संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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| * अध्याय ३१ * | ४११ |
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| तं दृष्ट्वा कालवदनं शंकरं कालभैरवम्।<br>रूपलावण्यसम्पन्नं नारीकुलमगादनु ॥ ७७ ॥<br><br>गायन्ति विविधं गीतं नृत्यन्ति पुरतः प्रभोः।<br>सस्मितं प्रेक्ष्य वदनं चक्रुर्भ्रूभङ्गमेव च ॥ ७८ ॥<br><br>स देवदानवादीनां देशानभ्येत्य शूलधृक्।<br>जगाम विष्णोर्भवनं यत्रास्ते मधुसूदनः ॥ ७९ ॥<br><br>निरीक्ष्य दिव्यभवनं शंकरो लोकशंकरः।<br>सहैव भूतप्रवरैः प्रवेष्टुमुपचक्रमे ॥ ८० ॥<br><br>अविज्ञाय परं भावं दिव्यं तत्पारमेश्वरम्।<br>न्यवारयत् त्रिशूलाङ्कं द्वारपालो महाबलः ॥ ८१ ॥<br><br>शङ्खचक्रगदापाणिः पीतवासा महाभुजः।<br>विष्वक्सेन इति ख्यातो विष्णोरंशसमुद्भवः ॥ ८२ ॥<br><br>अथैनं शंकरगणो युयुधे विष्णुसम्भवम्।<br>भीषणो भैरवादेशात् कालवेग इति श्रुतः ॥ ८३ ॥<br><br>विजित्य तं कालवेगं क्रोधसंरक्तलोचनः।<br>रुद्रायाभिमुखं रौद्रं चिक्षेप च सुदर्शनम् ॥ ८४ ॥<br><br>अथ देवो महादेवस्त्रिपुरारिस्त्रिशूलभृत्।<br>तमापतन्तं सावज्ञमालोकयदमित्रजित् ॥ ८५ ॥<br><br>तदन्तरे महद्भूतं युगान्तदहनोपमम्।<br>शूलेनोरसि निर्भिद्य पातयामास तं भुवि ॥ ८६ ॥<br><br>स शूलाभिहतोऽत्यर्थं त्यक्त्वा स्वं परमं बलम्।<br>तत्याज जीवितं दृष्ट्वा मृत्युं व्याधिहता इव ॥ ८७ ॥<br><br>निहत्य विष्णुपुरुषं सार्धं प्रमथपुंगवैः।<br>विवेश चान्तरगृहं समादाय कलेवरम् ॥ ८८ ॥<br><br>निरीक्ष्य जगतो हेतुमीश्वरं भगवान् हरिः।<br>शिरो ललाटात् सम्भिद्य रक्तधारामपातयत् ॥ ८९ ॥<br><br>गृहाण भगवन् भिक्षां मदीयाममितद्युते।<br>न विद्यतेऽनाभ्युदिता तव त्रिपुरमर्दन ॥ ९० ॥ | अस्तु, उन कालात्मा महेश्वरके प्रमुख गण कालभैरव शंकरको रूप एवं लावण्यसे सम्पन्न देखकर नारी-समूह उनके पीछे चलने लगा। वे स्त्रियाँ प्रभुके सामने विविध प्रकारके गीत गाने लगीं और नृत्य करने लगीं तथा मन्द मुसकानके साथ उनके मुखको देखकर भौंहोंसे हाव-भाव प्रदर्शित करने लगीं ॥ ७७-७८ ॥<br><br>वे शूलधारी कालभैरव देवों तथा दानवों आदिके देशोंमें जानेके अनन्तर विष्णुके भवनमें गये, जहाँ मधुसूदन निवास करते हैं। उस दिव्य भवनको देखकर लोकोंके कल्याणकारी शंकर (कालभैरव) श्रेष्ठ भूतोंके साथ ही उसमें प्रवेश करने लगे ॥ ७९-८० ॥<br><br>उन (कालभैरव)-के दिव्य परम पारमेश्वर भावको न समझते हुए शंख, चक्र तथा गदा हाथोंमें लिये हुए, पीत वस्त्र धारण किये, महान् भुजावाले, विष्णुके अंशसे उत्पन्न विष्वक्सेन नामसे प्रसिद्ध महाबलवान् द्वारपालने त्रिशूलधारी उन कालभैरवको रोका। तब भैरवकी आज्ञासे कालवेग इस नामसे प्रसिद्ध शंकरका भयंकर गण विष्णु-समुद्भूत (विष्वक्सेन)-से युद्ध करने लगा। उस कालवेगको जीतकर क्रोधसे लाल हुए नेत्रोंवाला (द्वारपाल) रुद्र (कालभैरव)-की ओर भयंकर सुदर्शनचक्र फेंका। तब त्रिशूलधारी शत्रुजित् त्रिपुरारिदेव महादेव (कालभैरव)-ने उस आते हुए चक्रको अवज्ञापूर्वक देखा ॥ ८१-८५ ॥<br><br>उसी समय महादेव (कालभैरव)-ने त्रिशूलके द्वारा प्रलयकालीन अग्निके तुल्य अति भीषण विष्वक्सेनके वक्षःस्थलमें प्रहारकर उसे पृथ्वीपर गिरा दिया। त्रिशूलसे आहत होनेपर अपने महान् बलका त्यागकर उस विष्वक्सेनने अपने प्राणोंका उसी प्रकार परित्याग कर दिया, जैसे व्याधिसे आहत प्राणी मृत्युको देखकर अपने प्राणोंका परित्याग कर देता है ॥ ८६-८७ ॥<br><br>विष्णुके पुरुष (विष्वक्सेन)-को मारकर (उसके) कलेवर (मृत शरीर)-को लेकर श्रेष्ठ प्रमथगणोंके साथ महादेव (कालभैरव) भवनके अंदर प्रविष्ट हुए। जगत्के कारणरूप ईश्वर (कालभैरव)-को देखकर भगवान् हरिने अपने ललाटका भेदनकर रक्तकी धारा गिरायी और कहा—अपरिमेय तेजरूप भगवन्! आप मेरी भिक्षा ग्रहण करें। त्रिपुरमर्दन! आपके लिये कोई अप्रकट (अमङ्गलजनक भिक्षा) नहीं है ॥ ८८-९० ॥ |