भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 423
* अध्याय ३१ *४१३
प्रविश्य परमं स्थानं कपालं ब्रह्मणो हरः।<br>गणानामग्रतो देवः स्थापयामास शंकरः॥ १०३॥<br><br>स्थापयित्वा महादेवो ददौ तच्च कलेवरम्।<br>उक्त्वा सजीवमस्त्वीशो विष्णवे स घृणानिधिः॥ १०४॥श्रेष्ठ स्थान (वाराणसी)-में प्रविष्ट होकर देव हर शंकर (कालभैरव)-ने गणोंके सामने ब्रह्माके कपालको स्थापित किया और उन्हीं करुणानिधि ईश महादेव (कालभैरव)-ने 'जीवित हो जाय' ऐसा कहकर (विष्वक्सेनका) कलेवर विष्णु (हरि भगवान्)-को दे दिया॥ १०३-१०४॥
ये स्मरन्ति ममाजस्त्रं कापालं वेषमुत्तमम्।<br>तेषां विनश्यति क्षिप्रमिहामुत्र च पातकम्॥ १०५॥<br><br>आगम्य तीर्थप्रवरे स्नानं कृत्वा विधानतः।<br>तर्पयित्वा पितॄन् देवान् मुच्यते ब्रह्महत्यया॥ १०६॥<br><br>अशाश्वतं जगज्ज्ञात्वा येऽस्मिन् स्थाने वसन्ति वै।<br>देहान्ते तत् परं ज्ञानं ददामि परमं पदम्॥ १०७॥<br><br>इतीदमुक्त्वा भगवान् समालिङ्ग्य जनार्दनम्।<br>सहैव प्रमथेशानैः क्षणादन्तरधीयत॥ १०८॥मेरे इस कपालयुक्त उत्तम वेषका (रूपका) निरन्तर स्मरण करनेसे ऐहलौकिक तथा पारलौकिक सब पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। इस श्रेष्ठ (वाराणसीके कपालमोचन) तीर्थमें आकर स्नान करके विधिपूर्वक पितरों तथा देवताओंका तर्पण करनेसे ब्रह्महत्यासे मुक्ति मिल जाती है। संसारको अनित्य जानकर जो इस स्थानमें निवास करते हैं, उन्हें देहान्तके समयमें परम ज्ञान और परम पद प्रदान करता हूँ। ऐसा कहकर भगवान् (कालभैरव) जनार्दनका आलिंगनकर प्रमथेश्वरोंके साथ ही क्षणभरमें अन्तर्धान हो गये॥ १०५-१०८॥
स लब्ध्वा भगवान् कृष्णो विष्वक्सेनं त्रिशूलिनः।<br>स्वं देशमगमत् तूर्णं गृहीत्वा परमं वपुः॥ १०९॥वे भगवान् कृष्ण (हरि) त्रिशूलीसे विष्वक्सेनको प्राप्तकर* अपना परम रूप धारणकर शीघ्र ही अपने स्थानको चले गये॥ १०९॥
एतद् वः कथितं पुण्यं महापातकनाशनम्।<br>कपालमोचनं तीर्थं स्थाणोः प्रियकरं शुभम्॥ ११०॥<br><br>य इमं पठतेऽध्यायं ब्राह्मणानां समीपतः।<br>वाचिकैर्मानसैः पापैः कायिकैश्च विमुच्यते॥ १११॥आप लोगोंसे स्थाणु (शंकर)-को अत्यन्त प्रिय, महापातकोंको नष्ट करनेवाले, पवित्र एवं मङ्गलकारी इस कपालमोचन तीर्थके विषयमें मैंने बताया। जो ब्राह्मणोंके समीप इस अध्यायका पाठ करता है, वह कायिक, वाचिक तथा मानसिक (त्रिविध) पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ११०-१११॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे एकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें इकतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३१॥


* इसी अध्यायके ९९वें श्लोकके अनुसार श्रीहरिने दूसरा रूप धारणकर श्रीकालभैरवके साथ वाराणसीमें प्रवेश किया था, अब अपने पार्षद विष्वक्सेनके शरीरको प्राप्तकर अपने वास्तविक स्वरूपसे अपने धाम जा रहे हैं।