भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४१२ * कूर्मपुराण *


न सम्पूर्णं कपालं तद् ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।<br>दिव्यं वर्षसहस्रं तु सा च धारा प्रवाहिता ॥ ९१ ॥हजारों दिव्य वर्षोंतक वह (रक्तकी) धारा प्रवाहित होती रही, किंतु परमेष्ठी ब्रह्माका वह (कालभैरवके हाथमें विद्यमान) कपाल भरा नहीं। तब नारायण
अथाब्रवीत् कालरुद्रं हरिनारायणः प्रभुः।<br>संस्तूय वैदिकैर्मन्त्रैर्बहुमानपुरःसरम्॥ ९२ ॥प्रभु हरिने वैदिक मन्त्रोंद्वारा अत्यन्त आदरपूर्वक स्तुति कर भगवान् कालरुद्रसे कहा—आपने ब्रह्माका यह सिर किस कारणसे धारण कर रखा है? तब
किमर्थमेतद् वदनं ब्रह्मणो भवता धृतम्।<br>प्रोवाच वृत्तमखिलं भगवान् परमेश्वरः ॥ ९३ ॥परमेश्वर भगवान् (कालभैरव)-ने सम्पूर्ण वृत्तान्त बतलाया ॥ ९१-९३॥
समाहूय हृषीकेशो ब्रह्महत्यामथाच्युतः।<br>प्रार्थयामास देवेशो विमुञ्चेति त्रिशूलिनम् ॥ ९४ ॥तदनन्तर हृषीकेश देवेश भगवान् अच्युतने ब्रह्महत्याको बुलाकर प्रार्थना की—त्रिशूली (कालभैरव)-को छोड़ दो। मुरारि विष्णुद्वारा प्रार्थना करनेपर भी उसने (कालभैरवके)
न तत्याजाथ सा पार्श्वं व्याहृतापि मुरारिणा।<br>चिरं ध्यात्वा जगद्योनिः शंकरं प्राह सर्ववित् ॥ ९५ ॥पार्श्वका त्याग नहीं किया। तब जगद्योनि सर्वज्ञ (विष्णु)-ने देरतक ध्यानकर शंकर (कालभैरव)-से कहा—
व्रजस्व भगवन् दिव्यां पुरीं वाराणसीं शुभाम्।<br>यत्राखिलजगद्दोषं क्षिप्रं नाशयतीश्वरः ॥ ९६ ॥भगवन्! आप दिव्य एवं मङ्गल करनेवाली वाराणसीपुरी जायें, जहाँ ईश्वर सम्पूर्ण सांसारिक दोषोंको शीघ्र ही नष्ट कर देते हैं॥ ९४—९६॥
ततः सर्वाणि गुह्यानि तीर्थान्यायतननानि च।<br>जगाम लीलया देवो लोकानां हितकाम्यया ॥ ९७ ॥तब वे महायोगी कालभैरव अपने हाथमें (विष्णु-पार्षद विष्वक्सेनका) कलेवर लेकर वाराणसीपुरीके दर्शनकी प्रसन्नतामें नृत्य करते हुए सर्वप्रथम अति-गोपनीय सभी तीर्थों एवं देवस्थानोंमें देवताओंके हितकी
संस्तूयमानः प्रमथैर्महायोगैरितस्ततः।<br>नृत्यमानो महायोगी हस्तन्यस्तकलेवरः ॥ ९८ ॥कामनासे गये। कालभैरवके चारों ओर महायोगी प्रमथगण उनकी स्तुति करते हुए चल रहे थे। उन (कालभैरव)-का नृत्य देखनेकी लालसावाले भगवान्
तमभ्यधावद् भगवान् हरिनारायणः स्वयम्।<br>अथास्थायापरं रूपं नृत्यदर्शनलालसः ॥ ९९ ॥नारायण हरि दूसरा रूप धारणकर स्वयं उनके पीछे-पीछे चलने लगे ॥ ९७-९९॥
निरीक्षमाणो गोविन्दं वृषेन्द्राङ्कितशासनः।<br>सस्मितोऽनन्ययोगात्मा नृत्यति स्म पुनः पुनः ॥ १०० ॥श्रेष्ठ वृषभके चिह्नसे अङ्कित शासन (ध्वजा)-वाले अनन्त योगात्मरूप (शंकर) गोविन्दको देखते हुए प्रसन्नतापूर्वक बार-बार नृत्य करने लगे। तदनन्तर
अथ सानुचरो रुद्रः सहरिर्धर्मवाहनः।<br>भेजे महादेवपुरीं वाराणसीमिति श्रुताम्॥ १०१ ॥अनुचरों और हरिके सहित धर्मरूपी वृषभको वाहनके रूपमें स्वीकार करनेवाले रुद्र (कालभैरव) वाराणसी इस नामसे प्रसिद्ध महादेवकी पुरीमें पहुँचे ॥ १००-१०१ ॥
प्रविष्टमात्रे देवेशे ब्रह्महत्या कपर्दिनि।<br>हा हेत्युक्त्वा सनादं सा पाताल प्राप दुःखिता॥ १०२॥कपर्दी देवेशके वहाँ प्रवेश करते ही वह ब्रह्महत्या तीव्र स्वरसे हाहाकार करती हुई दुःखी होकर पातालमें चली गयी ॥ १०२ ॥