा याज्ञ० स्मृ० प्रायश्चित्त-प्रकरण आदिमें इस कूर्मपुराणके अध्यायके अनुसार प्रायः सूक्ष्म विचार करके प्रायश्चित्तका निर्णय किया गया है। अपेक्षानुसार प्रायश्चित्त-निर्णय वहींसे करना चाहिये। इस अध्यायमें प्रायश्चित्तकी दिशामात्रका संक्षेपमें निर्देश है।