भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४१०* कूर्मपुराण *
अयं पुराणपुरुषो न हन्तव्यस्त्वयानघ।<br>स्वयोगैश्वर्यमाहात्म्यान्मामेव शरणं गतः॥ ६३॥<br><br>अयं च यज्ञो भगवान् सगर्वो भवतानघ।<br>शासितव्यो विरिञ्चस्य धारणीयं शिरस्त्वया॥ ६४॥<br><br>ब्रह्महत्यापनोदार्थं व्रतं लोकाय दर्शयन्।<br>चरस्व सततं भिक्षां संस्थापय सुरद्विजान्॥ ६५॥अनघ! आपको इन पुराणपुरुषकी हत्या नहीं करनी चाहिये। ये अपने योगैश्वर्यके माहात्म्यसे मेरी ही शरणमें आये हैं। पुनः महेश्वरने नीललोहित रुद्रको सम्बोधित करते हुए नारायणके अंशसे उत्पन्न यज्ञभगवान्‌के विषयमें कहा—हे अनघ! ये भगवान् यज्ञ हैं। ब्रह्माको मोहग्रस्त देखकर सगर्व हो गये हैं, इनका शासन करें तथा ब्रह्माके (कटे हुए) सिरको धारण करें और आप संसारको यह दिखाते हुए भिक्षाचरणपूर्वक भ्रमण करें कि मैं ब्रह्महत्याके निवारणके लिये व्रत कर रहा हूँ। आप देवताओं एवं ब्राह्मणोंको (अर्थात् उनकी मर्यादाको) संस्थापित करें॥ ६३–६५॥
इत्येतदुक्त्वा वचनं भगवान् परमेश्वरः।<br>स्थानं स्वाभाविकं दिव्यं ययौ तत्परमं पदम्॥ ६६॥<br><br>ततः स भगवानीशः कपर्दी नीललोहितः।<br>ग्राहयामास वदनं ब्रह्मणः कालभैरवम्॥ ६७॥<br><br>चर त्वं पापनाशार्थं व्रतं लोकहितावहम्।<br>कपालहस्तो भगवान् भिक्षां गृह्णातु सर्वतः॥ ६८॥<br><br>उक्त्वैवं प्राहिणोत् कन्यां ब्रह्महत्यामिति श्रुताम्।<br>दंष्ट्राकरालवदनां ज्वालामालाविभूषणाम्॥ ६९॥<br><br>यावद् वाराणसीं दिव्यां पुरीमेश गमिष्यति।<br>तावत् त्वं भीषणे कालमनुगच्छ त्रिलोचनम्॥ ७०॥ऐसा वचन कहकर भगवान् परमेश्वर अपने परम पदरूप स्वाभाविक दिव्य स्थानको चले गये। तदनन्तर जटाधारी नीललोहित उन भगवान् ईश (रुद्र) ने ब्रह्माका मुख कालभैरवको ग्रहण कराया (तथा कहा—) पापको नष्ट करनेके लिये आप लोककल्याणकारी व्रतका पालन करें और कपाल हाथमें धारणकर आप भगवान् सर्वत्र जायँ तथा भिक्षा ग्रहण करें। ऐसा कहकर उन्होंने भयंकर दाढ़ और मुखवाली ज्वालासमूहको ही आभूषण-रूपमें धारण करनेवाली ब्रह्महत्या नामसे प्रसिद्ध कन्याको भी यह कहकर भेजा—हे भीषण आकारवाली! ये कालभैरव त्रिलोचन जबतक दिव्य वाराणसीपुरीमें पहुँचें, तबतक तुम इनके पीछे-पीछे जाओ॥ ६६–७०॥
एवमाभाष्य कालाग्निं प्राह देवो महेश्वरः।<br>अटस्व निखिलं लोकं भिक्षार्थी मन्नियोगतः॥ ७१॥<br><br>यदा द्रक्ष्यसि देवेशं नारायणमनामयम्।<br>तदासौ वक्ष्यति स्पष्टमुपायं पापशोधनम्॥ ७२॥ऐसा कहनेके बाद महेश्वरदेवने कालाग्नि (भैरव) से कहा—मेरे निर्देशानुसार आप भिक्षा माँगते हुए सम्पूर्ण लोकमें भ्रमण करें। जब आप देवेश अनामय नारायणका दर्शन करेंगे, तब वे (श्रीनारायण) पापकी शुद्धिका स्पष्ट उपाय (आपको) बतायेंगे॥ ७१–७२॥
स देवदेवतावाक्यमाकर्ण्य भगवान् हरः।<br>कपालपाणिर्विश्वात्मा चचार भुवनत्रयम्॥ ७३॥<br><br>आस्थाय विकृतं वेषं दीप्यमानं स्वतेजसा।<br>श्रीमत् पवित्रमतुलं जटाजूटविराजितम्॥ ७४॥<br><br>कोटिसूर्यप्रतीकाशैः प्रमथैश्चातिगर्वितैः।<br>भाति कालाग्निनयनो महादेवः समावृतः॥ ७५॥देवाधिदेवका वाक्य सुनकर कपालपाणि वे विश्वात्मा भगवान् हर (कालभैरव) तीनों लोकोंमें भ्रमण करने लगे। विकृत वेष बनाकर अपने तेजसे प्रकाशित, श्रीसम्पन्न, अत्यन्त पवित्र, जटाजूटसे सुशोभित, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान, अत्यन्त गर्वित प्रमथगणोंसे आवृत, कालाग्निके समान नेत्रवाले महादेव (कालभैरव) सुशोभित होने लगे॥ ७३–७५॥
पीत्वा तदमृतं दिव्यमानन्दं परमेष्ठिनः।<br>लीलाविलासबहुलो लोकानागच्छतीश्वरः॥ ७६॥परमेष्ठीके उस दिव्य अमृतस्वरूप आनन्दका पान-कर अतिशय लीला-विलास करनेवाले ईश्वर लोगोंके पास आये॥ ७६॥